भारतकोश
रत्नावली नाटिका (सम्राट हर्षवर्धन - शास्त्रीय नाटिका रत्न सम्पूर्ण ४ अङ्क सान्वय सटीक)

रत्नावली नाटिका (सम्राट हर्षवर्धन - शास्त्रीय नाटिका रत्न सम्पूर्ण ४ अङ्क सान्वय सटीक)

Ratnavali Natika of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished520 पृष्ठ

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पृष्ठ 64

प्रथमोऽङ्कः 19 सा एव अवस्था यस्याः तस्याः। सम्भावनम् स्वीकरणं प्राप्तिरिति यावत्। अत्र द्वौ शब्दौ कीर्त्तिद्वयस्य मङ्गलपरं सूचयतः। स्पृशन्ति उपतिष्ठन्ति। अभ्युदयाः सौभाग्यातिशयाः। निष्पन्नप्रायमपि समाप्तप्रायमपि प्रभुप्रयोजनं प्रभुमुद्दिश्य कर्त्तव्यम्। धृतिम् सन्तोषम् आवहति आनयति। भृत्यभावः सेवाकार्य्यं प्रभोरित्यर्थः। तत्र हेतुमाह कुतः इति। Beng. Trans. ( তারপর যথানির্দ্দিষ্ট যৌগন্ধরায়ণ প্রবেশ করিলেন ) যৌগন্ধরায়ণ—হাঁ ইহাই ঠিক। এ বিষয়ে আর সন্দেহ কি? ( পুনর্ব্বার 'দ্বীপাদ্দন্য- স্মাৎ' এই শ্লোক পাঠ করিয়া ) তাহা না হইলে সিদ্ধপুরুষের আদেশে বিশ্বাস স্থাপনপূর্ব্বক সিংহলরাজকুমারীকে ( মহারাজের নিমিত্ত ) প্রার্থনা করিলে সমুদ্রে যানভঙ্গনিবন্ধন তিনি ( রাজকুমারী ) জলমগ্ন হইলে তাঁহার কাষ্ঠফলকপ্রাপ্তিই বা কিরূপে হইল? আর সিংহল হইতে প্রত্যাগত কোশাম্বীদেশীয় বণিক্‌ই বা সেই অবস্থায় তাঁ