भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 1192, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 1192

हे वृद्धिप्राप्त एवं वज्रधारी इंद्र! हम बुद्धिमानों ने जीवन पाने के लिए तुम्हारी स्तुति का विस्तार किया है. (३३) अभि कण्वा अनूषतापो न प्रवता यतीः. इन्द्रं वनन्वती मतिः.. (३४) कण्वगोत्रीय ऋषि इंद्र की स्तुति करते हैं. जिस प्रकार जल नीचे की ओर बहते हैं, उसी प्रकार हमारी स्तुति अपने इंद्र की सेवा के उपयुक्त बन जाती है. (३४) इन्द्रमुक्थानि वावृधुः समुद्रमिव सिन्धवः. अनुत्तमन्युमजरम्.. (३५) जिस प्रकार सरिताएं सागर को बढ़ाती हैं, उसी प्रकार स्तुतियां इंद्र को बढ़ाती हैं. जरारहित इंद्रिवारित कोप वाले हैं. (३५) आ नो याहि परावतो हरिभ्यां हर्यताभ्याम्. इममिन्द्र सुतं पिब.. (३६) हे इंद्र! सुंदर घोड़ों की सहायता से दूर देश से हमारे पास आओ एवं इस निचोड़े हुए सोमरस को पिओ. (३६) त्वामिद्वृत्रहन्तम जनासो वृक्तबर्हिषः. हवन्ते वाजसातये.. (३७) हे शत्रुनाशकों में श्रेष्ठ इंद्र! कुश उखाड़ने वाले लोग अन्न पाने के लिए तुम्हें बुलाते हैं. (३७) अनु त्वा रोदसी उभे चक्रं न वर्त्येतशम्. अनु सुवानास इन्दवः.. (३८) हे इंद्र! द्यावा-पृथिवी उसी प्रकार तुम्हारे पीछे चलते हैं, जिस प्रकार रथ के पहिए घोड़ों के पीछे चलते हैं. निचोड़ा हुआ सोमरस भी तुम्हारे पीछे चलता है. (३८) मन्दस्वा सु स्वर्णर उतेन्द्र शर्यणावति. मत्स्वा विवस्वतो मती.. (३९) हे इंद्र! शर्यणा देश के समीप वाले तालाब पर सभी ऋषियों ने यज्ञ आरंभ किया है. उस में तुम आनंदयुक्त बनो एवं सेवकों की स्तुतियों से प्रसन्नता पाओ. (३९) वावृधान उप द्यवि वृषा वज्रयरोरवीत्. वृत्रहा सोमपातमः.. (४०) अतिशय वृद्धिप्राप्त, अभिलाषापूरक, वज्रधारी, सोमरस पीने वालों में उत्तम एवं वृत्रनाशक इंद्र द्युलोक के समीप भारी शब्द करते हैं. (४०) ऋषिर्हि पूर्वजा अस्येक ईशान ओजसा. इन्द्र चोष्कूयसे वसु.. (४१) हे इंद्र! तुम पहले जन्मे हुए ऋषि हो. तुम अपने बल से देवों के एकमात्र स्वामी हो. तुम हमें बार-बार धन दो. (४१) ebook converter DEMO Watermarks*