ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 224, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंउत्तिष्ठ ब्रह्मणस्पते देवयन्तस्त्वेमहे. उप प्र यन्तु मरुतः सुदानव इन्द्र प्राशूर्भवा सचा.. (१) हे ब्रह्मणस्पति! हम पर अनुग्रह करने के लिए अपने निवासस्थान से उठो. देवताओं की इच्छा करने वाले हम तुमसे याचना करते हैं. सुंदर दान करने वाले मरुद्गण तुम्हारे समीप जावें. हे इंद्र! तुम ब्रह्मणस्पति के सोमरस का सेवन करो. (१) त्वामिद्धि सहसस्पुत्र मर्त्य उपब्रूते धने हिते. सुवीर्यं मरुत आ स्वश्व्यं दधीत यो व आचके.. (२) हे परम बल पालक! शत्रुओं के बीच फंसे हुए धन को प्राप्त करने के लिए मनुष्य तुम्हारी ही स्तुति करते हैं. हे मरुद्गणो! धन का इच्छुक जो मनुष्य, ब्रह्मणस्पति सहित तुम्हारी स्तुति करता है, वह सुंदर अश्व एवं शोभन वीर्य संपन्न धन प्राप्त करता है. (२) प्रैतु ब्रह्मणस्पतिः प्र देव्येतु सूनृता. अच्छा वीरं नर्यं पङ्क्तिराधसं देवा यज्ञं नयन्तु नः.. (३) ब्रह्मणस्पति एवं प्रिय सत्य रूपा वाग्देवी हमें प्राप्त हों. ब्रह्मणस्पति आदि देव वीर शत्रुओं को हमसे बहुत दूर ले जावें एवं हमें मानव हितकारी तथा द्रव्यपूर्ण यज्ञों में ले जावें. (३) यो वाघते ददाति सूनरं वसु स धत्ते अक्षिति श्रवः. तस्मा इळां सुवीरामा यजामहे सुप्रतूर्तिमनेहसम्.. (४) ऋत्विज् को उत्तम धन देने वाला यजमान अक्षय अन्न प्राप्त करता है. उस यजमान के निमित्त हम सुवीरा इला से याचना करते हैं. वह शत्रु का नाश करती है, पर उसे कोई नहीं मार सकता. (४) प्र नूनं ब्रह्मणस्पतिर्मन्त्रं वदत्युक्थ्यम्. यस्मिन्निन्द्रो वरुणो मित्रो अर्यमा देवा ओकांसि चक्रिरे.. (५) ब्रह्मणस्पति होता के मुख में बैठकर निश्चय ही पवित्र मंत्र बोलते हैं. उस मंत्र में इंद्र, वरुण, मित्र और अर्यमा देव निवास करते हैं. (५) तमिद्द्रोचेमा विदथेषु शम्भुवं मन्त्रं देवा अनेहसम्. इमां च वाचं प्रतिहर्यथा नरो विश्वेद्वामा वो अश्नवत्.. (६) हे ब्रह्मणस्पति प्रभृति देवो! हम उसी इंद्र प्रतिपादक पवित्र मंत्र को बोलते हैं. हे नेताओ! यदि आप हमारे वचनों को चाहते हैं तो सभी शोभन वचन आपको प्राप्त होंगे. (६) ebook converter DEMO Watermarks*