रत्नावली नाटिका (सम्राट हर्षवर्धन - शास्त्रीय नाटिका रत्न सम्पूर्ण ४ अङ्क सान्वय सटीक)

रत्नावली नाटिका (सम्राट हर्षवर्धन - शास्त्रीय नाटिका रत्न सम्पूर्ण ४ अङ्क सान्वय सटीक)
Ratnavali Natika of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
DevanagariHindipublished520 पृष्ठ
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द्वितीयोऽङ्कः
( ततः प्रविशति सारिकापञ्जरव्यग्रहस्ता^१ सुसङ्गता )
सुसङ्गता । हद्धी हद्धी ! अह कहिं दाणिं मम हत्थे इमं सारिअं णिक्खिविअ गदा मे पिअसही सागरिआ ? ता कहिं उण एणं पेक्खिस्सं ? ( अग्रतो विलोक्य^२ ) कहं एसा क्खु णिउणिआ इदो जेव्व आअच्छदि । ता जाव एदं पुच्छिस्सं । (क)
( ततः प्रविशति निपुणिका )
निपुणिका—( सविस्मयम् ) अच्चरिअं अच्चरिअं ! अणस्स- सरिसो पहावो मण्णे देवदाए । उवलद्धो क्खु मए भट्टिणो^३ वृत्तंतो । ता गदुअ भट्टिणीए णिवेदइस्सं । ( इति परिक्रामति) (ख)
सुसङ्गता—( उपसृत्य ) हला णिउणिए, कहिं दाणिं विब्भन्तचित्तसरिच्छा विअ इह