ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1274, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंकी शोभन स्तुति को तुम आभरणों के समान समझो. तुम उषा और सूर्य के साथ मिलकर प्रातःकाल सोमरस पिओ. (२०) रश्मीँरिव यच्छतमध्वराँ उप श्यावाश्वस्य सुन्वतो मदच्युता. सजोषसा उषसा सूर्येण चाश्विना तिरोअह्नयम्.. (२१) हे शत्रुओं का गर्व नष्ट करने वाले अश्विनीकुमारो! जिस प्रकार घोड़ा लगाम के सहारे चलता है, उसी प्रकार मुझ सोमरस निचोड़ने वाले श्यावाश्व की स्तुति सुनकर तुम चले आओ. तुम सूर्य एवं उषा के साथ मिलकर प्रातःकाल सोमरस पिओ. (२१) अर्वाग्रथं नि यच्छतं पिबतं सोम्यं मधु. आ यातमश्विना गतमवस्युर्वामिहं हुवे धतं रत्नानि दाशुषे.. (२२) हे अश्विनीकुमारो! अपना रथ हमारे सामने लाओ, मधुर सोमरस पिओ, यज्ञ में आओ व सोमरस के सामने पहुंचो. मैं रक्षा की अभिलाषा से तुम्हें बुलाता हूं. तुम मुझ हव्यदाता को रत्न दो. (२२) नमोवाके प्रस्थिते अध्वरे नरा विवक्षणस्य पीतये. आ यातमश्विना गतमवस्युर्वामिहं हुवे धतं रत्नानि दाशुषे.. (२३) हे नेता अश्विनीकुमारो! मुझ हवनशील के द्वारा होने वाले इस नमोवाक्य वाले यज्ञ में तुम सोमरस पीने आओ. मैं रक्षा की अभिलाषा से तुम्हें बुलाता हूं. तुम मुझ हव्यदाता को रत्न दान करो. (२३) स्वाहाकृतस्य तृम्पतं सुतस्य देवावन्धसः. आ यातमश्विना गतमवस्युर्वामिहं हुवे धतं रत्नानि दाशुषे.. (२४) हे देव अश्विनीकुमारो! तुम स्वाहा शब्द के द्वारा किए हुए सोमरस से तृप्त बनो. तुम सोमरस के सामने आओ. मैं रक्षाभिलाषी बनकर तुम्हें बुलाता हूं. तुम मुझ हव्यदाता को रत्न दो. (२४) सूक्त—३६ देवता—इंद्र अवितासि सुन्वतो वृक्तबर्हिषः पिबा सोमं मदाय कं शतक्रतो. यं ते भागमधारयन्विश्वाः सेहानः पृतना उरु ज्रयः समप्सुजिन्मरुत्वाँ इन्द्र सत्पते.. (१) हे बहुकर्म वाले इंद्र! तुम सोमरस निचोड़ने वाले एवं कुश बिछाने वाले यजमान के रक्षक हो. हे सज्जनपालक इंद्र! देवों ने तुम्हारे लिए सोमरस का जो भाग निश्चित किया है उसे समस्त शत्रुसेनाओं एवं वेगों को पराजित करके तथा जल के बीच में विजयी बनकर ebook converter DEMO Watermarks*