रत्नावली नाटिका (सम्राट हर्षवर्धन - शास्त्रीय नाटिका रत्न सम्पूर्ण ४ अङ्क सान्वय सटीक)
Ratnavali Natika of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें274 रत्नावली न्मुखं जीवितं निरोद्धुं गमनात् स्थगितुं बाहुपाशं बाहुबन्धनं क्षणं निधेहि। लतापाशं परित्यज्य बाहुपाशे मे कण्ठे निवेशिते मम जीवितं बाहुपार्श्वावलम्बं सत् संरक्षितं स्यात्। मालिनीवृत्तम् ॥१३॥ अनभ्रा अभ्रशून्या मेघविरहिता इति यावत्। अकालवातावली इत्यादि। इदं पताका- स्थानम्। तदानीमेव आगता देवी। Prose order—अयि जीवितेशि, अमुना ते अतिमात्रसाहसेन अलम्। त्वं त्वरितम् एनं लतापाशं मुञ्च। मम चलितमपि जीवितं निरोद्धुम् इह कण्ठे बाहुपाशं क्षणं निधेहि ॥१३॥ Beng. Trans. सागरिका—( राजाके देखिया ) आरे ए ये महाराज ! ( सहर्षे —आत्मगत ) सत्यइ आज इहाँके देखिया आमार आबार बाँचिबार जन्य इच्छा हइतेछे। अथवा, इहाँर दर्शने कृतार्थ हइया उद्बन्धने सुखे प्राणत्याग करिब। ( प्रकाशे ) छाड़ुन छाड़ुन आमाय, महाराज ! आमि पराधीन, मरिबार आर एमन सुयोग पाइब ना। आपनिओ देवीर निकट निजेके अपराधी करिबेन ना। ( एइ बलिया पुनराय कण्ठे पाशबन्धन दिते उद्यत हइलेन ) राजा—( आनन्देर सहित देखिया ) ए कि ! ए ये आमार प्रिया सागरिका ! ( कण्ठ हइते पाश उन्मोचन करिया ) अयि प्राणेश्वरि ! तोमार एइरूप अतिमात्र दुःसाहसिक कार्य्य करिबार कोन प्रयोजन नाइ। एइ लताबन्धन सत्वर परित्याग कर। आमार गमनोन्मुख प्राणके रक्षा करिबार निमित्त क्षणकेर जन्य आमार एइ कण्ठे बाहुपाश स्थापन कर। १३। ( निज कण्ठे बाहुपाश बन्धन करिया स्पर्शसुख अनुभव करिते करिते विदूषकेर प्रति ) वयस्य, ए ये बिना मेघे वृष्टि ( मेघ ना चाइते जल ) : विदूषक—हाँ, ताहाइ बटे, यदि अवश्य देवी वासवदत्ता अकाल-वातावली हइया ना आसेन ! ( काञ्चनमाला ओ वासवदत्तार प्रवेश ) वासवदत्ता—अयि काञ्चनमाले, सेइरूपे आमार चरणतले निपतित आर्यपुत्रके अवहेला करतः चलिया आसिया अतिशय निष्ठुर कार्य्य करियाछि। एखन निजे गियाइ आर्यपुत्रके अनुनय करिब।