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रत्नावली नाटिका (सम्राट हर्षवर्धन - शास्त्रीय नाटिका रत्न सम्पूर्ण ४ अङ्क सान्वय सटीक)

रत्नावली नाटिका (सम्राट हर्षवर्धन - शास्त्रीय नाटिका रत्न सम्पूर्ण ४ अङ्क सान्वय सटीक)

Ratnavali Natika of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished520 पृष्ठ

पृष्ठ 376, कुल 520 में से

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पृष्ठ 376

चतुर्थोऽङ्कः ३३१ कण्ठाश्लेषम् कण्ठालिङ्गनं समासाद्य प्राप्य भ्रष्टया पतितया अनया रत्नावल्या इत्यर्थः। तुल्यावस्था तुल्या समाना अवस्था यस्याः सा। इयं मम तनुः शरीरम् आश्वास्यते सम्भाव्यते। मम तनुः सागरिकालिङ्गनात् भ्रष्टा, इयं रत्नमालापि सागरिकाकण्ठालिङ्गनात् विच्युता। अतः अनयोः मत्तनुरत्नमाल्योः अवस्था साधारणी एव भवति। यथा काचित् सखी अनया कयाचित् तुल्यावस्थया सख्या समाश्वास्यते तथा इयं मे तनुः च सागरिकाविरहात् क्लिष्टापि अनया तुल्यावस्थामापन्नया रत्नावल्या सम्भाव्यते इति भावः॥४॥ धृतिं 'धैर्य्यं' धारणम्। Prose order. रे प्राणाः, मां कामम् अदक्षिणाः परित्यजत। मद्वचनं कुरुध्वम्। दक्षिणा भवत। शीघ्रं यदि न यात तत् नूनं मुषिताः स्थ। सा गजगामिनी अधुना सुदूरं याता ॥३॥ तस्याः कण्ठाश्लेषं समासाद्य भ्रष्टया अनया तुल्यावस्था सखीव इयं मम तनुः आश्वास्यते ॥४॥ Beng. Trans. রাজা—(উদ্বেগের সহিত সাশ্রুনেত্রে) বয়স্য! কি! অপ্রিয়! তাহা হইলে তিনি কি নিশ্চয়ই প্রাণ পরিত্যাগ করিয়াছেন? হা প্রিয়ে সাগরিকে! (মূর্চ্ছা) বিদূষক—(শশব্যস্তে) প্রিয়বয়স্য, আশ্বস্ত হউন, আশ্বস্ত হউন। রাজা—(সাশ্রুনেত্রে আশ্বস্ত হইয়া) হে প্রাণ, অনুদার আমাকে শীঘ্র পরিত্যাগ কর। সদয় (সরল) হও, আমার কথা রাখ। যদি শীঘ্র আমাকে পরিত্যাগ না কর তাহা হইলে বঞ্চিত হইবে। সেই গজগামিনী এতক্ষণে বহুদূর চলিয়া গিয়াছেন। ৩। বিদূষক—আপনি অন্য রকম মনে করিবেন না। সে বেচারীকে দেবী উজ্জয়িনীতে পাঠাইয়া দিয়াছেন বলিয়া শুনা যাইতেছে। সেইজন্য আমি অপ্রিয় বলিয়া বলি নাই। রাজা—কি! উজ্জয়িনীতে পাঠাইয়া দিয়াছেন! হায়, আমার প্রতি দেবীর কিরূপ প্রতিকূলাচরণ! বয়স্য, তোমাকে এ কথা কে বলিল? বিদূষক—ওহে, সুসঙ্গতা বলিয়াছে। আরও আমার হস্তে কোন প্রয়োজনবশতঃ তিনি এই রত্নমালা প্রেরণ করিয়াছেন। রাজা—অন্য আর কি? আমাকে আশ্বস্ত করিবার জন্যই। বয়স্য, উহা লইয়া এস। (বিদূষক আনিলেন)

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