भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 1229, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 1229

यस्य ते अग्ने अन्ये अग्नय उपक्षितो वयाइव. विपो न द्युम्ना नि युवे जनानां तव क्षत्राणि वर्धयन्.. (३३) हे अग्नि! जिस प्रकार वृक्ष में शाखाएं रहती हैं, उसी प्रकार तुम में गार्हपत्य आदि अन्य अग्नियां समाहित हैं. मनुष्यों के मध्य रहने वाला मैं तुम्हारी शक्तियां अपनी स्तुति द्वारा बढ़ाता हुआ अन्य स्तोताओं के सामने उज्ज्वल यश पाऊंगा. (३३) यमादित्यासो अद्रुहः पारं नयथ मर्त्यम्. मघोनां विश्वेषां सुदानवः.. (३४) हे द्रोहरहित एवं शोभन-दान वाले आदित्यो! सभी हव्यधारी मानवों के प्रति जिसे तुम प्रारंभ किए कर्म के अंत तक पहुंचाते हो, वह फल पाता है. (३४) यूयं राजानः कं चिच्चर्षणीसहः क्षयन्तं मानुषाँ अनु. वयं ते वो वरुण मित्रार्यमन्त्स्यामेदृतस्य रथ्यः.. (३५) हे शोभायुक्त एवं शत्रुओं को हराने वाले आदित्यो! तुम घातक मनुष्यों को नष्ट करो. हे वरुण, मित्र एवं अर्यमा देवो! हम ही तुम्हारे यज्ञ के नेता होंगे. (३५) अदान्मे पौरुकुत्स्यः पञ्चाशतं त्रसदस्युर्वधूनाम्. मंहिष्ठो अर्यः सत्पतिः.. (३६) उत्तम दानी, स्वामी, सज्जनों के पालक एवं पुरुकुत्स के पुत्र त्रसदस्यु ने मुझे पचास पत्नियां प्रदान की हैं. (३६) उत मे प्रयियोर्वयियोः सुवास्त्वा अधि तुग्वनि. तिसृणां सप्ततीनां श्यावः प्रणेता भुवद्वसुर्द्दियानां पतिः.. (३७) शोभन निवास वाली सरिता के तट पर रहने वाले, काले रंग के बैलों को आगे बढ़ाने वाले, पूज्य, धनदान करने में समर्थ एवं दो सौ दस गायों के स्वामी त्रसदस्यु ने मुझे धन एवं वस्त्र दिए हैं. (३७) सूक्त—२० देवता—मरुद्गण आ गन्ता मा रिषण्यत प्रस्थावानो माप स्थाता समन्यवः. स्थिरा चिन्नमयिष्णवः.. (१) हे प्रस्थान करने वाले मरुतो! आओ. तुम हमें मत मारना. तुम समानरूप से क्रोधित होने पर दृढ़ पर्वतों को भी कंपा सकते हो. तुम हमसे दूर मत रहो. (१) वीळुपविभिर्मरुत ऋभुक्षण आ रुद्रासः सुदीतिभिः. इषा नो अद्या गता पुरुस्पृहो यज्ञमा सोभरीयवः.. (२)