ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1186, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंहे प्रातःकाल जानने योग्य अश्विनीकुमारो! हमारे लिए दिव्य जल मेघों के छिद्र से दो एवं हमारे लिए सरिताओं को बहाओ. (२१) कदा वां तौग्र्यो विधत्समुद्रे जहितो नरा. यद्वां रथो विभिष्पतात्.. (२२) हे नेता अश्विनीकुमारो! समुद्र में फेंके हुए तुग्रपुत्र भुज्यु ने स्तुति द्वारा तुम्हें न जाने कब बुलाया था? इसीसे अश्वों सहित तुम्हारा रथ वहां पहुंच गया. (२२) युवं कणवाय नासत्यापिरिप्ताय हर्म्ये. शश्वदूतीर्दशस्यथ:.. (२३) हे अश्विनीकुमारो! तुमने महल के निचले भाग में राक्षस शत्रुओं द्वारा बांधे गए कण्व ऋषि को अनेक प्रकार की रक्षाएं प्रदान की थीं. (२३) ताभिरा यातमूतिभिर्नव्यसीभिः सुशस्तिभिः. यद्वां वृषण्वसू हुवे.. (२४) हे अभिलाषापूरक एवं धनसंपन्न अश्विनीकुमारो! मैं तुम्हें जब बुलाऊं, तब तुम अपने नवीन एवं प्रशंसनीय रक्षासाधनों के साथ आओ. (२४) यथा चित्कण्वमावतं प्रियमधमुपस्तुतम्. अत्रिं शिञ्जारमश्विना.. (२५) हे अश्विनीकुमारो! तुमने जिस प्रकार कण्व, आवत, उपस्तुत एवं स्तुतिकर्त्ता अत्रि की रक्षा की थी, उसी प्रकार हमारी रक्षा करो. (२५) यथोत कृत्व्ये धनेऽशुं गोष्वगस्त्यम्. यथा वाजेषु सोभरिम्.. (२६) हे अश्विनीकुमारो! तुमने जिस प्रकार अंशु के धन, अगस्त्य की गायों और सौभरि के अन्न की रक्षा की थी, उसी प्रकार हमारी रक्षा करो. (२६) एतावद्वां वृषण्वसू अतो वा भूयो अश्विना. गृणन्तः सुम्नमीमहे.. (२७) हे अभिलाषापूरक एवं धनयुक्त अश्विनीकुमारो! हम तुम्हारी स्तुति करते हुए तुमसे सीमित एवं सीमा से अधिक धन मांगते हैं. (२७) रथं हिरण्यवन्धुरं हिरण्याभीषुमश्विना. आ हि स्थाथो दिविस्पृशम्.. (२८) हे अश्विनीकुमारो! सोने द्वारा निर्मित सारथिस्थान वाले एवं सुनहरी लगामों वाले अपने रथ पर बैठकर आओ. (२८) हिरण्ययी वां रभीरीषा अक्षो हिरण्ययः. उभा चक्रा हिरण्यया.. (२९) हे अश्विनीकुमारो! तुम्हें ढोने वाले रथ का जुआ सोने का है, धुरी सोने की है एवं पहिए सोने के हैं. (२९) ebook converter DEMO Watermarks*