भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 1790, कुल 1855 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1790

जो इंद्र जन्म के साथ ही शत्रुविनाश करने लगे, सभी देवता उनका स्वागत करते हैं. (१) वावृधानः शवसा भूर्योजाः शत्रुर्दासस्य भियसं दधाति. अव्यनच्च व्यनच्च सस्नि सं ते नवन्त प्रभृता मदेषु.. (२) बल से बढ़ते हुए, अधिक शक्तिशाली एवं शत्रुहंता इंद्र दासों के मन में अधिक भय उत्पन्न करते हैं. प्राणयुक्त एवं प्राणहीन पदार्थ इंद्र के द्वारा संशोधित होते हैं. हे इंद्र! तुम्हारी प्रसन्नता उत्पन्न होने पर सभी पोषित प्राणी स्तुति हेतु एकत्र होते हैं. (२) त्वे क्रतुमपि वृञ्जन्ति विश्वे द्विर्यदेते त्रिर्भवन्त्यूमाः. स्वादोः स्वादीयः स्वादुना सृजा समदः सु मधु मधुनाभि योधीः.. (३) हे इंद्र! सभी यजमान अपना यज्ञ तुम पर समाप्त करते हैं. तुम्हें तृप्त करने वाले लोग पत्नी के रूप में दोगुने एवं संतान के रूप में तिगुने बनते हैं. तुम घर, धन आदि से, प्रिय पत्नी से उत्पन्न परम प्रिय संतान से हमें मिलाओ. हमारी प्रिय संतान को उससे भी अधिक नातियों आदि से क्रीड़ित करो. (३) इति चिद्धि त्वा धना जयन्तं मदेमदे अनुमदन्ति विप्राः. ओजीयो धृष्णो स्थिरमा तनुष्व मा त्वा दभन्यातुधाना दुरेवाः.. (४) हे इंद्र! तुम जब-जब सोमपान के बाद शत्रु के धनों को जीतकर प्रसन्न होते हो, तब-तब तुम्हारे बाद मेधावी जल हर्षित होते हैं. हे शत्रुनाशक इंद्र! हमें अधिक शक्ति वाला धन दो, दुर्गतियां एवं राक्षस तुम्हें बाधा न पहुंचावें. (४) त्वया वयं शाशद्महे रणेषु प्रपश्यन्तो युध्येन्यानि भूरि. चोदयामि त आयुधा वचोभिः सं ते शिशामि ब्रह्मणा वयांसि.. (५) हे इंद्र! तुम्हारे द्वारा अनुगृहीत होकर हम शत्रुओं का खूब नाश करें एवं युद्धों में युद्ध के योग्य बहुत से आयुधों को जानते हुए तुम्हारे वज्र आदि को शत्रुओं की ओर प्रेरित करें. हम तुम्हारे लिए मंत्रोच्चारण के साथ-साथ अन्न का संस्कार करते हैं. (५) स्तुषेय्यं पुरुवर्पसमृभ्वमिनतममाप्त्यमाप्त्यानाम्. आ दर्षते शवसा सप्त दानून्प्र साक्षते प्रतिमानानि भूरि.. (६) जो इंद्र अपनी शक्ति से वृत्र आदि सात राक्षसों को मारते हैं एवं जो राक्षसों के बहुत से स्थानों को प्राप्त करते हैं. हम उन्हीं स्तुतियोग्य अनेक रूप वाले दीप्तिशाली, स्वामी एवं परम विश्वसनीय इंद्र की स्तुति करते हैं. (६) नि तद्दधिषेऽवरं परं च यस्मिन्नाविथावसा दुरोणे. आ मातरा स्थापयसे जिगत्नू अत इनोषि कर्वरा पूरूणि.. (७) ebook converter DEMO Watermarks*