ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 225, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंको देवयन्तमश्ववज्जनं को वृक्तबर्हिषम् प्रप्र दाश्वान्पस्त्याभिरस्थितान्तर्वात्वक्षयं दधे.. (७) देवों की अभिलाषा करने वाले एवं यज्ञ के निमित्त कुश तोड़ने वाले यजमान के समीप ब्रह्मणस्पति के अतिरिक्त कौन देवता आ सकता है? हव्यदाता यजमान ऋत्विजों के साथ भांति-भांति की संपत्तियों से युक्त घर से निकलकर यज्ञस्थल की ओर प्रस्थान कर चुके हैं. (७) उप क्षत्रं पृञ्चीत हन्ति राजभिर्भये चित्सुक्षितिं दधे. नास्य वर्ता न तरुता महाधने नार्भे अस्ति वज्रिण:... (८) ब्रह्मणस्पति अपने शरीर में शक्ति का संचय करें. वे वरुण आदि राजाओं के साथ शत्रुओं का नाश करते हैं एवं भयानक युद्ध में भी डटे रहते हैं. वज्रधारी ब्रह्मणस्पति को प्रभूत घर प्राप्ति के लिए होने वाले बड़े अथवा छोटे युद्ध में प्रेरित या उत्साहहीन करने वाला दूसरा नहीं है. (८) सूक्त—४१ देवता—वरुण आदि यं रक्षन्ति प्रचेतसो वरुणो मित्र अर्यमा. नू चित्य दभ्यते जन:... (१) उत्तम ज्ञान से संपन्न वरुण, मित्र और अर्यमा देवता जिसकी रक्षा करते हैं, वह शीघ्र ही सब शत्रुओं को मार डालता है. (१) यं बाहुतेव पिप्रति पान्ति मर्त्यं रिष:. अरिष्ट: सर्व एधते.. (२) वरुणादि देव जिस यजमान को अपने हाथ से धनसंपन्न करते एवं हिंसकों से बचाते हैं, वह सबसे सुरक्षित रहकर उन्नति करता है. (२) वि दुर्गा वि द्विषः पुरो घ्नन्ति राजान एषाम्. नयन्ति दुरिता तिर:... (३) वरुणादि राजा अपने यजमान के सामने स्थित शत्रु का दुर्ग तोड़कर शत्रुओं का नाश करते हैं. इसके पश्चात् वे यजमान के पापों को भी नष्ट कर देते हैं. (३) सुगः पन्था अनृक्षर आदित्यास ऋतं यते. नात्रावखादो अस्ति व:... (४) हे आदित्यो! तुम जिस मार्ग से यज्ञ में जाते हो, वह सुगम और निष्कंटक है. इस यज्ञ में ऐसा हवि नहीं, जिससे तुम्हें घृणा हो. (४) यं यज्ञं नयथा नर आदित्या ऋजुना पथा. प्र वः स धीतये नशत्.. (५) eBook converter DEMO Watermarks*