भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 1709, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 1709

हे जल के स्वामी अश्विनीकुमारो! जिस समय तुम सूर्या का वरण करने उसके समीप गए, उस समय तुम्हारा एक रथचक्र कहां था एवं तुम दान के लिए कहां स्थित थे? (१५) द्वे ते चक्रे सूर्ये ब्रह्माण ऋतुथा विदुः. अथैकं चक्रं यद्गुहा तद्धातय इद्विदुः.. (१६) हे सूर्या! ब्राह्मण लोग जानते हैं कि तुम्हारे शकट के सूर्यचंद्र दोनों पहिए समय के अनुसार चलते हैं. तुम्हारा संवत्सररूप पहिया जो गुफा में छिपा हुआ है, उसे मेधावी लोग जानते हैं. (१६) सूर्यायै देवेभ्यो मित्राय वरुणाय च. ये भूतस्य प्रचेतस इदं तेभ्योऽकरं नमः.. (१७) सूर्या, देवगण, मित्र, वरुण एवं प्राणियों को अभीष्ट फल देने वालों को मैं नमस्कार करता हूं. (१७) पूर्वापरं चरतो माययैतौ शिशू क्रीळन्तौ परि यातौ अध्वरम्. विश्वान्यन्यो भुवनाभिचष्ट ऋतूँरन्यो विदधज्जायते पुनः.. (१८) दोनों बालक अर्थात् सूर्य-चंद्र अपनी शक्ति से पूर्व और पश्चिम में घूमते हैं. क्रीड़ा करते हुए यज्ञ में आते हैं. इन में से पहला अर्थात् सूर्य सब लोकों को देखता है तथा दूसरा अर्थात् चंद्र वसंत आदि ऋतुओं का निर्माण करता हुआ बार-बार जन्म लेता है. (१८) नवोनवो भवति जायमानोऽह्नां केतुरुषसामेत्यग्रम्. भागं देवेभ्यो वि दधात्यायन्प्र चन्द्रमास्तिरते दीर्घमायुः.. (१९) दिन के सूचक सूर्य उत्पन्न होने पर नए होते हैं एवं उषाओं के सामने जाते हैं. सूर्य आते हुए देवों में यज्ञ का भाग बांटते हैं एवं चंद्रमा लोगों को चिरजीवन देता है. (१९) सुकिंशुकं शल्मलिं विश्वरूपं हिरण्यवर्णं सुवृतं सुचक्रम्. आ रोह सूर्ये अमृतस्य लोकं स्योनं पत्ये वहतुं कृणुष्व.. (२०) हे सूर्या! तुम शोभन पलाश एवं शाल्मली वृक्षों द्वारा निर्मित नाना रूप वाले सुनहरे आभूषणों से युक्त संगठित एवं सुंदर पहियों वाले रथ पर चढ़ो. तुम अपने पति से सुखकर एवं अमृत स्थान पर प्राप्त होओ. (२०) उदीर्ष्वातः पतिवती ह्ये३षा विश्वावसुं नमसा गीर्भिरीळे. अन्यामिच्छ पितृषदं व्यक्तां स ते भागो जनुषा तस्य विद्धि.. (२१) हे विश्वावसु! कन्या के पास से उठो, क्योंकि यह कन्या पति वाली हो चुकी है. मैं नमस्कार और स्तुतियों द्वारा तुम्हारी स्तुति करता हूं. पिता के घर में विवाह योग्य दूसरी कन्या हो तो उसकी इच्छा करो. यह समझ लो कि तुम्हारे भाग के रूप में वही उत्पन्न हुई है. (२१) ebook converter DEMO Watermarks*

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