रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८ रसखान-ग्रन्थावली उन्हें ज्ञान ही नही रहा। उन्हे ज्ञान रहा केवल कृष्ण की क्रीड़ाओं का । इसी दशा का वर्णन करती हुई एक गोपी अपनी सखी से कहती है कि आनंद-सागर कृष्ण का कुंज-कुंज मे घूमना, वंशी बजाना, गौओं को चराना, गोचारण के गीत गाना, प्रेम से दही मांगना और मुसकराकर देखना किस प्रकार भूला जा सकता है। इस प्रकार रसखान ने प्रेम-वेदना का मार्मिक और स्वाभाविक वर्णन किया है। २०. रासलीला-रसखान ने रासलीला का भी वर्णन किया है। इस विषय के इनके सात छंद उपलब्ध है। इस रासलीला का उद्देश्य भी गोपियों को अपने प्रेम के बंधन मे बाँधना है। फलतः जो भी गोपी रासलीला को देखती है, वह कृष्ण की ही होकर रह जाती है। सास चाहे जितना त्रास दे, ननद चाहे जितने व्यंग्य कसे, पर रासलीला की दिवानी गोपी तो उसमें सम्मिलित होकर ही रहती है। रासलीला के द्वारा कृष्ण ब्रज मे नवीन जीवन का संचार करते हैं। इसीलिए प्रत्येक गोपी अपनी सखी से आग्रह करती है कि वह रास- लीला मे अवश्य सम्मिलित हो और कृष्ण के सौन्दर्य को देखकर अपनी आँखो को लाभान्वित करे। वैसे, गोपियाँ स्वयं भी नही रुक पाती, चाहे उन्हे रोकने की जितनी चेष्टा की जाये, क्योकि कौवे की काँव-काँव से गारदागमन कभी नही रुका करता । २१ फागलीला-कृष्ण की लीलाओ के अन्तर्गत फागलीला का भी महत्व है। सभी भक्त-कवियो ने फागलीला का वर्णन किया है। इस विषय से सम्बद्ध रसखान के आठ छंद उपलब्ध हैं जिनमे विस्तार से इस लीला का हृदय- स्पर्शी वर्णन है। कृष्ण जब फाग खेलते है तो उस समय उनकी जो शोभा होती है, वह अवर्णनीय है। कृष्ण और गोपियाँ परस्पर पिचकारी चलाते है, एक दूसरे पर रंग डालते है, पर प्रेम की आग और अधिक प्रज्वलित हो जाती है उनकी तृप्ति होती ही नही। फागलीला के कारण ही ब्रज मे धूम मच जाती है। इससे कोई नही बच पाता, न तो नवेली गोपियां ही और न सलज्ज वनि ताएँ ही। सम्मान किसी का भी सुरक्षित नही रहता, अर्थात् सभी गोपिकाएँ लोक-लाज को तिलाजलि देकर फागलीला मे मस्त रहती है। २२. राधा-सौन्दर्य - प्रेम की परिपूर्णता के लिए यह आवश्यक माना गया है कि नायक की भाँति नायिका भी रूपवती तथा सुन्दर हो । इसीलिए रसखान ने