भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 216, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 216

यजमान नमस्कार करते हुए अपने आप चमकने वाले उसी अग्नि को हवि देकर उपासना करते हैं. शत्रु को करारी हार देने के इच्छुक लोग होताओं द्वारा अग्नि को प्रज्वलित करते हैं. (७) घ्नन्तो वृत्रमतरन्रोदसी अप उरु क्षयाय चक्रिरे. भुवत्कण्वे वृषा द्युम्न्याहुतः क्रन्ददश्वो गविष्टिषु.. (८) हे अग्नि! तुम्हारी सहायता से देवों ने वृत्र को मारकर रहने के लिए स्वर्ग, पृथ्वी और आकाश को विस्तृत किया. जिस प्रकार संग्राम में हिनहिनाता हुआ घोड़ा गाएं प्राप्त करता है, उसी प्रकार भली प्रकार बुलाए जाने पर तुम कण्व ऋषि के लिए इच्छानुसार धन बरसाओ. (८) सं सीदस्व महाँ असि शोचस्व देववीतमः. वि धूममग्ने अरुषं मियेध्य सृज प्रशस्त दर्शतम्.. (९) हे अग्नि! तुम भली प्रकार बैठो. तुम महान् हो. तुम देवताओं की प्रबल इच्छा करते हुए जलो. हे बुद्धिमान् एवं प्रशंसनीय अग्नि! तुम इधर-उधर फैलने वाले धुएं को विशेष रूप से बनाओ. (९) यं त्वा देवासो मनवे दधुरिह यजिष्ठं हव्यवाहन. यं कण्वो मेध्यातिथिर्धनस्पृतं यं वृषा यमुपस्तुतः.. (१०) हे हव्यवाहक अग्नि! समस्त देवों ने मनु के लिए इस यज्ञस्थल में तुझ परम पूज्य अग्नि को धारण किया था. कण्व ने पूज्य अतिथियों के साथ धन द्वारा प्रसन्न करने वाले तुझ अग्नि को धारण किया था. वर्षा करने वाले इंद्र एवं अन्य स्तुतिकर्त्ताओं ने भी तुम्हें धारण किया था. (१०) यमग्निं मेध्यातिथिः कण्व ईध ऋतादधि. तस्य प्रेषो दीदियुस्तमिमा ऋचस्तमग्निं वर्धयामसि.. (११) पूज्य अतिथियों वाले कण्व ने जिस अग्नि को सूर्य से लेकर प्रज्वलित किया था, उसी अग्नि की फैलने वाली किरणें चमक रही हैं. हमारी ये ऋचाएं तथा हम उसी अग्नि को बढ़ाते हैं. (११) रायस्पूर्धि स्वधावोऽस्ति हि तेऽग्ने देवेष्वाप्यम्. त्वं वाजस्य श्रुत्यस्य राजसि स नो मृळ महाँ असि.. (१२) हे अन्न सहित अग्नि! हमें धन दो. तुम्हारी देवों से मित्रता है, तुम प्रसिद्ध अन्न के स्वामी एवं महान् हो. तुम हमें सुखी बनाओ. (१२) ebook converter DEMO Watermarks*