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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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समीक्षा भाग ४१ के साथ अपने प्रियतम को छाती से लगा सोई हुई थी । उसके खुले हुए केश बाहर निकल कर हिल रहे थे । उसकी शोभा को देखकर कामदेव तिरस्कृत हो रहा था । प्रिय के साथ आनंद मे डूबी रहकर रातभर जागने की वात का पता उसकी आँखो से चल रहा था । उसका अलसाया हुआ मुख, लाल आँखो के सफेद कोए और रातभर जागने के कारण जम्भाई के कारण निकले हुए आँसू ऐसे प्रतीत होते थे मानो चन्द्रमा पर विम्ब, विम्ब पर कुमुद और कुमुदय पर मोती हो । यह वर्णन काफी संयत है । इसमे विद्यापति और सूरदास जैसी असंयमता नही है । २६. वियोग वर्णन—संयोग के पश्चात् वियोग अवश्यम्भावी है । रसखान का वियोग-वर्णन काफी मार्मिक और स्वाभाविक है । वियोग-वर्णन मे प्रकृति का उद्दीपन रूप मे चित्रण करने भी जो परिपाटी चली जा रही है, रसखान ने भी उसका अनुसरण किया है । विरहिणी गोपी अपनी सखी से कहती है कि सारे बागो मे फूल खिल गये है । बसन्त के आगमन के कारण भौरे उन पर गूँज रहे है । कोयल की कू-कू सुनकर सबके प्रियतम विदेश से वापिस लौट रहे है । लेकिन मेरे आनन्द-सागर कृष्ण इतने निष्ठुर है कि मेरी विरह-वेदना की तनिक भी चिन्ता नही करते । जब कोयल बोलती है तो उसकी कूक हृदय मे वरछी के समान लगती है । इसी प्रकार का आगतपतिका का चित्रण है—वह गोपी अपने प्रियतम के वियोग से इतनी दुखी थी कि उसके शरीर की शोभा भी मद पड गई थी । उसका कमल जैसा मुख भी मुरझा गया था । उसके हृदय की साँसे लपट बनकर जलने लगी थी । इसी बीच उसने अपने प्रियतम के आगमन की खबर सुनी । वह इतनी प्रसन्न हुई कि उसकी कंचुकी की दृढ डोर भी कस- मसाने लगी । उसका शरीर इस प्रकार शोभायुक्त हो उठा, मानो दीपक की बत्ती को उसका दिया गया हो । लेकिन सर्वत्र ऐसी स्वाभाविकता एव मार्मिकता रसखान के वर्णन मे नही मिलती ! कही-कही ऊहात्मक चित्र भी आ गए है। यथा—कोई गोपी अपनी सखी से अन्य विरहिणी गोपी की विरह-दशा का वर्णन करती हुई कहती है कि जब उसके शरीर मे वियोग की आग बहुत अधिक बढ गई तो वह उसे शान्त करने के लिए यमुना जल मे कूद पडी । विरह की आग के कारण यमुना का जल सूख गया और मछलियाँ जल के