ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1193, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंअस्माकं त्वा सुताँ उप वीतपृष्ठा अभि प्रयः. शतं वहन्तु हरयः.. (४२) हे इंद्र! हमारा सोम एवं अन्न ग्रहण करने के लिए प्रशंसित पीठ वाले सौ घोड़े तुम्हें लावें. (४२) इमां सु पूव्र्याँ धियं मधोर्घृतस्य पिप्युषीम्. कण्वा उक्थेन वावृधुः.. (४३) कण्वगोत्रीय ऋषि उक्थ मंत्रों द्वारा पूर्वजों का मधुर जल बढ़ाने वाला यज्ञकर्म उन्नत करें. (४३) इन्द्रमिद्दिमहीनां मेधे वृणीत मर्त्यः. इन्द्रं सनिष्युरूतये.. (४४) मनुष्य लोग धन की इच्छा से अथवा रक्षा पाने के लिए विशेषरूप से महान् देवों के बीच में इंद्र को ही स्वीकार करते हैं. (४४) अर्वाञ्चं त्वा पुरुष्टुत प्रियमेधस्तुता हरी. सोमपेयाय वक्षतः.. (४५) हे बहुतों द्वारा स्तुत इंद्र! यज्ञ को प्रेम करने वाले ऋषियों द्वारा स्तुतिप्राप्त सौ घोड़े सोमरस पीने के लिए तुम्हें हमारे सामने लावें. (४५) शतमहं तिरिन्दिरे सहस्रं पर्शावा ददे. राधांसि याद्वानाम्.. (४६) हे इंद्र! मैंने पर्शु के पुत्र तिरिंदर से सैकड़ों एवं हजारों की संख्या में धन ग्रहण किया है. (४६) त्रीणि शतान्वर्वतां सहस्रा दश गोनाम्. ददुष्पज्राय साम्ने.. (४७) साम का ज्ञान रखने वाले पज्र को राजा तिरिंदर ने तीन सौ घोड़े एवं दस हजार गाएं दी थीं. (४७) उदानट् ककुहो दिवमुष्ट्राञ्चतुर्युजो ददत्. श्रवसा याद्धं जनम्.. (४८) राजा तिरिंदर ने उन्नति पाकर सोने के चार बोझों सहित ऊंट एवं दासों के रूप में यदुवंशीय राजा को दिए. इस प्रकार उसने स्वर्ग प्राप्त किया. (४८) सूक्त—७ देवता—मरुद्गण प्र यद्धस्त्रिष्टुभमिषं मरुतो विप्रो अक्षरात्. वि पर्वतेषु राजथ.. (१) हे मरुतो! जब विद्वान् ब्राह्मण तीनों सवनों में प्रशंसनीय अन्न डालते हैं, तब तुम पर्वतों में प्रकाशित होते हो. (१) ebook converter DEMO Watermarks*