ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1710, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंउदीर्ष्वातो विश्वावसो नमसेळामहे त्वा. अन्यामिच्छ प्रफर्व्यं१ सं जायां पत्या सृज.. (२२) हे विश्वावसु! यहां से उठो. मैं नमस्कारपूर्वक तुम्हारी पूजा करता हूं. विशाल नितंबों वाली अन्य कन्या को चाहो एवं उसे पत्नी बनाकर स्वयं से मिलाओ. (२२) अनृक्षरा ऋजवः सन्तु पन्था येभिः सखायो यन्ति नो वरेयम्. समर्यमा सं भगो नो निनीयात्सं जास्पत्यं सुयममस्तु देवाः.. (२३) हे देवो! जिस मार्ग से हमारे मित्र कन्या के पिता के पास जाते हैं, वह मार्ग कंटकरहित एवं सरल हो. अर्यमा एवं भग नामक देव हमें भली प्रकार ले चलें. पति एवं पत्नी भली प्रकार मिलकर रहें. (२३) प्र त्वा मुञ्चामि वरुणस्य पाशाद्येन त्वाबध्नात्सविता सुशेवः. ऋतस्य योनौ सुकृतस्य लोकेऽरिष्टां त्वा सह पत्या दधामि.. (२४) हे वधू! सुंदर मुख वाले सूर्य देव ने तुम्हें जिस बंधन से बांधा था, मैं तुम्हें वरुण के उस पाश से छुड़ाता हूं. मैं तुम्हें पति के साथ सत्य के आधार एवं सत्कर्म के लोकरूप स्थान में निर्विघ्नरूप से स्थापित करता हूं. (२४) प्रेतो मुञ्चामि नामुतः सुबद्धाममुतस्करम्. यथेयमिन्द्र मीढ्वः सुपुत्रा सुभगासति.. (२५) मैं कन्या को पिता के कुल से छुड़ाता हूं, पति के कुल से नहीं. मैं पति के घर से इसे भली-भांति बांधता हूं. हे अभिलाषापूरक इंद्र! यह सौभाग्य एवं शोभन पुत्र वाली हो. (२५) पूषा त्वेतो नयतु हस्तगृह्याश्विना त्वा प्र वहतां रथेन. गृहान्गच्छ गृहपत्नी यथासो वशिनी त्वं विदथमा वदासि.. (२६) हे कन्या! पूषा तुम्हारा हाथ पकड़कर यहां से ले जावें. अश्विनीकुमार तुम्हें रथ द्वारा ले जावें. तुम गृहपत्नी बनने के लिए पति के घर जाओ एवं पति के वश में रहकर घर की व्यवस्था करो. (२६) इह प्रियं प्रजया ते समृध्यतामस्मिन् गृहे गार्हपत्याय जागृहि. एना पत्या तन्वं१सं सृजस्वाधा जिव्री विदथमा वदाथः.. (२७) हे वधू! तुम इस पतिगृह में प्यारी संतान के साथ समृद्ध बनो. इस घर में तुम गृहस्थी चलाने के लिए सावधान रहना. इस पति के साथ अपने शरीर का संयोग करो. तुम दोनों बूढ़े होने तक इस घर को अपना कहना. (२७) ebook converter DEMO Watermarks*