रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
पृष्ठ 59, कुल 368 में से
संदर्भ में पढ़ें४० रसखान-ग्रन्थावली
२४. सखी-शिक्षा- साहित्यिक परम्परा के अंतर्गत सखी-शिक्षा का विषय भी सन्निहित है । जो सखी प्रौढ होती है, जिसे प्रेम-संसार के समस्त अनुभव होते हैं, वह अपनो मुग्धा सखी को-जिसने अभी-अभी प्रेम-जगत् मे प्रवेश किया है और जो प्रेम-रहस्यो से अपरिचित है-शिक्षा दिया करती है । इस शिक्षा का मुख्य उद्देश्य उन साधनो को बताना होता है जिससे प्रियतम वश मे किया जा सकता है । रसखान ने भी इस परम्परा का पालन किया है । कोई सखी अपनी सखी को कृष्ण से मिलने के लिए प्रेरित करती हुई कहती है कि हे सखि ! वह वही कृष्ण है, जो रासलीला मे तनिक नाचकर सबको नचाया करता है । वह ही आनन्द सागर कृष्ण है जो अनेक मनुहारे करने पर भी पलभर के लिए भी धीगा नही देखता । न जाने तुझमे वह कौनसे मनोहर भाव देखकर तेरी ओर आकृष्ट हुआ है , अत इस अवसर को हाथ से न जाने दे और तुरन्त उससे मिल । कही-कही सखी अपनी सखी को सुरक्षा के उपाय बनाती है । एक गोपी अपनी सखी से कृष्ण के प्रति सचेत रहने के लिए कहती है कि हे सखी ! मेरी बात को ध्यान से सुनो । जिम गली मे कृष्ण अपनी बाँसुरी बजाता हुआ गाता है, उस गली बिल्कुल मत जाओ क्योकि देखते ही वह प्राणो को हर लेता है और फिर गोपियाँ बेचारी प्रेम की विपत्ति लेकर ही अपने घरो को लौटती है उसने अपनी बाँसुरी की तानो का ब्रज मे तान तान रखा है। अत मैं तुमसे ज्ञान की बात कहती हूँ कि बहुत सोच-समझकर पैर रखो, क्योकि वह कृष्ण युवती को अपने जाल मे इस प्रकार फंसाता है जिस प्रकार चारा देकर मछली को फँसाया जाता है इसी प्रकार की अनेक शिक्षाएँ सखियो द्वारा अपनी- अपनी सखियो को दी गई है। २५ संयोग वर्णन - सयोग-वर्णन के अर्न्तगत राधा और कृष्ण के मिलन का विशेष रूप से वर्णन किया गया है । यह वर्णन पर्याप्त विस्तृत है मिलन- सुख के अनेक चित्र रसखान ने प्रस्तुत किये हैं, यहाँ तक कि सुरतात चित्रो को भी चित्रित करने मे इन्होने हिचक नही दिखाई है । हिचक का कोई कारण भी नही है, क्योकि भक्तिरस के अन्तर्गत चित्रित किया हुआ शृंगार रस अलौकिक होता है, लौकिक नही । हिचक लौकिक शृंगार मे होती है । फिर ऐसे चित्रो मे रसखान ने काफी सयम से काम लिया है। सुरतात का वर्णन करती हुई एक गोपी अपनी सखी से कहती है कि चतुर बाला अत्यन्त प्रसन्नता