भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 377, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 377

हे उषा! तुम सूर्य की किरणों के अनुकूल चलती हुई हमें ऐसी बुद्धि दो, जिससे हम यज्ञ आदि कर्मों के द्वारा अपना कल्याण कर सकें. हमारे द्वारा आहूत होकर तुम अंधकार का नाश करो. हविरूप धन से युक्त हम यजमानों के पास अनेक प्रकार की संपत्ति हो. (१३) सूक्त—१२४ देवता—उषा उषा उच्छन्ती समिधाने अग्ना उद्यन्त्सूर्य उर्विया ज्योतिरश्रेत्. देवो नो अत्र सविता न्वर्थं प्रासावीद् द्विपत्प्र चतुष्पदित्यै.. (१) यह उषा प्रातःकाल अग्नि के प्रज्वलित होने पर अंधकार को हटाती है एवं उदित होते हुए सूर्य के समान प्रभूत प्रकाश फैलाती है. सविता देव हमारे गमन-आगमन व्यवहार के लिए मनुष्य और पशुरूप धन देते हैं. (१) अमिनती दैव्यानि व्रतानि प्रमिनती मनुष्या युगानि. ईयुषीणामुपमा शश्वतीनामायतीनां प्रथमोषा व्यद्यौत्.. (२) उषा देव संबंधी व्रतों में बाधा नहीं डालती तथा मनुष्यों का वियोग करती है. यह भूतकाल में होने वाली तथा सदा आने वाली उषाओं के तुल्य है. यह भविष्य में आने वाली उषाओं में प्रथमा बनकर विशेष प्रकाश दे रही है. (२) एषा दिवो दुहिता प्रत्यदर्शि ज्योतिर्वसाना समना पुरस्तात्. ऋतस्य पन्थामन्वेति साधु प्रजानतीव न दिशो मिनाति.. (३) यह उषा स्वर्ग की पुत्री है. इसलिए यह प्रकाश रूपी वस्त्र को धारण करती हुई पूर्व दिशा में भली-भांति चलती हुई सभी के सामने प्रकाशित होती है. उषा अपने प्रिय सूर्य का अभिप्राय जानती हुई भी उसके मार्ग पर आगे-आगे चलती है एवं पूर्वादि दिशाओं को कभी समाप्त नहीं करती. (३) उपो अदर्शि शुन्ध्युवो न वक्षो नोधा इवाविरकृत प्रियाणि. अद्मसन्न ससतो बोधयन्ती शश्वत्तमागात्पुनरेयुषीणाम्.. (४) जिस प्रकार सूर्य अपना रश्मिसमूह रूपी वक्षस्थल प्रकट करते हैं एवं नोधा ऋषि ने जिस प्रकार अपने प्रिय मंत्रसमूह को प्रकट किया था, उसी प्रकार उषा भी स्वयं को सबके समीप प्रकट करती है. उषा गृहिणी के समान सबसे पहले जागकर शेष लोगों को जगाती है एवं प्रातःकाल आने वाली वारवनिताओं में सर्वाधिक सुंदर है. (४) पूर्वे अर्धे रजसो अप्तसस्य गवां जनित्र्यकृत प्र केतुम्. व्यु प्रथते वितरं वरीय ओभा पृणन्ती पित्रोरुपस्था.. (५) ebook converter DEMO Watermarks*