भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 218, कुल 1855 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 218

नि त्वामग्ने मनुर्दधे ज्योतिर्जनाय शश्वते. दीदेथ कण्व ऋतजात उक्षितो यं नमस्यन्ति कृष्टय:.. (१९) हे प्रकाशरूप अग्नि! मनु ने समस्त जातियों के कल्याण के लिए तुम्हारी स्थापना की थी. हे अग्नि देव! तुमने यज्ञ के निमित्त उत्पन्न होकर हव्य से तृप्ति प्राप्त की और कण्व को प्रकाश दिया. मनुष्य तुम्हें नमस्कार करते हैं. (१९) त्वेषासो अग्नेरमवन्तो अर्चयो भीमासो न प्रतीतये. रक्षस्विनः सदमिद्यातुमावतो विश्वं समत्रिणं दह.. (२०) अग्नि की ज्वालाएं चमकीली, शक्तिशाली और भयानक हैं. इसलिए उसे कोई नष्ट नहीं कर सकता. हे अग्नि देव! राक्षसों, यातुधानों एवं हमारे विश्व भक्षक शत्रुओं को जलाओ. (२०) सूक्त—३७ देवता—मरुद्गण क्रीळं वः शर्धो मारुतमनर्वाणं रथेशुभम्. कण्वा अभि प्र गायत.. (१) हे कण्व गोत्रोत्पन्न ऋषियो! विहरणशील एवं शत्रुरहित मरुतों को लक्ष्य करके स्तुति करो. वे अपने रथ पर सुशोभित होते हैं. (१) ये पृषतीभिरृष्टिभिः साकं वाशीभिरञ्जिभिः. अजायन्त स्वभानवः.. (२) बिंदुयुक्त हरिणियां मरुतों का वाहन हैं. उन्होंने इन वाहनों के साथ प्रकाशवान् होकर घोर गर्जन, आयुधसमूह तथा अलंकारों सहित जलग्रहण किया. (२) इहेव शृण्व एषां कशा हस्तेषु यद्वदान्. नि यामञ्चित्रमृञ्जते.. (३) मरुतों के हाथ में रहने वाले चाबुक का शब्द हम सुन रहे हैं. चाबुक का वह शब्द युद्ध में हमारी शक्ति बढ़ाता है. (३) प्र वः शर्धाय घृष्वये त्वेषद्युम्नाय शुष्मिणे. देवत्तं ब्रह्म गायत.. (४) हे ऋत्विजो! तुम्हारे बल का समर्थन करने वाले, शत्रु दमनकारी, उज्ज्वलकीर्तिसंपन्न एवं शक्तिशाली मरुतों की स्तुति हवि ग्रहण के उद्देश्य से करो. (४) प्र शंसा गोष्वघ्न्यं क्रीळं यच्छर्धो मारुतम्. जम्भे रसस्य वावृधे.. (५) हे ऋत्विजो! दूध देने वाली गायों के बीच स्थित मरुद्गणों के अविनाशी, विहारशील एवं सहन करने योग्य तेज की प्रशंसा करो. वह तेज गाय का दूध पीने के कारण बढ़ा है. (५) ebook converter DEMO Watermarks*