भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 1281, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 1281

ययोर्विश्वमिदं जगदियं द्यौः पृथिवी महु१पस्थे बिभृतो वसु नभन्तामन्यके समे.. (४) हे नाभाक! यज्ञ और स्तुति के द्वारा इंद्र और अग्नि की पूजा करो. इन्हीं में सारा संसार स्थित है और इन्हीं की गोद में द्युलोक एवं विशाल धरती धन धारण करते हैं. ये दोनों सभी शत्रुओं को नष्ट करें. (४) प्र ब्रह्माणि नभाकवदिन्द्राग्निभ्यामिरज्यत. या सप्तबुध्नमर्णवं जिह्मबारमपोर्णुत इन्द्र ईशान ओजसा नभन्तामन्यके समे.. (५) नाभाक जैसे ऋषि इंद्र एवं अग्नि की स्तुति करते हैं. वे दोनों सात जड़ों एवं बंद द्वारों वाले सागर को अपने तेज द्वारा ढक लेते हैं. इंद्र अपने तेज के कारण सबके स्वामी हैं. इंद्र एवं अग्नि सभी शत्रुओं को मारें. (५) अपि वृश्च पुराणवद् व्रततेरिव गुष्पितमोजो दासस्य दम्भय. वयं तदस्य सम्भृतं वस्विन्द्रेण वि भजेमहि नभन्तामन्यके समे.. (६) हे इंद्र! पुराना मनुष्य जैसे लता की बाहर निकली हुई शाखा को काटता है, उसी प्रकार तुम हमारे शत्रुओं को काटो एवं दास नामक राक्षस का विनाश करो. हम इंद्र की कृपा से दास द्वारा एकत्रित धन का भोग करेंगे. इंद्र और अग्नि हमारे सभी शत्रुओं को मारें. (६) यदिन्द्राग्नी जना इमे विह्वयन्ते तना गिरा. अस्माकेभिर्नृभिर्वयं सासह्वाम पृतन्यतो वनुयाम वनुष्यतो नभन्तामन्यके समे.. (७) जो लोग धन और स्तुतियों द्वारा इंद्र तथा अग्नि को बुलाते हैं, उनके मध्य हम नाभाकगोत्रीय लोग सेवा की इच्छा करते हुए अपने लोगों को साथ लेकर शत्रुओं को पराजित करेंगे एवं स्तुति करने वालों को अपनाएंगे. इंद्र और अग्नि सभी शत्रुओं को नष्ट करें. (७) या नु श्वेताववो दिव उच्चरात उप द्युभिः. इन्द्राग्न्योरनु व्रतमुहाना यन्ति सिन्धवो यान्त्सीं बन्धादमुञ्चतां नभन्तामन्यके समे.. (८) जो श्वेत वर्ण के इंद्र एवं अग्नि अपनी दीप्ति द्वारा नीचे से द्युलोक से ऊपर जाते हैं, उन्हीं के यज्ञकर्म को अनुष्ठान करते हुए यजमान हव्य धारण करते हैं. उन्होंने नदियों को बंधन से छुड़ाया था. वे सभी शत्रुओं को मारें. (८) पूर्वीष्ट इन्द्रोपमातयः पूर्वीरुत प्रशस्तयः सूनो हिन्वस्य हरिवः. वस्वो वीरस्यापृचो या नु साधन्त नो धियो नभन्तामन्यके समे.. (९) हे हरि नामक घोड़ों वाले, प्रेरणाकर्त्ता, प्रसन्न करने वाले, वीर एवं धनी इंद्र! तुम्हारी समानता करने वाली बहुत सी वस्तुएं हैं. तुम्हारी प्राचीन स्तुतियां हमारी बुद्धि को पूर्ण करें. ebook converter DEMO Watermarks*