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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

यस्य ते अग्ने अन्ये अग्नय उपक्षितो वयाइव. विपो न द्युम्ना नि युवे जनानां तव क्षत्राणि वर्धयन्.. (३३) हे अग्नि! जिस प्रकार वृक्ष में शाखाएं रहती हैं, उसी प्रकार तुम में गार्हपत्य आदि अन्य अग्नियां समाहित हैं. मनुष्यों के मध्य रहने वाला मैं तुम्हारी शक्तियां अपनी स्तुति द्वारा बढ़ाता हुआ अन्य स्तोताओं के सामने उज्ज्वल यश पाऊंगा. (३३) यमादित्यासो अद्रुहः पारं नयथ मर्त्यम्. मघोनां विश्वेषां सुदानवः.. (३४) हे द्रोहरहित एवं शोभन-दान वाले आदित्यो! सभी हव्यधारी मानवों के प्रति जिसे तुम प्रारंभ किए कर्म के अंत तक पहुंचाते हो, वह फल पाता है. (३४) यूयं राजानः कं चिच्चर्षणीसहः क्षयन्तं मानुषाँ अनु. वयं ते वो वरुण मित्रार्यमन्त्स्यामेदृतस्य रथ्यः.. (३५) हे शोभायुक्त एवं शत्रुओं को हराने वाले आदित्यो! तुम घातक मनुष्यों को नष्ट करो. हे वरुण, मित्र एवं अर्यमा देवो! हम ही तुम्हारे यज्ञ के नेता होंगे. (३५) अदान्मे पौरुकुत्स्यः पञ्चाशतं त्रसदस्युर्वधूनाम्. मंहिष्ठो अर्यः सत्पतिः.. (३६) उत्तम दानी, स्वामी, सज्जनों के पालक एवं पुरुकुत्स के पुत्र त्रसदस्यु ने मुझे पचास पत्नियां प्रदान की हैं. (३६) उत मे प्रयियोर्वयियोः सुवास्त्वा अधि तुग्वनि. तिसृणां सप्ततीनां श्यावः प्रणेता भुवद्वसुर्द्दियानां पतिः.. (३७) शोभन निवास वाली सरिता के तट पर रहने वाले, काले रंग के बैलों को आगे बढ़ाने वाले, पूज्य, धनदान करने में समर्थ एवं दो सौ दस गायों के स्वामी त्रसदस्यु ने मुझे धन एवं वस्त्र दिए हैं. (३७) सूक्त—२० देवता—मरुद्गण आ गन्ता मा रिषण्यत प्रस्थावानो माप स्थाता समन्यवः. स्थिरा चिन्नमयिष्णवः.. (१) हे प्रस्थान करने वाले मरुतो! आओ. तुम हमें मत मारना. तुम समानरूप से क्रोधित होने पर दृढ़ पर्वतों को भी कंपा सकते हो. तुम हमसे दूर मत रहो. (१) वीळुपविभिर्मरुत ऋभुक्षण आ रुद्रासः सुदीतिभिः. इषा नो अद्या गता पुरुस्पृहो यज्ञमा सोभरीयवः.. (२)

दीप्तिशाली निवासस्थान वाले एवं रुद्रपुत्र मरुतो! तुम ऐसे रथों द्वारा आओ, जिनके पहियों की नेमियां शोभन दीप्ति वाली हैं. हे बहुतों द्वारा अभिलषित मरुतो! मुझ सौभरि के प्रति मन में दयालु बनकर एवं अन्न लेकर आज यज्ञ में आओ. (२) विद्मा हि रुद्रियाणां शुष्ममुग्रं मरुतां शिमीवताम्. विष्णोरेषस्य मीळ्हुषाम्.. (३) हम कर्म वाले एवं कृपाजल से सींचने वाले रुद्रपुत्र मरुतों एवं विष्णु के उग्रबल को जानते हैं. (३) वि द्वीपानि पापतन्तिष्ठद्दुच्छुनोभे युजन्त रोदसी. प्र धन्वान्यैरत शुभ्रखादयो यदेजथ स्वभानवः.. (४) हे शोभन आयुधों वाले एवं विशिष्ट दीप्ति वाले मरुतो! तुम्हारे आने से जो कंपन होता है, उससे सारे द्वीप गिर पड़ते हैं, वृक्षादि स्थावर दुःखी होते हैं, द्यावा-पृथिवी दोनों कांप उठते हैं एवं गमनशील जल बहने लगता है. (४) अच्युता चिद्द्रो अज्ज्मन्ना नानदति पर्वतासो वनस्पतिः. भूमिर्यमेषु रेजते.. (५) हे मरुतो! जिस समय तुम युद्ध में जाते हो, उस समय अच्युत पर्वत एवं वनस्पतियां बार-बार शब्द करती हैं तथा धरती कांपती है. (५) अमाय वो मरुतो यातवे द्यौर्जिहीत उत्तरा बृहत्. यत्रा नरो देदिशते तनूष्वा त्वक्षांसि बाह्वोजसः.. (६) हे मरुतो! तुम्हारे बलपूर्वक गमन को स्थान देने के विचार से द्युलोक विशाल अंतरिक्ष से ऊपर चला गया है. उस अंतरिक्ष में बहुशक्तिसंपन्न एवं नेता मरुद्गण अपने शरीरों में दीप्ति आभरण धारण करते हैं. (६) स्वधामनु श्रियं नरो महि त्वेषा अमवन्तो वृषप्सवः. वहन्ते अहुतप्सवः.. (७) नेता, दीप्त, शक्तिशाली, वर्षारूप एवं कुटिलतारहित मरुद्गण हव्य अन्न पाने के लिए महती शोभा धारण करते हैं. (७) गोभिर्वाणो अज्यते सोभरीणां रथे कोशे हिरण्यये. गोबन्धवः सुजातास इषे भुजे महान्तो नः स्परसे नु.. (८) सौभरि आदि ऋषियों की स्तुतियों से सोने के बने रथ के मध्यभाग में मरुतों की वीणा प्रकट हो रही हैं. गाएं जिनकी माता हैं, शोभन जन्म वाले एवं महानुभाव मरुद्गण हमारे अन्न, भोग एवं प्रसन्नता के लिए दयालु हों. (८) प्रति वो वृषदञ्जयो वृष्णो शर्धाय मारुताय भरध्वम्. हव्या वृषप्रयाव्णे.. (९) ebook converter DEMO Watermarks*

हे सोम की वर्षा से सींचने वाले अध्वर्युगण! वर्षा करने वाले मरुतों की शक्ति बढ़ाने के लिए हव्य अर्पित करो. इस हव्य के द्वारा मरुद्गण वर्षाकारक एवं उत्तमगति वाले बनते हैं. (९) वृषणश्वेन मरुतो वृषप्सुना रथेन वृषनाभिना. आ श्येनासो न पक्षिणो वृथा नरो हव्या नो वीतये गत.. (१०) हे नेता मरुतो! सेचन-समर्थ अश्वों से युक्त, वर्षाकारक रूप से युक्त एवं वर्ष की नाभियुक्त रथ पर चढ़कर हव्य के समीप इस प्रकार शीघ्र आओ, जिस प्रकार बाज पक्षी आता है. (१०) समानमञ्ज्वेषणां वि भ्राजन्ते रुक्मासो अधि बाहुषु. दविद्युतत्यृष्टयः.. (११) इन मरुतों का रूप प्रकट करने वाला आभरण समान है, इनकी भुजाओं में तेजस्वी सुनहरे हार विराजते हैं. इनके हाथों में आयुध चमकते हैं. (११) त उग्रासो वृषण उग्रबाहवो नकिष्टनूषु येतिरे. स्थिरा धन्वान्यायुधा रथेषु वोऽनीकेष्वधि श्रियः.. (१२) उग्र, वर्षाकारक एवं शक्तिशाली भुजाओं वाले मरुद्गण अपने शरीर की रक्षा का कोई यत्न नहीं करते. हे मरुतो! तुम्हारे रथों पर धनुष एवं बाण स्थिर है. सेना के अग्रभाग में तुम्हारी ही विजय होती है. (१२) येषामर्णो न सप्रथो नाम त्वेषं शश्वतामेकमिद्धुजे. वयो न पित्र्यं सहः.. (१३) जल के समान सब ओर विस्तृत एवं दीप्तिशाली मरुतों का नाम एक है, फिर भी वे स्तोताओं के भोग के लिए उसी प्रकार यथेष्ट हैं. जिस प्रकार पिता से मिला हुआ अन्न होता है. (१३) तान्वन्दस्व मरुतस्ताँ उप स्तुहि तेषा हि धुनीनाम्. अराणां न चरमस्तदेषां दाना मह्ना तदेषाम्.. (१४) हे अंतरात्मा! उन मरुतों की स्तुति करो एवं वंदना करो. मरुतों का दान महिमायुक्त है. महान् मरुतों की अपेक्षा हम उसी प्रकार छोटे हैं, जिस प्रकार किसी महान् स्वामी का हीन सेवक होता है. (१४) सुभगः स व ऊतिष्वास पूर्वासु मरुतो व्युष्टिषु. यो वा नूनमुतासति.. (१५) हे मरुतो! तुम्हारी रक्षा प्राप्त करके स्तोता प्राचीनकाल में शोभन धनवाला बना था. जो स्तोता है, वह अवश्य तुम्हारा भक्त बनता है. (१५) ebook converter DEMO Watermarks*

यस्य वा यूयं प्रति वाजिनो नर आ हव्या वीतये गथ. अभि ष द्युम्नैरुत वाजसातिभिः सुम्ना वो धूतयो नशत्.. (१६) हे नेताओ एवं सबको कंपित करने वाले मरुतो! जिस हव्यधारी यजमान का हव्य भोग करने के लिए तुम आते हो, वह तुम्हारे दीप्तिशाली अन्नों एवं अन्न के भोगों द्वारा तुम्हारे सुखों को चारों ओर विस्तृत करता है. (१६) यथा रुद्रस्य सूनवो दिवो वशन्त्यसुरस्य वेधसः. युवानस्तथेदसत्.. (१७) रुद्रपुत्र, जल के कर्त्ता एवं सदा युवा मरुद्गण द्युलोक से आकर हमें चाहें, हमारी स्तुति में इतना प्रभाव हो. (१७) ये चार्चन्ति मरुतः सुदानवः स्मन्मीळहुषश्चरन्ति ये. अतश्चिदा न उप वस्यसा हृदा युवान आ ववृध्वम्.. (१८) जो शोभनदान वाले यजमान मरुतों की पूजा करते हैं एवं जो वर्षाकारक मरुतों की हव्य द्वारा सेवा करते हैं, हम उन दोनों प्रकार के हैं. हे युवा मरुतो! हमें धन देने का निश्चय मन में करके हमसे मिलो. (१८) यून ऊ षु नविष्ठया वृष्णः पावकाँ अभि सोभरे गिरा. गाय गा इव चर्कृषत्.. (१९) हे सौभरि ऋषि! तुम नित्य तरुण, वर्षाकारक एवं पवित्रकर्त्ता मरुतों की स्तुति अतिशय नवीन वाक्यों द्वारा उस सुंदर रूप से करो, जिस प्रकार किसान अपने बैलों की प्रशंसा करता है. (१९) साहा ये सन्ति मुष्टिहेव हव्यो विश्वावसु पृत्सु होतृषु. वृष्णश्चन्द्रान्न सुश्रवस्तमान् गिरा वन्दस्व मरुतो अह.. (२०) मरुद्गण समस्त योद्धाओं द्वारा आह्वान करने पर शत्रुओं को हराते हैं. हे सौभरि! इस समय बुलाने योग्य मल्ल के समान, वर्षाकारक, सबको प्रसन्न करने वाले एवं परम यशस्वी मरुतों की स्तुति शोभनवचनों द्वारा करो. (२०) गावश्चिद्घा समन्यवः सजात्येन मरुतः सबन्धवः. रिहते ककुभो मिथः.. (२१) हे समान क्रोध वाले मरुतो! तुम्हारी माता गाएं भी समान जाति एवं समान बंधु वाली होने के कारण दिशाओं के रूप में एक-दूसरों को चाटती हैं. (२१) मर्तश्चिद्धो नृतवो रुक्मवक्षस उप भ्रातृत्वमायति. अधि नो गात मरुतः सदा हि व आपित्वमस्ति निध्रुवि.. (२२) हे नृत्य करने वाले एवं वक्षस्थल पर सोने के आभूषण धारण करने वाले मरुतो! मनुष्य ebook converter DEMO Watermarks*

भी तुम्हारी मित्रता पाने के लिए तुम्हारे पास आता है. इसलिए तुम हमारे पक्ष के बनकर बोलो. अत्यंत धारण करने योग्य यज्ञ में तुम्हारा बंधुत्व सदा वर्तमान रहता है. (२२) मरुतो मारुतस्य न आ भेषजस्य वहता सुदानवः. यूयं सखायः सप्तयः.. (२३) हे शोभन दान वाले, सखा एवं गतिशील मरुतो! तुम अपनी ओषधि हमारे समीप लाओ. (२३) याभिः सिन्धुमवथ याभिस्तूर्वथ याभिर्दशस्यथा क्रिविम्. मयो नो भूतोतिभिर्मयोभुवः शिवाभिरसच्चद्विषः.. (२४) हे सुख देने वाले एवं शत्रुशून्य मरुतो! जिन रक्षासाधनों द्वारा तुम समुद्र की रक्षा करते हो, जिनके द्वारा स्तोताओं के शत्रुओं को नष्ट करते हो, जिनसे तुमने गौतम को कुआं दिया था, सब प्रकार का कल्याण करने वाले उन्हीं रक्षासाधनों द्वारा हमें सुरक्षा प्रदान करो. (२४) यत्सिन्धौ यदसिक्न्यां यत्समुद्रेषु मरुतः सुबर्हिषः. यत्पर्वतेषु भेषजम्.. (२५) हे शोभन यश वाले मरुतो! सिंधु तथा असिक्नी नदी समुद्रों एवं पहाड़ों में जो ओषधियां हैं. (२५) विश्वं पश्यन्तो बिभृथा तनूष्वा तेना नो अधि वोचत. क्ष्मा रपो मरुत आतुरस्य न इष्कर्ता विह्रुतं पुनः.. (२६) वे सब ओषधियां पहचानकर हमारे शरीर की चिकित्सा के लिए ले आओ. हे मरुतो! हम लागों के बाधा वाले अंक को इस प्रकार पुनः ठीक करो, जिससे रोगी का रोग दूर हो जाए. (२६) सूक्त—२१ देवता—इंद्र वयमु त्वामपूर्व स्थूरं न कच्चिद्भरन्तोऽवस्यवः. वाजे चित्रं हवामहे.. (१) हे अपूर्व इंद्र! हम रक्षा पाने की इच्छा से तुम्हें सोमरस द्वारा पुष्ट करके इस प्रकार बुलाते हैं, जैसे कोई गुणी मनुष्य को बुलाता है. तुम संग्राम में भांति-भांति के रूप धारण करते हो. (१) उप त्वा कर्मन्नूतये स नो युवोग्रश्चक्राम यो धृषत्. त्वामिद्ध्वयवितारं ववृमहे सखाय इन्द्र सानसिम्.. (२) हे इंद्र! हम यज्ञकर्म की रक्षा के लिए तुम्हारे पास आते हैं. युवा, उग्र एवं ebook converter DEMO Watermarks*

शत्रुपराभवकारी इंद्र हमारे सामने आवें। हे इंद्र! तुम्हारे मित्र हम लोग सेवा करने योग्य एवं सबके रक्षक तुम्हारा वरण करते हैं। (२) आ याहीम इन्द्रवोऽश्वपते गोपत उर्वरापते। सोमं सोमपते पिब.. (३) हे अश्वों के स्वामी, गायों का पालन करने वाले, उपजाऊ भूमि के स्वामी एवं सेनापति इंद्र! यहां आओ और सोमरस पिओ। (३) वयं हि त्वा बन्धुमन्तमबन्धवो विप्रास इन्द्र येमिम। या ते धामानि वृषभ तेभिरा गहि विश्वेभिः सोमपीतये.. (४) हे बांधवों वाले इंद्र! हम बांधवहीन विप्र तुम्हारे समीप मित्रता से आते हैं। हे अभिलाषापूरक इंद्र! तुम अपने समस्त तेजों के साथ सोमरस पीने के लिए आओ। (४) सीदन्तस्ते वयो यथा गोश्रीते मधौ मदिरे विवक्षणे। अभि त्वामिन्द्र नोनुमः.. (५) हे इंद्र! गाय के दूध-दही से मिले हुए मदकारक एवं स्वर्गप्राप्ति के हेतु तुम्हारे सोमरस में हम पक्षियों के समान निवास करते हैं एवं तुम्हारी स्तुति करते हैं। (५) अच्छा च त्वैना नमसा वदामसि किं मुहुश्चिद्धि दीधयः। सन्ति कामासो हरिवो ददिष्ट्वं स्मो वयं सन्ति नो धियः.. (६) हे इंद्र! हम तुम्हारे अभिमुख होकर इस स्तोत्र द्वारा तुम्हारी स्तुति करते हैं। तुम क्यों व्यर्थ चिंता करते हो? हे हरि नामक घोड़ों के स्वामी इंद्र! तुम्हारी बहुत सी अभिलाषाएं हैं। तुम दान करने वाले हो। हम एवं हमारे यज्ञकर्म तुम्हारे ही समीप हैं। (६) नूत्ना इदिन्द्र ते वयमूती अभूम नहि नू ते अद्रिवः। विद्मा पुरा परीणसः.. (७) हे इंद्र! तुम्हारी रक्षा पाकर हम नवीन ही रहेंगे। हे वज्रधारी इंद्र! पहले हम तुम्हें सब जगह व्याप्त नहीं जानते थे, पर इस समय जान गए हैं। (७) विद्मा सखित्वमुत शूर भोज्य१मा ते ता वज्रिन्नीमहे। उतो समस्मिन्ना शिशीहि नो वसो वाजे सुशिप्र गोमति.. (८) हे शूर इंद्र! हम तुम्हारी मित्रता एवं भोज्य को जानते हैं। हे वज्रधारी इंद्र! हम तुम्हारी ये ही दोनों वस्तुएं मांगते हैं। हे निवासस्थानदाता एवं शोभन टोप वाले इंद्र! हमें गाय आदि से युक्त सभी धनों से संपन्न करो। (८) यो न इदमिदं पुरा प्र वस्य आनिनाय तमु वः स्तुषे। सखाय इन्द्रमूतये.. (९) हे मित्र ऋत्विजो! जो इंद्र प्राचीन समय में यह सारा धन हमारे लिए लाए थे, तुम्हारी ebook converter DEMO Watermarks*

रक्षा के लिए मैं उन्हीं इंद्र की स्तुति करता हूं. (९) हर्यश्वं सत्पतिं चर्षणीसहं स हि ष्मा यो अमन्दत. आ तु नः स वयति गव्यमश्व्यं स्तोतृभ्यो मघवा शतम्.. (१०) हरि नामक अश्वों के स्वामी, सज्जनों के पालक व शत्रुओं को दबाने वाले इंद्र की स्तुति वही व्यक्ति कर सकता है, जो प्रसन्न होता है. वे धनस्वामी इंद्र स्तोताओं के लिए सौ गाएं और घोड़े लाए थे. (१०) त्वया ह स्विद्युजा वयं प्रति श्वसन्तं वृषभ ब्रुवीमहि. संस्थे जनस्य गोमतः.. (११) हे वर्षा करने वाले इंद्र! हम तुम्हारी सहायता से गायों के कारण होने वाले संग्राम में ललकारने वाले शत्रुओं को जीतेंगे. (११) जयेम कारे पुरुहूत कारिणोऽभि तिष्ठेम दूढ्यः. नृभिर्वृत्रं हन्याम शूशुयाम चावेरिन्द्र प्र णो धियः.. (१२) हे बहुतों द्वारा बुलाए गए इंद्र! हम युद्ध में शत्रुओं को जीतेंगे एवं दुष्टबुद्धि लोगों को पराजित करेंगे. हम नेता मरुतों की सहायता से वृत्र को मारेंगे एवं यज्ञकर्मों में वृद्धि करेंगे. हे इंद्र! हमारे यज्ञकर्मों की रक्षा करो. (१२) अभ्रातृव्यो अना त्वमनापिरिन्द्र जनुषा सनादसि. युधेदापित्वमिच्छसे.. (१३) हे इंद्र! तुम अपने जन्मकाल से ही भाइयों से हीन, बिना नेता वाले एवं बांधवहीन हो. तुम जो मित्रता चाहते हो, उसे युद्ध द्वारा प्राप्त करते हो. (१३) नकी रेवन्तं सख्याय विन्दसे पीयन्ति ते सुराश्वः. यदा कृणोषि नदनं समूहस्यादित्पितेव हूयसे.. (१४) हे इंद्र! तुम केवल धनवान् व्यक्ति को ही अपनी मित्रता के लिए स्वीकार नहीं करते, इसका क्या कारण है? ऐसे लोग शराब पीते हैं एवं तुम्हारा विरोध करते हैं. जब तुम अपने स्तोता को संपत्ति देते हो, उस समय वह तुम्हें ऐसे पुकारता है, जैसे कोई अपने पिता को पुकारता है. (१४) मा ते अमाजुरो यथा मूरास इन्द्र सख्ये त्वावतः. नि षदाम सचा सुते.. (१५) हे इंद्र! तुम जैसे देव की मित्रता के प्रति अज्ञानी बनकर हम सोमरस निचोड़ना न छोड़ दें. हम सोमरस निचोड़ने के बाद एक जगह बैठेंगे. (१५) मा ते गोदत्र निरराम राधस इन्द्र मा ते गृहामहि. दृळ्हा चिदर्यः प्र मृशाभ्या भर न ते दामान आदभे.. (१६) ebook converter DEMO Watermarks*

हे गाएं देने वाले इंद्र! तुम्हारे सेवक हम धनरहित न हों एवं किसी दूसरे से धन न मांगें. हे स्वामी इंद्र! तुम हमें स्थिर धन दो. तुम्हारे दिए हुए धन को कोई नष्ट नहीं कर सकता. (१६) इन्द्रो वा घेदियन्मघं सरस्वती वा सुभगा ददिर्वसु. त्वं वा चित्र दाशुषे.. (१७) मुझ हव्यदाता सौभरि को क्या इंद्र ने यह धन दिया है? क्या शोभन धनवाली सरस्वती ने मुझे संपत्ति दी है? हे राजा चित्र! यह धन क्या केवल तुम्हें दिया है? (१७) चित्र इद्राजा राजका इदन्यके यके सरस्वतीमनु. पर्जन्य इव ततनद्धि वृष्ट्या सहस्रमयुता ददत्.. (१८) बादल जिस प्रकार वर्षा द्वारा धरती को सभी संपत्तियों से युक्त बनाते हैं, उसी प्रकार राजा चित्र सरस्वती नदी के किनारे रहने वाले अन्य राजाओं को हजारों धन देकर प्रसन्न करते हैं. (१८) सूक्त—२२ देवता—अश्विनीकुमार ओ त्यमह्व आ रथमद्या दंसिष्ठमूतये. यमश्विना सुहवा रुद्रवर्तनी आ सूर्यायै तस्थथुः.. (१) हे शोभन-आह्वान वाले एवं प्रकाशित मार्ग वाले अश्विनीकुमारो! सूर्या को पत्नीरूप में वरण करने के लिए तुम जिस रथ पर बैठे थे, मैं अपनी रक्षा के निमित्त उसी अतिसुंदर रथ को बुलाता हूं. (१) पूर्वापुषं सुहवं पुरुस्पृहं भुज्युं वाजेषु पूर्व्यम्. सचनावन्तं सुमतिभिः सोभरे विद्धेषसमनेहसम्.. (२) हे सौभरि ऋषि! कल्याणकारिणी स्तुतियों द्वारा पूर्ववर्ती स्तोताओं को पुष्ट करने वाले, यज्ञ में शोभन आह्वान वाले, बहुतों द्वारा अभिलषित, सबके रक्षक, युद्धों में आगे रहने वाले, सबके द्वारा सेव्य, शत्रुओं से द्वेष करने वाले एवं पापरहित इस रथ की स्तुति करो. (२) इह त्या पुरुभूतमा देवा नमोभिरश्विना. अर्वाचीना स्ववसे करामहे गन्तारा दाशुषो गृहम्.. (३) हे अनेक शत्रुओं को पराजित करने वाले, दिव्यगुणयुक्त एवं हव्यदाता यजमान के घर जाने वाले अश्विनीकुमारो! हम इस यज्ञकर्म की रक्षा के लिए तुम्हें अपने सामने बुलायेंगे. (३) युवो रथस्य परि चक्रमीयत ईर्मान्यद्वामिषण्यति. अस्माँ अच्छा सुमतिर्वां शुभस्पती आ धेनुरिव धावतु.. (४) ebook converter DEMO Watermarks*

हे अश्विनीकुमारो! तुम्हारे रथ का एक पहिया स्वर्गलोक में चलता है एवं दूसरा तुम्हारे साथ चलता है. हे जल के स्वामी अश्विनीकुमारो! तुम्हारी कल्याणकारिणी बुद्धि इस प्रकार हमारे समीप आवे, जिस प्रकार गाय बछड़े के पास आती है. (४) रथा यो वां त्रिवन्धुरो हिरण्याभीशुरश्विना. परि द्यावापृथिवी भूषति श्रुतस्तेन नासत्या गतम्.. (५) हे अश्विनीकुमारो! ऐसा प्रसिद्ध है कि सारथि के तीन स्थानों वाला एवं सोने की लगामों वाला तुम्हारा रथ द्यावा-पृथिवी को अपने प्रकाश से चमकाता है. तुम उसी रथ से हमारे पास आओ. (५) दशस्यन्ता मनवे पूर्व्यं दिवि यवं वृकेण कर्षथः. ता वामद्य सुमतिभिः शुभस्पती अश्विना प्र स्तुवीमहि.. (६) हे अश्विनीकुमारो! तुमने प्राचीनकाल में द्युलोक का जल राजा मनु को देकर हल द्वारा जौ की खेती करना सिखाया था. हे जल के स्वामी अश्विनीकुमारो! आज उत्तम स्तोत्रों द्वारा हम तुम्हारी स्तुति करते हैं. (६) उप नो वाजिनीवसू यातमृतस्य पथिभिः. येभिस्तृक्षिं वृषणा त्रासदस्र्यवं महे क्षत्राय जिन्वथः.. (७) हे अन्न एवं धन के स्वामी अश्विनीकुमारो! यज्ञ के मार्ग द्वारा हमारे पास आओ. हे धन देने वाले अश्विनीकुमारो! इसी मार्ग द्वारा तुमने त्रसदस्यु के पुत्र तृक्षि को महान् संपत्ति देकर तृप्त किया था. (७) अयं वामद्रिभिः सुतः सोमो नरा वृषण्वसू. आ यातं सोमपीतये पिबतं दाशुषो गृहे.. (८) हे नेताओं एवं स्तोताओं को धन बरसाने वाले अश्विनीकुमारो! तुम्हारे लिए यह सोमरस पत्थरों की सहायता से निचोड़ा गया है. तुम सोमपान के लिए आओ और हव्यदाता यजमान के घर में सोम पिओ. (८) आ हि रुहतमश्विना रथे कोशे हिरण्यये वृषण्वसू. युञ्जाथां पीवरीरिषः.. (९) हे धन बरसाने वाले अश्विनीकुमारो! सोने की लगाम से युक्त, आयुधों के कोश के समान एवं आनंददाता रथ पर चढ़ो तथा हमें विशाल अन्न दो. (९) याभिः पक्थमवथो याभिरध्रिगुं याभिर्ऋभुं विजोषणम्. ताभिर्नो मक्षू तूमश्विना गतं भिषज्यतं यदातुरम्.. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*

हे अश्विनीकुमारो! तुमने जिन रक्षासाधनों द्वारा पक्थ, अध्रिगु एवं सोमरस द्वारा विशेषरूप से प्रसन्न करने वाले बभ्रु की रक्षा की थी, उन्हीं रक्षासाधनों द्वारा तुरंत शीघ्र गति से हमारे समीप आओ तथा रोगी का इलाज करो. (१०) यदध्रिगावो अध्रिगू इदा चिदह्नो अश्विना हवामहे. वयं गीर्भिर्विपन्यवः.. (११) हे युद्ध में शत्रु का शीघ्र वध करने वाले अश्विनीकुमारो! यज्ञकर्म में शीघ्रता करने वाले एवं मेधावी हम लोग दिन के इसी प्रथम भाग में स्तुतिवचनों द्वारा तुम्हें बुलाते हैं. (११) ताभिरा यातं वृषणोप मे हवं विश्वप्सुं विश्ववार्यम्. इषा मंहिष्ठा पुरुभूतमा नरा याभिः क्रिविं वावृधुस्ताभिरा गतम्.. (१२) हे कृपावर्षा करने वाले अश्विनीकुमारो! सब देवों द्वारा वरण करने योग्य एवं भिन्नभिन्न रूप वाले हमारे आह्वान को सुनकर उन सब रक्षासाधनों के साथ आओ. हे हव्य चाहने वाले, अधिक धन देने वाले एवं युद्धों में अनेक शत्रुओं को हराने वाले अश्विनीकुमारो! जिन रक्षासाधनों द्वारा तुमने कुएं का जल बढ़ाया था, उन्हीं के साथ यहां आओ. (१२) ताविदा चिदहानां तावश्विना वन्दमान उप ब्रुवे. ता ऊ नमोभिरीमहे.. (१३) इस प्रातःकाल में मैं उन अश्विनीकुमारों की वंदना करता हुआ उनकी स्तुति करता हूं एवं स्तोत्रों द्वारा उन दोनों से धनसंपत्ति मांगता हूं. (१३) ताविद्दोषा ता उषसि शुभस्पती या यामन्नुद्रवर्तनी. मा नो मर्ताय रिपवे वाजिनीवसू परो रुद्रावति ख्यतम्.. (१४) हम जल की रक्षा करने वाले एवं प्रशंसायोग्य मार्ग पर चलने वाले अश्विनीकुमारों को रात्रि, उषा एवं दिवस—सभी कालों में बुलाते हैं. हे अश्विनीकुमारो! हमारे शत्रुओं को अन्न एवं धन मत देना. (१४) आ सुग्म्याय सुग्म्यं प्राता रथेनाश्विना वा सक्षणी. हुवे पितेव सोभरी.. (१५) हे अभिलाषापूरक अश्विनीकुमारो! मुझ सुखयोग्य के लिए तुम प्रातःकाल के समय रथ द्वारा सुख लाओ. मैं सौभरि ऋषि अपने पिता के समान ही तुम्हें बुलाता हूं. (१५) मनोजवसा वृषणा मदच्युता मक्षुङ्गमाभिरूतिभिः. आरात्ताच्चिद्भूतमस्मे अवसे पूर्वीभिः पुरुभोजसा.. (१६) हे मन के समान शीघ्र गतिशील, धन बरसाने वाले, शत्रुनाशक एवं बहुतों के रक्षक अश्विनीकुमारो! अपने शीघ्रगामी रक्षासाधनों द्वारा हमारी रक्षा के लिए हमारे पास आओ. (१६) ebook converter DEMO Watermarks*

आ नो अश्वावदश्विना वर्तिर्यासिष्टं मधुपातमा नरा. गोमद्दस्रा हिरण्यवत्.. (१७) हे अधिक सोम पीने वाले नेता एवं दर्शनीय अश्विनीकुमारो! हमारे घर को अश्वों, गायों एवं स्वर्ण से युक्त बनाओ. (१७) सुप्रावर्गं सुवीर्यं सुष्ठु वार्यमनाधृष्टं रक्षस्विना. अस्मिन्ना वामायाने वाजिनीवसू विश्वा वामानि धीमहि.. (१८) हम शोभनदान योग्य, सुंदर बल से युक्त, सबके द्वारा वरण करने योग्य एवं शक्तिशाली पुरुष द्वारा भी पराजित न होने वाला धन तुमसे प्राप्त करें. हे शक्ति एवं धन वाले अश्विनीकुमारो! तुम्हारे आने पर हम धन प्राप्त करेंगे. (१८) सूक्त—२३ देवता—अग्नि ईळिष्वा हि प्रतीव्यं१ यजस्व जातवेदसम्. चरिष्णुधूममगृभीतशोचिषम्.. (१) शत्रुओं के विरोध में गमन करने वाले अग्नि की स्तुति करो. सभी उत्पन्न प्राणियों को जानने वाले, सब ओर गतिशील धुएं वाले व राक्षसों द्वारा बाधाहीन ज्योति अग्नि की पूजा हव्यों द्वारा करो. (१) दामानं विश्वचर्षणेऽग्निं विश्वमनो गिरा. उत स्तुषे विष्पर्धसो रथानाम्.. (२) हे ज्ञान-दृष्टि से सब अर्थ देने वाले विश्वमना नामक ऋषि! स्तुतिवचनों द्वारा अग्नि की प्रशंसा करो. वे यजमान को रथ आदि संपत्ति देते हैं. (२) येषामाबाध ऋग्मिय इषः पृक्षश्च निग्रभे. उपविदा वह्निर्विन्दते वसु.. (३) शत्रुओं को सामने से बाधा पहुंचाने वाले एवं ऋचाओं द्वारा पूजा करने योग्य अग्नि जिनके हव्य अन्न एवं सोमरस ग्रहण करते हैं, वे ही यजमान धन पाते हैं. (३) उदस्य शोचिरस्थाद्दीदियुषो व्य१जरम्. तपुर्जम्भस्य सुद्युतो गणश्रियः.. (४) भली प्रकार दीप्तिशाली, तापदाता दाढ़ वाले, शोभन दीप्तियुक्त एवं यजमानों का आश्रय लेने वाले अग्नि का जरारहित तेज उठता है. (४) उदु तिष्ठ स्वध्वर स्तवानो देव्या कृपा. अभिख्या भासा बृहता शुशुक्वनिः.. (५) हे शोभन यज्ञस्तुति किए जाते हुए, चारों ओर जाती हुई प्रसिद्ध दीप्ति से युक्त एवं ज्वलनशील अग्नि! तुम तेजस्वी ज्वालाओं के साथ बैठो. (५) अग्ने याहि सुशस्तिभिर्हव्या जुह्वान आनुषक्. यथा दूतो बभूथ हव्यवाहनः.. (६) ebook converter DEMO Watermarks*

हे हव्य वहन करने वाले अग्नि! तुम देवों के दूत हो, इसलिए देवों को हव्य देते हुए शोभन स्तुतियों के साथ आओ. (६) अग्निं वः पूर्व्यं हुवे होतारं चर्षणीनाम्. तमया वाचा गृणे तमु वः स्तुषे.. (७) मैं मनुष्यों के यज्ञ पूर्ण करने वाले एवं प्राचीन अग्नि को बुलाता हूं. मैं इन स्तुतिवचनों द्वारा उनकी प्रशंसा करता हूं एवं तुम्हारे लिए उन्हें बुलाता हूं. (७) यज्ञेभिरद्भुतक्रतुं यं कृपा सूदयन्त इत्. मित्रं न जने सुधितमृतावनि.. (८) विचित्र कर्म वाले, मित्र के समान स्थित, हव्यों द्वारा तृप्त अग्नि की कृपा से अपनी सामर्थ्य के अनुसार यज्ञ करने वाले यजमान की अभिलाषा पूरी होती है. (८) ऋतावानमृतायवो यज्ञस्य साधनं गिरा. उपो एनं जुजुषुर्नमस्सपदे.. (९) हे यजमानो! यज्ञ के साधन एवं यज्ञ के स्वामी की सेवा हव्ययुक्त यज्ञ में स्तुतिवचनों द्वारा करो. (९) अच्छा नो अङ्गिरस्तमं यज्ञासो यन्तु संयतः. होता यो अस्ति विश्वा यशस्तमः.. (१०) हमारे नियमित यज्ञ अंगिराओं में श्रेष्ठ अग्नि के सामने जावें. अग्नि मनुष्यों में होता एवं परम यशस्वी हैं. (१०) अग्ने तव त्वे अजरेन्धानासो बृहद्भाः. अश्वा इव वृषणस्तविषीयवः.. (११) हे जरारहित अग्नि! तुम्हारी दीप्ति वाली एवं विशाल रश्मियां कामवर्षी अश्व के समान शक्ति प्रदर्शित करती हैं. (११) स त्वं न ऊर्जां पते रयिं रास्व सुवीर्यम्. प्राव नस्तोके तनये समत्स्वा.. (१२) हे शक्ति के स्वामी अग्नि! तुम हमें शोभन दीप्ति वाला धन दो. हमारे पुत्रों, पौत्रों एवं युद्धों में वर्तमान धन की रक्षा करो. (१२) यद्वा उ विशपतिः शितः सुप्रीतो मनुषो विशि. विश्वेदग्निः प्रति रक्षांसि सेधति.. (१३) प्रजाओं के पालक एवं हव्यों द्वारा तेज किए गए अग्नि भली प्रकार प्रसन्न होकर जब यज्ञकर्त्ता के घर में स्थित होते हैं, तब सब राक्षसों को समाप्त कर देते हैं. (१३) श्रुष्ट्यग्ने नवस्य मे स्तोमस्य वीर विशपते. नि मायिनस्तपुषा रक्षसो दह.. (१४) ebook converter DEMO Watermarks*

हे वीर एवं प्रजापालक अग्नि! हमारी नवीन स्तुतियों को सुनो एवं अपने ताप वाले तेज से मायावी राक्षसों को जलाओ. (१४) न तस्य मायया चन रिपुरीशीत मर्त्य:. यो अग्नये ददाश हव्यदातिभि:.. (१५) शत्रु लोग माया द्वारा भी उसे वश में नहीं कर सकते, जो हव्यदाता ऋत्विजों द्वारा अग्नि को हवि देता है. (१५) व्यश्वस्त्वा वसुविद्मुक्षण्युप्रीणादृषि:. महो राये तमु त्वा समिधीमहि.. (१६) स्वयं को धन की वर्षा करने वाला बनाने की इच्छा से व्यश्व ऋषि ने धन देने वाले तुझ अग्नि को प्रसन्न किया था. हम महान् धन पाने के लिए उसी अग्नि को जलाते हैं. (१६) उशना काव्यस्त्वा नि होतारमसादयत्. आयजिं त्वा मनवे जातवेदसम्.. (१७) हे अग्नि! कविपुत्र उशना नामक ऋषि ने राजा मनु के कल्याण के लिए तेरे सामने यज्ञ करने वाले एवं जातवेद अग्नि को स्थापित किया था. (१७) विश्वे हि त्वा सजोषसो देवासो दूतमक्रत. श्रुष्टी देव प्रथमो यज्ञियो भुव:.. (१८) हे अग्नि! सभी देवों ने मिलकर तुम्हें अपना दूत बनाया था. हे देवों में प्रमुख अग्नि! तुम शीघ्र ही यज्ञ के योग्य बन गए थे. (१८) इमं घा वीरो अमृतं दूतं कृण्वीत मर्त्य:. पावकं कृष्णवर्तनिं विहायसम्.. (१९) वीर मनुष्य ने इन मरणरहित, पवित्र करने वाले, काले मार्ग वाले एवं महान् अग्नि को अपना दूत बनाया था. (१९) तं हुवेम यतस्रुच: सुभासं शुक्रशोचिषम्. विशामग्निमजरं प्रत्नमीड्यम्.. (२०) हाथ में स्रुच ग्रहण करने वाले हम शोभन दीप्ति वाले, शुभ्र तेजयुक्त, मनुष्यों द्वारा स्तुति योग्य एवं जरारहित अग्नि को बुलाते हैं. (२०) यो अस्मै हव्यदातिभिराहुतिं मर्तोऽविधत्. भूरि पोषं स धत्ते वीरवद्यश:.. (२१) जो मनुष्य हव्यदाता ऋत्विजों द्वारा इस अग्नि को आहुति देता है, वह अधिक पुष्ट करने वाला तथा वीर संतान से युक्त धन प्राप्त करता है. (२१) प्रथमं जातवेदसमग्निं यज्ञेषु पूर्व्यम्. प्रति स्रुगेति नमसा हविष्मती.. (२२) हव्य से युक्त स्रुच देवों में प्रधान, जातवेद एवं प्राचीन अग्नि के समीप नमस्कार के हेतु साथ जाता है. (२२) ebook converter DEMO Watermarks*

आभिर्विधेमाग्नये ज्येष्ठाभिर्व्यश्ववत्. मंहिष्ठाभिर्मतिभिः शुक्रशोचिषे.. (२३) हम व्यश्व ऋषि के समान ही उज्ज्वल तेज वाले अग्नि की सेवा अत्यंत प्रशंसायोग्य एवं पूज्यतम स्तुतियों द्वारा करते हैं. (२३) नूनमर्च विहायसे स्तोमेभिः स्थूरयूपवत्. ऋषे वैयश्व दम्यायाग्नये.. (२४) हे व्यश्व के पुत्र ऋषि विश्वमना! तुम स्थूलयूप नामक ऋषि के समान ही महान् एवं यजमान के घर में उत्पन्न अग्नि की पूजा स्तोत्रों द्वारा करो. (२४) अतिथिं मानुषाणां सूनुं वनस्पतीनाम्. विप्रा अग्निमवसे प्रत्नमीळते.. (२५) मेधावी यजमान रक्षा के लिए मनुष्यों के अतिथि, वनस्पतियों के पुत्र तथा प्राचीन अग्नि की स्तुति करते हैं. (२५) महो विश्वाँ अभिषतोऽभि हव्यानि मानुषा. अग्ने नि षत्सि नमसाधि बर्हिषि.. (२६) हे स्तुति योग्य अग्नि! सभी महान् स्तोताओं के सामने तुम कुशों पर बैठो एवं मानवों का हव्य स्वीकार करो. (२६) वंस्वा नो वार्या पुरु वंस्व रायः पुरुस्पृहः. सुवीर्यस्य प्रजावतो यशस्वतः.. (२७) हे अग्नि! हमें गौ आदि वरणीय संपत्ति तथा बहुतों द्वारा इच्छित धन दो जो शोभन शक्ति वाले पुत्र-पौत्रों से युक्त एवं कीर्ति वाला हो. (२७) त्वं वरो सुषाम्णेऽग्ने जनाय चोदय. सदा वसो रातिं यविष्ठ शश्वते.. (२८) हे वरणीय, निवासस्थान देने वाले एवं अतिशय युवा अग्नि! सोम का सुंदर गान करने वालों के प्रति सदा धन को प्रेरित करो. (२८) त्वं हि सुप्रतूरसि त्वं नो गोमतीरिषः. महो रायः सातिमग्ने अपा वृधि.. (२९) हे अग्नि! तुम शोभन दाता हो. हमें पशुओं से युक्त अन्न एवं देने योग्य महान् धन दो. (२९) अग्ने त्वं यशा अस्या मित्रावरुणा वह. ऋतावाना सम्राजा पूतदक्षसा.. (३०) हे अग्नि! तुम यशस्वी हो. तुम यज्ञयुक्त, भली प्रकार दीप्तिशाली एवं युद्ध बल वाले मित्र व वरुण को इस यज्ञ में ले आओ. (३०) सूक्त—२४ देवता—इंद्र ebook converter DEMO Watermarks*

सखाय आ शिषामहि ब्रह्मेन्द्राय वज्रिणे. स्तुष ऊ षु वो नृतमाय धृष्णवे.. (१) हे मित्र एवं ऋत्विजो! हम वज्रधारी इंद्र के लिए यह स्तोत्र बनावेंगे. तुम्हारे कल्याण के लिए युद्धों का नेतृत्व करने वाले एवं शत्रुओं को हराने वाले इंद्र की मैं स्तुति करूंगा. (१) शवसा ह्यसि श्रुतो वृत्रहत्येन वृत्रहा. मघैर्मघोनो अति शूर दाशसि.. (२) हे इंद्र! तुम शक्ति के कारण प्रसिद्ध हो एवं वृत्र को मारने के कारण वृत्रहर कहलाते हो. हे शूर इंद्र! तुम धनवान् व्यक्ति को धन देकर अधिक धनी बनाते हो. (२) स नः स्तवान आ भर रयिं चित्रश्रवस्तमम्. निरेके चिद्यो हरिवो वसुर्ददिः.. (३) हे इंद्र! तुम हमारी स्तुति सुनकर हमें नानाविध अन्नों से युक्त धन अधिक मात्रा में दो. हे हरि नामक घोड़ों के स्वामी इंद्र! तुम निकलते समय ही शत्रुओं को भगाने वाले एवं हमें धन देने वाले होते हो. (३) आ निरेकमुत प्रियमिन्द्र दर्षि जनानाम्. धृषता धृष्णो स्तवमान आ भर.. (४) हे शत्रुनाशक इंद्र! तुम हमारी स्तुति सुनकर हम स्तोताओं को प्रिय धन दिखाओ एवं तुष्ट मन द्वारा वह धन हमें दो. (४) न ते सव्यं न दक्षिणं हस्तं वरन्त आमुरः. न परिबाधो हरिवो गविष्टिषु.. (५) हे हरि नामक घोड़ों वाले इंद्र! गायों को खोजते समय विरोधी पक्ष के योद्धा न तुम्हारा बायां हाथ हटा सकते हैं और न दायां. संग्राम में बाधा पहुंचाने वाले असुर भी यह नहीं कर सकते. (५) आ त्वा गोभिरिव व्रजं गीर्भिऋणोम्यद्रिवः. आ स्मा कामं जरितुरा मनः पृण.. (६) हे वज्रधारी इंद्र! लोग जिस प्रकार गायों के साथ गोशाला में जाते हैं, इसी प्रकार मैं स्तुतियों के साथ तुम्हारे पास आता हूं. तुम मुझ स्तोता की धन संबंधी अभिलाषा एवं मनोकामना पूरी करो. (६) विश्वानि विश्वमनसो धिया नो वृत्रहन्तम. उग्र प्रणेतरधि षू वसो गहि.. (७) हे असुर-विनाशकों में श्रेष्ठ, उग्र, निवासस्थान देने वाले एवं नेता इंद्र! विश्वमना ऋषि के सभी स्तोत्रों को सुनकर आओ. (७) वयं ते अस्य वृत्रहन्विद्याम शूर नव्यसः. वसोः स्पार्हस्य पुरुहूत राधसः.. (८) हे वृत्रनाशक, शूर एवं बहुतों द्वारा बुलाए गए इंद्र! हम तुम्हारी कृपा से नवीन, चाहने योग्य एवं सुखसाधक धन प्राप्त करें. (८) ebook converter DEMO Watermarks*

इन्द्र यथा ह्यस्ति तेऽपरीतं नृतो शवः. अमृक्ता रातिः पुरुहूत दाशुषे.. (९) हे सबको नचाने वाले इंद्र! तुम्हारा बल शत्रुओं द्वारा दबाया नहीं जा सकता. हे बहुतों द्वारा बुलाए गए इंद्र! हव्यदाता यजमान को तुम्हारे द्वारा दिया हुआ धन शत्रुओं द्वारा नष्ट नहीं होता. (९) आ वृषस्व महामह महे नृतम राधसे. दृळहश्चिद् दृह्य मघवन्मघत्तये.. (१०) हे अतिशय पूजनीय एवं नेताओं में श्रेष्ठ इंद्र! शत्रुओं का महान् धन प्राप्त करने के लिए सोमरस से अपना उदर भरो. हे धनवान् इंद्र! धनलाभ के लिए तुम शत्रुओं के दृढ़ नगरों को भी नष्ट करो. (१०) नू अन्यत्रा चिदद्रिवस्त्वन्नो जग्मुराशसः. मघवञ्छग्धि तव तन्न ऊतिभिः.. (११) हे वज्रधारी इंद्र! तुमसे पहले हमने अन्य देवों से धनादि पाने की आशाएं की थीं. हे धनवान् इंद्र! तुम रक्षा के साथ हमारी आशाएं पूरी करो. (११) नह्य१ङ्ग नृतो त्वदन्यं विन्दामि राधसे. राये द्युम्नाय शवसे च गिर्वणः.. (१२) हे सबको नचाने वाले एवं स्तुति योग्य इंद्र! मैं बलप्रद अन्न, धन, तेजस्वी यश एवं बल पाने के लिए तुम्हारे अतिरिक्त किसी को नहीं पाता. (१२) एन्दुमिन्द्राय सिञ्चत पिबाति सोम्यं मधु. प्र राधसा चोदयते महित्वना.. (१३) हे ऋत्विजो! तुम इंद्र के लिए सोमरस निचोड़ो. वे ही मधुर सोमरस पीएं. वे अपने महत्त्व से स्तोताओं को अन्न के साथ धन भी देते हैं. (१३) उपो हरीणां पतिं दक्षं पृच्छन्तमब्रवम्. नूनं श्रुधि स्तुवतो अश्व्यस्य.. (१४) मैं हरि नामक अश्वों के स्वामी एवं अपना बल दूसरों को देने वाले इंद्र की स्तुति करता हूं. मैं व्यश्व ऋषि का पुत्र हूं. मेरी स्तुति सुनो. (१४) नह्य१ङ्ग पुरा चन जज्ञे वीरतरस्त्वत्. नकी राया नैवथा न भन्दना.. (१५) हे इंद्र! प्राचीनकाल में तुमसे अधिक वीर, धनसंपन्न, शत्रुओं पर आक्रमण करने वाला एवं स्तुति योग्य कोई नहीं हुआ. (१५) एदु मध्वो मदिन्तरं सिञ्च वाध्वर्यो अन्धसः. एवा हि वीरः स्तवते सदावृधः.. (१६) हे अध्वर्युगण! तुम मदकारक सोमलता के अतिशय मदकारक अंश सोमरस को इंद्र के लिए निचोड़ो. वीर एवं सदा बढ़ने वाले इंद्र की ही स्तुति की जाती है. (१६) ebook converter DEMO Watermarks*

इन्द्र स्था॒तर्हरी॑णां॒ नकि॑ष्टे पू॒र्व्यस्तु॑तिम्। उदा॑नंश॒ श्वसा॒ न भन्द॑ना.. (१७) हे हरि नामक अश्वों के स्वामी इंद्र! पूर्ववर्ती ऋषियों द्वारा की गई तुम्हारी स्तुति को कोई शक्ति अथवा धन के कारण नहीं लांघ सकता. (१७) तं वो॒ वाजा॑नां॒ पति॑म॒हूम॑हि श्रव॒स्यवः॑। अ॒प्रायु॑भिर्य॒ज्ञेभि॑र्वावृ॒धेन्य॑म्.. (१८) हम अन्न के अभिलाषी बनकर ऐसे यज्ञों द्वारा अन्नपति एवं वर्धनशील इंद्र को बुलाते हैं, जो प्रमादहीन ऋत्विजों द्वारा किए जाते हैं. (१८) एतोन्विन्द्रं॑ स्तवाम॒ सखा॑यः॒ स्तोम्यं॒ नर॑म्। कृ॒ष्टीर्यो विश्वा॒ अभ्यस्त्येक॒ इत्.. (१९) हे मित्र ऋत्विजो! शीघ्र आओ. हम स्तुति योग्य, नेता एवं अकेले ही सब शत्रु सेनाओं को पराजित करने वाले इंद्र की स्तुति करेंगे. (१९) अगो॑रुधाय गवि॒षे द्यु॒क्षाय॒ दस्म्यं॒ वचः॑। घृ॒तात्स्वादी॑यो॒ मधु॑नश्च वोचत.. (२०) हे ऋत्विजो! स्तुतियों का विरोध न करने वाले, स्तुति के अभिलाषी व दीप्तिशाली इंद्र के लिए घी और शहद से भी अधिक स्वादिष्ट स्तुतिवचन बोलो. (२०) यस्या॑मि॒तानि॑ वी॒र्या॑३ न राधः॒ पर्येत॑वे। ज्योति॒र्न वि॒श्वमभ्य॑स्ति दक्षि॒णा.. (२१) जिस इंद्र की वीरता के कर्म असीमित हैं, जिसका धन शत्रु नहीं पा सकते एवं जिसका धनदान सब स्तोताओं को इस प्रकार व्याप्त करता है, जैसे प्रकाश आकाश में फैलता है. (२१) स्तु॒हीन्द्रं॒ व्य॑श्ववद॒नूर्मिं वा॒जिनं॑ य॒मम्। अर्यो गयं॑ मंहमा॒नं वि दा॒शुषे॑.. (२२) हे विश्वमना ऋषि! उन्हीं शत्रुओं द्वारा अहिंसनीय, शक्तिशाली एवं स्तोताओं द्वारा नियंत्रित इंद्र की स्तुति व्यश्व ऋषि के समान करो. स्वामी इंद्र हव्यदाता यजमान को पूजनीय घर देते हैं. (२२) ए॒वा नू॒नमुप॑ स्तुहि॒ वैय॑श्व द॒शमं॒ नव॑म्। सु॒वि॒द्वांसं॑ चर्कृ॒त्यं॑ चरणी॒नाम्.. (२३) हे व्यश्वपुत्र विश्वमना ऋषि! मानवों के दसवें प्राण, प्रशंसनीय, उत्तम, विद्वान् व बार-बार नमस्कार करने योग्य इंद्र की स्तुति करो. (२३) वेत्था॒ हि निर्ऋ॑तीनां वज्रहस्त परि॒वृज॑म्। अह॑रहः शुन्ध्युः प॑रि॒पदामि॑व.. (२४) हे वज्रहस्त इंद्र! सूर्य जिस प्रकार प्रतिदिन पक्षियों के उड़ने से परिचित रहते हैं, उसी प्रकार तुम राक्षसों की गतियां समझते हो. (२४) ebook converter DEMO Watermarks*

तदिन्द्राव आ भर येना दंसिष्ठ कृत्वने. द्विता कुत्साय शिश्रथो नि चोदय.. (२५) हे अत्यंत दर्शनीय इंद्र! हमें अपना आश्रय दो, जिससे हम यज्ञकर्म करने वाले यजमान की रक्षा कर सकें. तुमने दो तरह से कुत्स ऋषि की रक्षा की थी. उसी प्रकार हमारी भी रक्षा करो. (२५) तमु त्वा नूनमीमहे नव्यं दंसिष्ठ सन्यसे. स त्वं नो विश्वा अभिमाती: सक्षणि:.. (२६) हे अतिशय दर्शनीय एवं स्तुतियोग्य इंद्र! इस समय हम तुमसे धन की याचना करते हैं. तुम हमारे सभी शत्रुओं की सेनाओं को हराने वाले हो. (२६) य ऋक्षादंहसो मुचद्यो वार्यात्सप्त सिन्धुषु. वधर्दासस्य तुविनृम्ण नीनम:.. (२७) जो राक्षसों से उत्पन्न पाप से छुटकारा दिलाते हैं एवं जो सात नदियों के तट पर रहने वाले यजमानों को धन देते हैं, तुम वही इंद्र हो. हे अतिशय धनी इंद्र! शत्रु राक्षसों के वध के लिए शस्त्र नीचे फेंको. (२७) यथा वरो सुषाम्णे सनिभ्य आवहो रयिम्. व्यश्वेभ्य: सुभगे वाजिनीवति.. (२८) हे राजा वरु! तुमने अपने पिता राजा सुषामा के कल्याण के लिए जैसे धन दान किया था, उसी प्रकार हमें, व्यश्व एवं उसके परिवार वालों को धन दो. हे शोभन धन एवं अन्न वाली उषा! तुम भी हमें धन दो. (२८) आ नार्थस्य दक्षिणा व्यश्वाँ एतु सोमिन:. स्थूरं च राध: शतवत्सहस्रवत्.. (२९) मानव हितकारी एवं सोमरस वाले यजमान वरू की दक्षिणा व्यश्व एवं उसके पुत्रों को प्राप्त हो. हमारे पास सौ और हजारों की संख्या में स्थूल धन आवे. (२९) यत्त्वा पृच्छादीजान: कुहया कुहयाकृते. एषो अपश्रितो वलो गोमतीमव तिष्ठति.. (३०) हे उषा! जो लोग तुमसे पूछें कि राजा वरु कहां रहते हैं तो उनसे कहना—सबको आश्रय देने वाले एवं शत्रुओं को रोकने वाले वरु गोमती के किनारे रहते हैं. (३०) सूक्त—२५ देवता—मित्रवरुणादि ता वां विश्वस्य गोपा देवा देवेषु यज्ञिया. ऋतावाना यजसे पूतदक्षसा.. (१) हे सब लोक के रक्षक, दिव्य गुणयुक्त एवं देवों में यज्ञपात्र मित्र व वरुण! तुम हव्यदान के लिए यजमान के समीप आओ. हे व्यश्व ऋषि! तुम यज्ञयुक्त एवं पवित्र शक्ति वाले मित्र व ebook converter DEMO Watermarks*

वरुण का यजन करो. (१) मित्रा तना न रथ्या३ वरुणो यश्च सुक्रतुः. सनात्सुजाता तनया धृतव्रता.. (२) शोभन—यज्ञकर्म वाले मित्र व वरुण धन एवं रथ के स्वामी हैं. वे बहुत समय पूर्व शोभन जन्म वाले, अदितिपुत्र एवं व्रतधारी हैं. (२) ता माता विश्ववेदसासूर्याय प्रमहसा. मही जजानादितिर्ऋतावरी.. (३) महती एवं सत्ययुक्त अदिति ने सबको जानने वाले, उत्कृष्ट तेज वाले मित्र व वरुण को असुरनाश करने वाली शक्ति के लिए उत्पन्न किया है. (३) महान्ता मित्रावरुणा सम्राजा देवावसुरा. ऋतावानावृतमा घोषतो बृहत्.. (४) महान्, भली प्रकार सुशोभित, शक्तिशाली एवं सत्ययुक्त मित्र व वरुण अपने प्रकाश से यज्ञ को प्रकाशित करते हैं. (४) नपाता शवसो महः सूनू दक्षस्य सुक्रतू. सृप्रदानू इषो वास्तवधि क्षितः.. (५) महान् बल के नाती, वेग के पुत्र, शोभन कर्म वाले एवं अधिक धन देने वाले मित्र व वरुण अन्न के स्थान में रहते हैं. (५) सं या दानूनि येमथुर्दिव्याः पार्थिवीरिषः. नभस्वतीरा वां चरन्तु वृष्टयः.. (६) हे मित्र व वरुण! तुम धन, दिव्य अन्न एवं धरती पर उत्पन्न होने वाला अन्न देते हो. जल वाली वर्षा तुम्हारे पास रहे. (६) अधि या बृहतो दिवोऽभि यूथेव पश्यतः. ऋतावाना सम्राजा नमसे हिता.. (७) हे सत्ययुक्त, भली प्रकार सुशोभित एवं हव्य को प्रेम करने वाले मित्र व वरुण! तुम देवों को प्रसन्न करने के लिए इस प्रकार देखते हो, जिस प्रकार बैल गायों के झुंड को देखता है. (७) ऋतावाना निषेदतुः साम्राज्याय सुक्रतू. धृतव्रता क्षत्रिया क्षत्रमाशतुः.. (८) सत्ययुक्त एवं शोभन कर्म वाले मित्र व वरुण! भली प्रकार सुशोभित होने के लिए यहां बैठो. हे व्रत धारण करने वाले एवं शक्तिशाली मित्र व वरुण! तुम बल को प्राप्त करो. (८) अक्ष्णश्चिद्गातुवित्तरा नुल्बणेन चक्षसा. नि चिन्मिषन्ता निचिरा नि चिक्यतुः.. (९) आंखों द्वारा सबको देखने से पहले ही जानने वाले, सबको अपने-अपने कर्म में प्रेरित करने वाले एवं चिरंतन मित्र व वरुण दुःसह तेज से युक्त हैं. (९) ebook converter DEMO Watermarks*

उत नो देव्यदितिरुरुष्यतां नासत्या. उरुष्यन्तु मरुतो वृद्धशवसः.. (१०) अदितिदेवी एवं अश्विनीकुमार हमारी रक्षा करें. अधिक वेग वाले मरुद्गण हमारी रक्षा करें. (१०) ते नो नावमुरुष्यत दिवा नक्तं सुदानवः. अरिष्यन्तो नि पायुभिः सचेमहि.. (११) हे शोभन-दान वाले एवं अहिंसित मरुतो! तुम रात-दिन हमारी नाव की रक्षा करो. तुम्हारे पालन से हम एकत्र होंगे. (११) अघ्नते विष्णवे वयमरिष्यन्तः सुदानवे. श्रुधि स्वयावन्त्सिन्धो पूर्वचित्तये.. (१२) हम पालन के कारण अबाधित होकर हिंसा न करने वाले एवं शोभन दान युक्त विष्णु की स्तुति करेंगे. हे संग्राम में अकेले जाने वाले एवं स्तोताओं को धन देने वाले विष्णु! पूर्वकाल में यज्ञ प्रारंभ करने वाले यजमान की स्तुति सुनो. (१२) तद्दार्यं वृणीमहे वरिष्ठं गोपयत्यम्. मित्रो यत्पान्ति वरुणो यदर्यमा.. (१३) हम श्रेष्ठ, सबके रक्षक एवं वरण करने योग्य धन का आश्रय लेते हैं. इस धन की रक्षा मित्र, वरुण और अर्यमा करते हैं. (१३) उत नः सिन्धुरपां तन्मरुतस्तदश्विना. इन्द्रो विष्णुर्मीढ्वांसः सजोषसः.. (१४) जल बरसाने वाले बादल, मरुद्गण, अश्विनीकुमार, इंद्र, वरुण एवं सभी अभिलाषापूरक देव मिलकर हमारी रक्षा करें. (१४) ते हि ष्मा वनुषो नरोऽभिमातिं कयस्य चित्. तिग्मं न क्षोदः प्रतिघ्नन्ति भूर्णयः.. (१५) सेवा करने योग्य एवं यज्ञकर्म के नेता वे देवगण शीघ्र गमन करके किसी भी शत्रु का अभिमान इस प्रकार नष्ट कर देते हैं, जिस प्रकार तेज बहने वाला जल वृक्षों को उखाड़ देता है. (१५) अयमेक इत्था पुरूरु चष्टे वि विशपतिः. तस्य व्रतान्यनु वश्वरामसि.. (१६) मनुष्यों का पालन करने वाले ये मित्र अकेले ही बहुत से प्रधान द्रव्यों को अपने तेज से इस प्रकार देखते हैं. हम तुम्हारे कल्याण के लिए मित्र के व्रतों का आचरण करते हैं. (१६) अनु पूर्वायोक्य साम्राज्यस्य सश्चिम. मित्रस्य व्रता वरुणस्य दीर्घश्रुत्.. (१७) हम भली प्रकार सुशोभित होने वाले वरुण के प्राचीन गृहों को प्राप्त होंगे. हम अत्यंत प्रसिद्ध मित्र के व्रत भी करेंगे. (१७)