रत्नावली नाटिका (सम्राट हर्षवर्धन - शास्त्रीय नाटिका रत्न सम्पूर्ण ४ अङ्क सान्वय सटीक)
Ratnavali Natika of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
पृष्ठ 381, कुल 520 में से
संदर्भ में पढ़ेंइति शेषः। अस्तव्यस्तशिरस्त्रशस्त्रकषणैः इति पाठे व्यस्तानि विक्षिप्तानि शिरस्त्राणि किरीटानि यैः तानि व्यस्तशिरस्त्राणि। अस्तानि निक्षिप्तानि च व्यस्तशिरस्त्राणि शस्त्राणि च, तेषां कषणैः प्रहारैः। व्यूढासृक्सरिति व्यूढं विध्वस्तं विस्तृतं इति यावत् यत् असृक् शोणितं तस्य सरित् नदी तस्याम्। क्वणत्प्रहरणे क्वणन्ति शब्दायमानानि प्रहरणानि आयुधानि यस्मिन् तस्मिन्। वर्म्मोल्लसद्वह्निनि वर्म्मभ्यः कवचेभ्यः उल्लसन् निर्गच्छन् वह्निः यस्मिन् तस्मिन्, वर्म्मणः लौहमयत्वात् अस्त्रादिघर्षणेन अग्न्युत्पत्तिरित्यर्थः। एतादृशे आजिमुखे रणारम्भे प्रधाने बले मुख्ये सैन्ये भग्ने नष्टे सति स कोशलपतिः मत्तद्विपस्थः मत्तः द्विपः तस्मिन् स्थितः उपविष्टः अपि एकेन एव रुमण्वता आहूय शरशतैः हतः ॥६॥ Prose order—विन्ध्याद् निर्गत्य तत्क्षणम् अपरेण विन्ध्येन इव द्विरदपति- घटापीडबन्धेन दिग्भागान् रुन्धन् योद्धुम् अभिमुखोऽभवत्। वेगाद् बाणान् विमुञ्चन् समदगजघटोत्पिष्टपत्तिः रुमण्वान् वाञ्छितामविगणितरभसः ( सन् ) क्षणेन निपत्य तं प्रत्यच्छत् ॥५॥ अस्तव्यस्तशिरस्त्रशस्त्रकषणैः कृत्तोत्तमाङ्गे क्षणं व्यूढासृक्सरिति क्वणत्प्रहरणे वर्म्मोल्लसद्वह्निनि आजिमुखे प्रधाने बलि भग्ने एकेन एव रुमण्वता आहूय शरशतैः मत्तद्विपस्थः स कोशलपतिः हतः ॥६॥ Beng. Trans. বিদূষক— ( সভয়ে চতুর্দ্দিকে অবলোকন করিয়া ) আপনি এখানে উচ্চৈঃস্বরে কথা বলিবেন না। কেহ কোথায় এখানে চলাফেরা করিতে পারে। ( বেত্রহস্তে বসুন্ধরার প্রবেশ ) বসুন্ধরা— ( অগ্রসর হইয়া ) মহারাজের জয় হউক ! মহারাজ, রুমণ্বানের ভাগিনেয় বিজয়বৰ্ম্মা কিছু প্রীতিকর সংবাদ বিজ্ঞাপন করিবার জন্য দ্বারে অপেক্ষা করিতেছে। রাজা— বসুন্ধরে, শীঘ্রই তাহাকে লইয়া আইস। বসুন্ধরা— যে আজ্ঞা মহারাজ! ( নিষ্ক্রান্ত হইয়া বিজয়বর্ম্মার সহিত পুনঃ প্রবেশ করিয়া ) বিজয়বর্ম্মন্, এই যে মহারাজ। আপনি অগ্রসর হউন। বিজয়বর্ম্মা— ( অগ্রসর হইয়া ) মহারাজের জয় হউক ! মহারাজ, রুমণ্বানের যুদ্ধজয়ে আপনার সৌভাগ্যলাভ হউক !