रत्नावली नाटिका (सम्राट हर्षवर्धन - शास्त्रीय नाटिका रत्न सम्पूर्ण ४ अङ्क सान्वय सटीक)
Ratnavali Natika of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
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सख्या। इति इव एवंप्रकारेण कथयन्निव सूर्यः कश्चन नायको वा अस्तमस्तकनिविष्टकरः (सूर्य्यपक्षे) अस्ते अस्ताचले निविष्टाः स्थापिताः कराः किरणाः यस्य सः (नायकपक्षे) अस्तं शोकेनाधो नमितं यत् मस्तकं तत्र निविष्टः हस्तः यस्य शोकापनोदनार्थमित्यर्थः। सरोरुहिण्याः पद्मसरसः पद्मिन्याः वा प्रत्ययनां विश्वासजननं करोति इव इत्युत्प्रेक्षा। वसन्ततिलकावृत्तम्। श्लेषसमासोक्त्युत्प्रेक्षाणां सङ्करः ॥ ६ ॥ प्रियतमायाः सङ्केतावसरं सङ्केतकालं प्रतिपालयावः अपेक्षावहे। शोभनं सुष्ठु। बहुलीकृताः विपुलीकृताः विरलायाः वनराज्याः काननश्रेण्याः सन्निवेशः रचना येन। तिमिरसंघात इत्यस्य विशेषणम्। गृहीतेन घनपङ्केण पीवराः स्थूलाः ये वनवराह- महिषाः तद्वत् कृष्णा कृष्णवर्णा छविः कान्तिः यस्य सः तिमिरसंघातः तमःसञ्चयः। Prose.—एकचक्रः मे रथः भुवनभ्रान्तिदीर्घम् अध्वानं विलङ्घ्य प्रातः पुनः प्राप्तुं न प्रभवतीति मनसि व्यग्रचिन्तातिभारः सन्ध्याकृष्टावशिष्टकरपरिकरैः स्पृष्टहेमारपङ्क्तिः एषः अर्कः अस्तक्षितिभृति अवस्थितः (सन्) दिक्चक्रं व्याकृष्य नयति इव ॥५॥ पद्मवदने, यातः अस्मि, एषः मम समयः। भवती सुप्ता मया एव प्रतिबोधनीया इति अस्तमस्तकनिविष्टकरः सूर्य्यः सरोरुहिण्याः प्रत्ययनां करोतीव ॥ ६ ॥ Beng. Trans. রাজা—(আনন্দে অবলোকন করিয়া) সখে, ঠিকই লক্ষ্য করিয়াছ। দিবস সমাপ্ত হইয়াছে। কেননা—আমার একচক্রবিশিষ্ট রথ সমস্ত ভুবন ভ্রমণে অতি দীর্ঘপথ অতিক্রমপূর্ব্বক প্রাতঃকালে পুনরায় উদয়াচলে উপস্থিত হইতে পারিবে না এইরূপ মনে করিয়া চিন্তাতিশয়ের দ্বারা অন্তরে ব্যাকুল হইয়া সন্ধ্যাকর্তৃক আকর্ষণাবশিষ্ট (আकृष्ट হওয়া সত্ত্বেও অবশিষ্ট) স্পষ্ট সুবর্ণনির্ম্মিত অরপংক্তিতুল্য —নিজ কিরণসমূহকে আকর্ষণপূর্ব্বক অস্তাচলশিখরে অবস্থিত সূর্য্যদেব যেন দিক্চক্রকে নিজের সমীপে আনয়ন করিতেছেন ॥৫॥ পুনশ্চ— ‘হে পদ্মমুখি, আমার সময় হইয়া আসিয়াছে, আমি এখন যাইতেছি। পুনরায় সুপ্ত (মুকুলিত) অবস্থায় তোমাকে আমিই প্রতিবোধিত করিব’—এইরূপে অস্তাচলশিখরে (অথবা শোকের দ্বারা অবনত মস্তকে) নিজের কর (কিরণ বা হস্ত) স্থাপন করিয়া সূর্য্যদেব সরসীকে (অথবা, পদ্মিনীকে) সান্ত্বনা দিতেছেন ॥৬॥ N. B. [এখানে কোন নায়ক যেন নায়িকার শোকাবনত মস্তকে হাত দিয়া আশ্বাস