भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 376, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 376

एक पदार्थों को छिपाते हैं और दूसरे अपने अत्यंत प्रकाशवान् रथ के द्वारा उन्हें प्रकाशित करते हैं. (७) सदृशीरद्य सदृशीरिदु श्वो दीर्घं सचन्ते वरुणस्य धाम. अनवद्यास्त्रिंशतं योजनान्येकैका क्रतुं परि यन्ति सद्यः.. (८) उषा आज जितनी सुंदर है, उसी के समान कल भी सुंदर होगी. सूर्य जहां रहता है, उषा प्रतिदिन उससे तीस योजन आगे रहती है. एक ही उषा सूर्य के उदयकाल में आने और जाने का—दोनों कार्य करती है. (८) जानत्यह्नः प्रथमस्य नाम शुक्ला कृष्णादजनिष्ट श्वितीची. ऋतस्य योषा न मिनाति धामाहरहर्निष्कृतमाचरन्ती.. (९) दीप्त एवं श्वेत वर्ण वाली तथा काले रंग के अंधकार से उत्पन्न होने वाली उषा दिन के पहले अंश को जानती है. उत्पन्न होने पर उषा सूर्य के तेज में मिल जाती है. उसके तेज का पराभव नहीं करती, अपितु प्रतिदिन उसकी शोभा बढ़ाती है. (९) कन्येव तन्वा३ शाशदानाँ एषि देवि देवमियक्षमाणम्. संस्मयमाना युवतिः पुरस्तादाविर्वक्षांसि कृणुषे विभाती.. (१०) हे उषादेवी! तुम कन्या के समान अपने अंगों को स्पष्ट करती हुई दानशील एवं प्रकाशयुक्त सूर्य रूपी प्रिय के समीप आओ. तुम युवती के समान अत्यंत प्रकाशयुक्त होती हुई तथा हंसती हुई सूर्य के सामने अपने गोपनीय अंगों को वस्त्ररहित करो. (१०) सुसङ्काशा मातृमृष्टेव योषाविस्तन्वं कृणुषे दृशे कम्. भद्रा त्वमुषो वितरं व्युच्छ न तत्ते अन्या उषसो नशन्त.. (११) जिस प्रकार माता द्वारा स्नान आदि से शुद्ध किए जाने पर कन्या का रूप दर्शनीय हो जाता है, उसी प्रकार तुम भी सबको दिखाने के लिए अपना शरीर प्रकाशित करो. हे कल्याण करने वाली उषा! अंधकार मिटाओ. अन्य उषाएं तुम्हारे कार्य व्याप्त नहीं करेंगी. (११) अश्वावतीर्गोमतीर्विश्ववारा यतमाना रश्मिभिः सूर्यस्य. परा च यन्ति पुनरा च यन्ति भद्रा नाम वहमाना उषासः.. (१२) उषा देवियां अश्वों एवं गायों से संपन्न एवं सभी कालों में रहने वाली हैं. वे सूर्य की किरणों के साथ नित्य ही अंधकार का नाश करने का प्रयत्न करती हैं. वे सबके अनुकूल होने के कारण कल्याणकर नाम धारण करके आती-जाती हैं. (१२) ऋतस्य रश्मिमनुयच्छमाना भद्रम्भद्रं ऋतुमस्मासु धेहि. उषो नो अद्य सुहवा व्युच्छास्मायु रायो मघवत्सु च स्युः.. (१३) ebook converter DEMO Watermarks*