भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 219, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 219

को वो वर्षिष्ठ आ नरो दिवश्च ग्मश्च धूतयः. यत्सीमन्तं न धूनुथ.. (६) हे धरती और आकाश को कंपित करने वाले मरुद्गणो! तुमसे कौन बड़ा है? तुम जैसे पेड़ की चोटी को कंपित कर देते हो, उसी प्रकार सब दिशाओं को कंपा दो. (६) नि वो यामाय मानुषो दध्र उग्राय मन्यवे. जिहीत पर्वतो गिरिः.. (७) हे मरुद्गणो! तुम्हारे चलने से घर गिर पड़ेगा, इस भय से लोगों ने घरों में मजबूत खंभे गाड़े हैं. तुम्हारी चाल उग्र एवं झकझोरने वाली है. तुम्हारी तेज चाल से चोटियों वाले अनेक पर्वत हिल जाते हैं. (७) येषामज्मेषु पृथिवी जुजुर्वाँ इव विश्पतिः. भिया यामेषु रेजते.. (८) हे मरुद्गणो! तुम्हारी चाल सभी पदार्थों को दूर फेंक देती है. वृद्ध एवं दुर्बल राजा शत्रु के भय से जिस प्रकार कांपता है, उसी प्रकार तुम्हारे चलने से धरती कांपती है. (८) स्थिरं हि जानमेषां वयो मातुर्रिरतवे. यत्सीमनु द्विता शवः.. (९) मरुतों की उत्पत्ति का स्थान आकाश स्थिर रहता है. आकाश मरुतों की माता के समान है. आकाश में होकर पक्षी निकल सकते हैं. मरुतों का बल धरती और आकाश को पृथक् करता है. (९) उदु त्ये सूनवो गिरः काष्ठा अज्मेश्वत्नत. वाश्रा अभिज्ञु यातवे.. (१०) शब्दों के जन्मदाता मरुद्गण चलते समय जल का विस्तार करते हैं और रंभाती हुई गायों को घुटने तक गहरे जल में प्रवेश करने को प्रेरित करते हैं. (१०) त्यं चिद्घा दीर्घं पृथुं मिहो नपातममृध्रम्. प्रच्यावयन्ति यामभिः.. (११) मरुद्गण अपनी तेज चाल से विस्तृत, मोटे, जल न बरसाने वाले, अपराजेय एवं प्रसिद्ध बादलों को भी कंपित कर देते हैं. (११) मरुतो यद्ध वो बलं जनाँ अच्युच्यवीतन. गिरीँ रचुच्यवीतन.. (१२) हे मरुतो! तुम शक्तिशाली हो, इसलिए समस्त प्राणियों को अपने-अपने काम में लगाते हो तथा मेघों को भी प्रेरित करते हो. (१२) यद्व यान्ति मरुतः सं ह ब्रुवतेऽध्वन्ना. शृणोति कश्चिदेषाम्.. (१३) मरुद्गण जब चलते हैं तो मार्ग में सब ओर ध्वनि अवश्य करते हैं. उस ध्वनि को चाहे जो सुन सकता है. (१३) ebook converter DEMO Watermarks*