ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 217, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंऊर्ध्व ऊ षु ण ऊतये तिष्ठा देवो न सविता. ऊर्ध्वो वाजस्य सनिता यदञ्जिभिर्वाघद्भिर्विह्वयामहे.. (१३) तुम हमारी रक्षा के लिए सूर्य के समान उन्नत बनो. ऊंचे उठकर तुम हमें अन्न देने वाले बनोगे, क्योंकि यूप गाड़ने वाले एवं यज्ञ पूर्ण करने वाले ऋत्विजों द्वारा हम तुम्हें बुलाते हैं. (१३) ऊर्ध्वो नः पाह्यंहसो नि केतुना विश्वं समत्रिणं दह. कृधी न ऊर्ध्वाञ्चरथाय जीवसे विदा देवेषु नो दुवः.. (१४) तुम ऊंचे उठकर ज्ञान की सहायता से हमें पापों से बचाओ एवं समस्त राक्षसों को जला दो. संसार में घूमने-फिरने के लिए हमें उन्नत बनाओ तथा हमें जीवित रखने के लिए हमारा हविरूपी धन देवों के पास ले जाओ. (१४) पाहि नो अग्ने रक्षसः पाहि धूर्तेररावणः. पाहि रीषत उत वा जिघांसतो बृहद्भानो यविष्ठ्य.. (१५) हे विशाल किरणों वाले युवक अग्नि! हमें बाधक राक्षसों से बचाओ. धन दान न करने वाले धूर्त हिंसक पशु और मारने की इच्छा रखने वाले शत्रु से हमारी रक्षा करो. (१५) घनेव विष्वग्वि जह्यरावणस्पुर्जम्भ यो अस्मध्रुक्. यो मर्त्यः शिशीते अत्यक्तुभिर्मा नः स रिपुरीशत.. (१६) हे उष्ण किरणों वाले अग्नि! हम लोग जिस प्रकार डंडे, पत्थर आदि से मिट्टी का बर्तन फोड़ते हैं, तुम उसी प्रकार धन दान न करने वाले, हमसे द्वेष रखने वाले एवं हमें डराने- धमकाने वाले तथा शस्त्रप्रहार करने वाले शत्रु का सब प्रकार से संहार करो. (१६) अग्निर्वव्ने सुवीर्यमग्निः कण्वाय सौभगम्. अग्निः प्रावन्मित्रोत मेध्यातिथिम्नग्निः साता उपस्तुतम्.. (१७) अग्नि से शक्तिदायक अन्न की याचना की जाती है. अग्नि ने कण्व को सौभाग्य प्रदान किया, हमारे मित्रों की रक्षा की तथा पूज्य अतिथियों वाले ऋषि की रक्षा की. धन प्राप्ति के लिए जिस किसी ने अग्नि की स्तुति की, उसी को धन देकर अग्नि ने रक्षा की. (१७) अग्निना तुर्वशं यदुं परावत उग्रादेवं हवामहे. अग्निर्नयन्नववास्त्वं बृहद्रथं तुर्वीतिं दस्यवे सहः.. (१८) हम चोरों का दमन करने वाले अग्नि को तुर्वया, यदु और उग्रादेव ऋषियों के साथ दूर देश से बुलाते हैं. यह अग्नि न्वास्त्व, बृहद्रथ और तुर्वीत नामक राजर्षियों को इस यज्ञ में बुलावें. (१८) eBook converter DEMO Watermarks*