ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1187, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंतेन नो वाजिनीवसू परावतश्चिदा गतम्. उपेमां सुष्टुतिं मम.. (३०) हे अन्न एवं धन के स्वामी अश्विनीकुमारो! इस रथ पर बैठकर तुम दूर से भी आओ. तुम हमारी शोभनस्तुति के समीप आओ. (३०) आ वहेथे पराकात्पूर्वीरुश्नन्तावश्विना. इषो दासीरमर्त्या.. (३१) हे मरणरहित अश्विनीकुमारो! तुम दासों की नगरियों को भग्न करते हुए दूर से हमारे लिए अन्न लाओ. (३१) आ नो द्युम्नैरा श्रवोभिरा राया यातमश्विना. पुरुश्चन्द्रा नासत्या.. (३२) हे बहुतों के मित्र अश्विनीकुमारो! तुम हमारे पास अन्न, यश और धन लेकर आओ. (३२) एह वां प्रुषितप्सवो वयो वहन्तु पर्णिनः. अच्छा स्वध्वरं जनम्.. (३३) हे अश्विनीकुमारो! स्वाभाविक रूप से चिकने एवं पंखों वाले पक्षियों के समान शीघ्रगामी घोड़े तुम्हें शोभनयज्ञ वाले यजमान के पास ले जावें. (३३) रथं वामनुगायसं य इषा वर्तते सह. न चक्रमभि बाधते.. (३४) हे अश्विनीकुमारो! तुम्हारा अन्न लेकर चलने वाला एवं स्तोताओं द्वारा प्रशंसा किया हुआ रथ एवं रथ का पहिया शत्रुसेना द्वारा बाधित नहीं होता. (३४) हिरण्ययेन रथेन द्रवत्पाणिभिरश्वैः. धीजवना नासत्या.. (३५) हे मन के समान तेज चलने वाले अश्विनीकुमारो! आगे पैर बढ़ाने वाले घोड़ों से युक्त, स्वर्णनिर्मित रथ द्वारा हमारे पास आओ. (३५) युवं मृगं जागृवांसं स्वदथो वा वृषण्वसू. ता नः पृङ्क्तमिषा रयिम्.. (३६) हे अभिलाषापूरक धन वाले अश्विनीकुमारो! तुम सदा जगाने वाला एवं खोजने योग्य सोमरस पीते हो. तुम हमें अन्न दो. (३६) ता मे अश्विना सनीनां विद्यातं नवानाम्. यथा चिच्चैद्यः कशुः शतमुष्ट्रानां ददत्सहस्रा दश गोनाम्.. (३७) हे अश्विनीकुमारो! तुम मुझे देने के लिए श्रेष्ठ एवं भोगयोग्य धन को जानो. चेदिवंश में उत्पन्न राजा कशु ने मुझे सौ ऊंट और हजार गाएं दी हैं. तुम उन्हें जानो. (३७) यो मे हिरण्यसन्दृशो दश राज्ञो अमंहत. ebook converter DEMO Watermarks*