ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1347, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंहे इंद्र! आकाश में घूमने वाले एवं तुम्हारे द्वारा प्रेरित आदित्य तुम्हारे द्वारा बनाए जल संसार को देते हैं. इंद्र ने सौ भैंसें, दूध के साथ पका हुआ भात एवं जल चुराने वाला बादल बनाया. (१०) तुविक्षं ते सुकृतं सूमयं धनुः साधुर्बुन्दो हिरण्ययः. उभा ते बाहू रण्या सुसंस्कृत ऋदूपे चिद्ददूवृधा.. (११) हे इंद्र! तुम्हारा धनुष अनेक बाण फेंकने वाला, भली प्रकार बना हुआ एवं सुखदाता है तथा तुम्हारा बाण सोने का है. तुम्हारी भुजाएं रमणीय, भली प्रकार अलंकृत एवं युद्ध में हनन करने वाली हैं. (११) सूक्त—६७ देवता—इंद्र पुरोळाशं नो अन्धस इन्द्र सहस्रमा भर. शता च शूर गोनाम्.. (१) हे इंद्र! हमारे दिए हुए पुरोडाश अन्न को स्वीकृत करके हमें सौ और हजार गाएं दो. (१) आ नो भर व्यञ्जनं गामश्वमभ्यञ्जनम्. सचा मना हिरण्यया.. (२) हे इंद्र! हमें सोने के मनोहर अलंकारों के साथ गाएं, घोड़े और तेल दो. (२) उत नः कर्णशोभना पुरूणि धृष्णवा भर. त्वं हि शृण्विषे वसो.. (३) हे शत्रुओं को नष्ट करने वाले एवं निवासस्थान देने वाले इंद्र! हमने तुम्हारा यश सुना है. तुम हमें बहुत से कान के गहने दो. (३) नकीं वृधीक इन्द्र ते न सुषा न सुदा उत. नान्यस्त्वच्छूर वाघतः.. (४) हे शूर इंद्र! तुम्हारे अतिरिक्त कोई भी बढ़ाने वाला नहीं है. तुम्हारे अतिरिक्त कोई भी संग्राम में सहायता करने वाला एवं उत्तम दाता नहीं है. तुम्हारे अतिरिक्त यजमान का कोई इंद्र नहीं है. (४) नकीमिन्द्रो निकर्तवे न शक्रः परिशक्तवे. विश्वं शृणोति पश्यति.. (५) शक्तिशाली इंद्र किसी का न तिरस्कार करते हैं और न किसी से पराजित हो सकते हैं. इंद्र संसार को सुनते और देखते हैं. (५) स मन्युं मर्त्यानामदब्धो नि चिकीषते. पुरा निदश्विकीषते.. (६) अपराजेय इंद्र किसी के भी प्रति मन में क्रोध नहीं करते. इंद्र निंदा के पूर्व मन में निंदा को स्थान नहीं देते. (६) ebook converter DEMO Watermarks*