भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 1341, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 1341

मैं पापों का भली प्रकार नाश करने वाले, प्रशंसनीय एवं मानवहितकारी उन अग्नि की स्तुति करता हूं, जिनकी ज्वालाओं में श्रुतर्वा एवं महान् ऋक्षपुत्र यज्ञकर्म करते हैं. (४) अमृतं जातवेदसं तिरस्तमांसि दर्शतम्. घृताहवनमीड्यम्.. (५) मैं मरणरहित, जातवेद, अंधकार का नाश करने वाले, घृत द्वारा हवन करने योग्य एवं स्तुतिपात्र अग्नि के पास जाता हूं. (५) सबाधो यं जना इमेऽग्निं हव्यभिरीळते. जुह्वानासो यतस्रुचः.. (६) अभिलाषायुक्त अध्वर्यु आदि यज्ञ करते हुए एवं हाथ में स्रुच लेकर हव्यों द्वारा अग्नि की स्तुति करते हैं. (६) इयं ते नव्यसी मतिरग्ने अधाय्यस्मदा. मन्द्र सुजात सुक्रतोऽमूर दस्मातिथे.. (७) प्रसन्न, शोभन-जन्म वाले, शोभन-यज्ञ वाले, बुद्धिमान्, दर्शनीय एवं अतिथि के समान पूज्य अग्नि! मैं तुम्हें नवीन स्तुति अर्पित करता हूं. (७) सा ते अग्ने शन्तमा चनिष्ठा भवतु प्रिया. तया वर्धस्व सुष्टुतः.. (८) हे अग्नि! वह स्तुति तुम्हें अत्यंत सुखकर, अधिक अन्न देने वाली एवं प्रिय हो. तुम मेरी स्तुति द्वारा भली-भांति स्तुत होकर बढ़ो. (८) सा द्युम्नैर्द्युम्निनी बृहदुपोप श्रवसि श्रवः. दधीत वृत्रतूर्ये.. (९) हमारे द्वारा की जाती हुई स्तुति अधिक अन्नयुक्त है. वह युद्ध में अन्न के ऊपर अधिक अन्न धारण करे. (९) अश्वमिद्गां रथप्रां तवेषमिन्द्रं न सत्पतिम्. यस्य श्रवांसि तूर्वथ पन्यंपन्यं च कृष्टयः.. (१०) प्रजाएं अग्नि की स्तुति तेज चलने वाले घोड़े तथा सज्जनों का पालन करने वाले इंद्र के समान करती हैं. अग्नि हमारे रथों को धनों से भरते एवं शक्ति द्वारा शत्रु के अन्न और धन को नष्ट करते हैं. (१०) यं त्वा गोपवनो गिरा चनिष्ठदग्ने अङ्गिरः. स पावक श्रुधी हवम्.. (११) हे सर्वत्र गमनशील एवं पवित्रकर्ता अग्नि! गोपवन ऋषि ने तुम्हें अतिशय अन्नदाता बनाया था. तुम उनकी पुकार सुनो. (११) स त्वा जनास ईळते सबाधो वाजसातये. स बोधि वृत्रतूर्ये.. (१२) ebook converter DEMO Watermarks*