रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
व्याख्या भाग ~३४६ होकर लोट गई, एक लोट-पोट हो गई एक की आखो से आँसू निकल आए । रसखान कहते है इस प्रकार ब्रज की गोपियो की भी हँसी हुई क्योकि उन्होने अपनी कुल की मर्यादा का कोई ध्यान नहीं रखा बाँसुरी के इस भयकर प्रभाव से बचने का तो केवल यही उपाय है कि इस ससार क सारे बाँसो का कटवा दिया जाये, क्योकि न बाँस होगा और न बाँसुरी बजेगी ! विशेष--लोकोक्ति अलकार । कवित्त भिक्षुक तिहारो कहाँ वलि मख शाला जहाँ, सर्पन को सगी कहाँ ह्वै है छीरनिधि मे ! ऐरी बहुरगी बैल वारौ कहाँ नाचत है, कीने तिरभग, कही ह्वै है ग्वालन मे । चाउर चवैया कहाँ है सुदामा पास, विष को अहारी कहाँ पूतना के घर मे। सिंधु-सुता आन मिली तर्क सो तरक करी, गिरिजा मुसकाति जाति झारी लिए कर मे ॥४॥ शब्दार्थ—वलि मख-शाला जहाँ = जहाँ पर राजा बलि की यज्ञशाला है । छीरनिधि = क्षीरसागर, विष्णु का निवास-स्थान, कृष्ण को विष्णु का अव- तार माना जाता है। तिरभगा = त्रिभगी होकर । पूतना = एक राक्षसी, जिसे कृष्ण ने बचपन मे मारा था। सिन्धु-सुता = लक्ष्मी । तर्क से तर्क करी = तर्क के द्वारा पराजित कर दिया । गिरिजा = पार्वती झारी = जलपात्र । अर्थ—पार्वती जल का पात्र लेकर जा रही थी । मार्ग मे उन्हे लक्ष्मी मिली । उसने शिव का परिहास करने के लिए पार्वती से कुछ प्रश्न किये, परन्तु पार्वती ने उनके उत्तर कृष्ण से (विष्णु के अवतार से) सम्बद्ध कर दिये । इस प्रकार पार्वती ने अपने पति के गौरव की भी रक्षा की और लक्ष्मी को अपने तर्को से पराजित कर दिया । प्रश्न और उत्तर इस प्रकार हैं ! प्रश्न—तुम्हा भिक्षुक कहाँ है ? (गोपी का शिव से तात्पर्य है।) उत्तर—जहाँ राजा बलि की यज्ञशाला है । (कृष्ण राजा बलि के पास वामन का रूप धारण करके दान माँगने गये थे ।) प्रश्न—सर्पों का साथी कहाँ है ? (शिव के गले मे सर्प है ।) उत्तर—क्षीर सागर मे। (विष्णु क्षीर सागर मे शेषनाग की शैया बनाकर निवास करते हैं। कृष्ण को विष्णु का अवतार माना गया है ।) प्रश्न—अरी, मै पूछती हूँ कि वह बहुरेंगी बैल वाला कहाँ नाच रहा है ।, (शिव की सवारी नाँदी बैल है और शिव का ताण्डव नृत्य लोक प्रसिद्ध है ।)
३५० रसखान-ग्रन्थावली उत्तर—तीन भंगिमाएं बनाकर ग्वाल-समूह के मध्य । प्रश्न—चावलो को चावने वाला कहाँ है ? (शिव वैभव से दूर रहकर कठोर योगी का जीवन बिताते है।) उत्तर--सुदामा के पास । (कृष्ण ने सुदामा के चावल खाये थे ।) प्रश्न--वह विष खाने वाला कहा है ? (शिव ने देवताओ की रक्षा के लिए क्षीर सागर से निकले हुए विष का पान किया था।) उत्तर--पूतना के घर मे । (पूतना राक्षसी अपने स्तनो से विष लगाकर बालक कृष्ण को मारने आई थी।) इस प्रकार जल-पात्र लेकर जाती हुई पार्वती ने अपने तर्को से लक्ष्मी को पराजित कर दिया । सवैया खेलिये फाग निसक ह्वै आज मयक मुखी कहै भाग हमारो । लेहु गुलाल दुग्रौ कर मे पित्र काटिक रंग हिये महं डारो । भावै सु मोहि करो रसखान जु पाँव परौ जनि घूंघट टारो ॥ वीर की सौंह हौं देखिहौं कैसे अबीर तो आँख बचाय के डारो ॥५॥ शब्दार्थ—निसक ह्वै = निडर होकर। मयंकमुखी = चन्द्रमुखी। दुग्रौ = दोनो। भावै = जो अच्छा लगे । पाव परी जनि घूंघट टारो = मैं तुम्हारे पैरों मे पडकर प्रार्थना करती हूँ कि मेरा घूंघट मत खोलो । वीर = भाई । सौह = सौगंध । अर्थ--फाग खेलते समय कोई चन्द्रमुखी गोपी कृष्ण से कहती है कि हे कृष्ण ! हम दोनो को फाग खेलने का अवसर मिला है, यह हमारा सौभाग्य है, अत तुम निडर होकर फाग खेलो। दोनो हाथो मे गुलाल लेकर और पिचकारी मे रंग भरकर मेरे ऊपर डालो । जो अच्छा लगे, उसी प्रकार मेरे साथ फाग खेलो, पर मैं तुमसे पैरो मे पडकर प्रार्थना करती हूँ कि मेरा घूंघट मत खोलो । मैं भाई की सौगन्ध खाकर कहती हूँ कि मेरी आँखो को बचाकर मेरे ऊपर अबीर डालो, वरना आखो मे अबीर पड जाने से मै किस प्रकार तुम्हारे सौन्दर्य को देख सकूँगी ? दोहा नन्द महर कै वगर तन, ऊव मेरे को जाय । नाहक कहुँ गढि जायगो, हित काँटो मन पाय ॥ ६ ॥ शब्दार्थ--वगर = आँगन । मेरे को जाये = मेरी बलाय जाये । = नाहक व्यर्थ मे ही । हित = प्रेम । मन-पाय = मन रूपी चरण मे । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि नन्द मिहिर के आँगन
व्याख्या भाग ३५१ मे अब मेरी बलाय जाय अर्थात् मै वहाँ बिल्कुल नही जाऊगी क्यो वहाँ व्यर्थ ही मन रूपी चरण मे प्रेम रूपा काँटा गड़ जायेगा अर्थात् कृष्ण से प्रेम हो जायेगा । विशेष—रूपक अलकार । कवित्त सुरतरु लतानि चार फल है ललित कैधो, कामधेनु धारा सम नेह उपजावनी । कैधो चिन्तामनि की माल उर सोभित, बिसाल कठ मे धरै है जोति भलकावनी ॥ प्रभु की कहानी ते गुसाईं की मधुरबानी, मुक्ति सुखदानी रसखानि मनभावनी । खाड की खिजावनी सी कठ की कुढावनी सी, सिता को सतावनी सी सुधा सकुचावनी ॥ ७ ॥ शब्दार्थ—सुरतर=कल्पवृक्ष । चार फल=धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष । ललित=सुन्दर , नेह=स्नेह । सिता=शर्करा, चीनी । अर्थ—इस कवित्त मे राम-कथा के महत्व का वर्णन किया गया है । यह राम कथा कल्पवृक्ष की शाखाओ की भाँति धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के चार सुन्दर फल देने वाली है या कामधेनु की दुग्ध धारा के समान पवित्र और निर्मल प्रेम को उत्पन्न करने वाली है या हृदय पर चिन्तामणि माला के समान सुशोभित होने वाली है या विशाल कण्ठ मे दिव्य ज्योति के समान भलकने वाली है राम की कथा से गोस्वामी तुलसीदास की वाणी मुक्ति सुख आनन्द देने वाली बनकर मनोहर हो गई । राम-कथा खाँड कन्द शरीर की भाँति मीठी और अमृत के समान अलौकिक आनन्द प्रदान करने वाली है । विशेष—सन्देह, उल्लेख अलकार । अग भभूत लगाय महा सुख है कोउ ऐसौ सो प्रेमहु पागै । नाथ को नाम सुनै विगसै हियो कान्ह को नाम सुनै अनुरागे । जोग लिये हरि प्यारी मिलैतो मै कान फटाये कहा दुख लागै । मोहन के मन मानी यही तो सबै री कहो मिलि गोरख जागै ॥ ८ ॥ शब्दार्थ-भभूत=भस्म । नाथ=गोरखनाथ । विगसैहियौ=हृदय प्रसन्न हो जाता है । अनुरागे=प्रेम पूर्ण हो जाता है । अर्थ—उद्धव के निर्गुण ब्रह्म उपदेश को सुनकर कोई गोपी उद्धव से कहती हैं कि कृष्ण के प्रेम मे निमग्न हुआ क्या कोई ऐसा प्राणी है जो यह कहे कि अगो मे भस्म लगाने से महासुख की प्राप्ति होती है । गोरखनाथ का नाम सुनकर हृदय प्रसन्न हो जाता है परन्तु कृष्ण का नाम सुनने पर
मन प्रेमपूर्ण हो जाता है । यदि योग धारण करने से प्यारा कृष्ण मिल जाय तो हमे अपने कान फटवा लेने से भी कोई दुख नही अर्थात् हम सहर्ष अपने कान फटवा सकती है । यदि कृष्ण की यही इच्छा है कि हम उन्हे छोड़कर योग साधना शुरू कर दे तो हे सखि ! सब आजायो और मिलकर गोरखनाथ का अलख जगाओ । कैसा यह देस निगोरा, जग होरी ब्रज होरा । मैं जल जमना भरन जात रही, देखि बडन मेरा गोरा । मोसो कहै चलो कुंजन मे, तनक-तनक से छोरा । परे आँखिन मे डोरा ॥ जिमरा देखि डरात सखी री, लाज भरम को ओरा । का बूढे का लोग लुगाई, एक ते एक ठिठोरा । न काहू सो काहू को जोरा । मन मेरो हर्यो नद के ने सखि,चलत लगावत चोरा । कहै रसखान सिखाइ सखन सो, सब मेरा अग टटोरा । न मानत कहत निहोरा ॥ ६ ॥ शब्दार्थ—निहोरा = निगोडा तनक तनक सो = छोटे छोटे । डोरा = काजल । ठिठोरा = धृष्ट । निहोरा = विनय । अर्थ-कोई गोपी अपनी सखी से कह रही है कि हे सखि ! यह निगोडा देश कैसा है और ब्रज तो सारे जग से बढकर है । मैं यमुना मे पानी भरने के लिए जा रही थी कि मेरे गोरे शरीर को देखकर मेरे सौन्दर्य पर रीझ कर, छोटे-छोटे बच्चे भी जो आँखों मे काजल लगाए हुए थे, मुझ से कहने लगे कि कुन्जो मे चलो । उन्हें देखकर मेरा मन डर गया, लज्जा सकट मे पड गई । क्या बूढे, क्या लोग और स्त्रियाँ, यहाँ ब्रज मे तो सब एक-दूसरे से बढ़-चढकर धृष्ट हैं, कोई किसी से के जोड़े मे नही आता, अर्थात् सभी अनुप- मेय है। हे सखि ! मेरा मन कृष्ण ने हर लिया है, वह चोरी-चोरी मेरे पीछे चलता है और अपने सब साथियो को सिखा कर मेरी तलाशी लिवा लेता है । उससे चाहे कितनी विनय करो, पर वह किसी की कोई बात नही सुनता । दोहा परम चतुर पुनि रसिकवर, कैसो हू नर होय । विना प्रेम रूखो लगै , वादि चतुरई सोम ॥ १० ॥ शब्दार्थर्—सिकवर = भावुक । वादि = व्यर्थ । चतुराई = चतुरता । अर्थ-इस दोहे मे कृष्ण-प्रेम की महत्व का वर्णन किया गया गया है । चाहे मनुष्य कितना ही चतुर और भावुक हो परन्तु यदि उसमे कृष्ण के प्रति प्रेम नही है तो वह नीरस है और उसकी सारी चतुराई व्यर्थ है ।
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