ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
एक पदार्थों को छिपाते हैं और दूसरे अपने अत्यंत प्रकाशवान् रथ के द्वारा उन्हें प्रकाशित करते हैं. (७) सदृशीरद्य सदृशीरिदु श्वो दीर्घं सचन्ते वरुणस्य धाम. अनवद्यास्त्रिंशतं योजनान्येकैका क्रतुं परि यन्ति सद्यः.. (८) उषा आज जितनी सुंदर है, उसी के समान कल भी सुंदर होगी. सूर्य जहां रहता है, उषा प्रतिदिन उससे तीस योजन आगे रहती है. एक ही उषा सूर्य के उदयकाल में आने और जाने का—दोनों कार्य करती है. (८) जानत्यह्नः प्रथमस्य नाम शुक्ला कृष्णादजनिष्ट श्वितीची. ऋतस्य योषा न मिनाति धामाहरहर्निष्कृतमाचरन्ती.. (९) दीप्त एवं श्वेत वर्ण वाली तथा काले रंग के अंधकार से उत्पन्न होने वाली उषा दिन के पहले अंश को जानती है. उत्पन्न होने पर उषा सूर्य के तेज में मिल जाती है. उसके तेज का पराभव नहीं करती, अपितु प्रतिदिन उसकी शोभा बढ़ाती है. (९) कन्येव तन्वा३ शाशदानाँ एषि देवि देवमियक्षमाणम्. संस्मयमाना युवतिः पुरस्तादाविर्वक्षांसि कृणुषे विभाती.. (१०) हे उषादेवी! तुम कन्या के समान अपने अंगों को स्पष्ट करती हुई दानशील एवं प्रकाशयुक्त सूर्य रूपी प्रिय के समीप आओ. तुम युवती के समान अत्यंत प्रकाशयुक्त होती हुई तथा हंसती हुई सूर्य के सामने अपने गोपनीय अंगों को वस्त्ररहित करो. (१०) सुसङ्काशा मातृमृष्टेव योषाविस्तन्वं कृणुषे दृशे कम्. भद्रा त्वमुषो वितरं व्युच्छ न तत्ते अन्या उषसो नशन्त.. (११) जिस प्रकार माता द्वारा स्नान आदि से शुद्ध किए जाने पर कन्या का रूप दर्शनीय हो जाता है, उसी प्रकार तुम भी सबको दिखाने के लिए अपना शरीर प्रकाशित करो. हे कल्याण करने वाली उषा! अंधकार मिटाओ. अन्य उषाएं तुम्हारे कार्य व्याप्त नहीं करेंगी. (११) अश्वावतीर्गोमतीर्विश्ववारा यतमाना रश्मिभिः सूर्यस्य. परा च यन्ति पुनरा च यन्ति भद्रा नाम वहमाना उषासः.. (१२) उषा देवियां अश्वों एवं गायों से संपन्न एवं सभी कालों में रहने वाली हैं. वे सूर्य की किरणों के साथ नित्य ही अंधकार का नाश करने का प्रयत्न करती हैं. वे सबके अनुकूल होने के कारण कल्याणकर नाम धारण करके आती-जाती हैं. (१२) ऋतस्य रश्मिमनुयच्छमाना भद्रम्भद्रं ऋतुमस्मासु धेहि. उषो नो अद्य सुहवा व्युच्छास्मायु रायो मघवत्सु च स्युः.. (१३) ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त—१२४ देवता—उषा
हे उषा! तुम सूर्य की किरणों के अनुकूल चलती हुई हमें ऐसी बुद्धि दो, जिससे हम यज्ञ आदि कर्मों के द्वारा अपना कल्याण कर सकें. हमारे द्वारा आहूत होकर तुम अंधकार का नाश करो. हविरूप धन से युक्त हम यजमानों के पास अनेक प्रकार की संपत्ति हो. (१३) सूक्त—१२४ देवता—उषा उषा उच्छन्ती समिधाने अग्ना उद्यन्त्सूर्य उर्विया ज्योतिरश्रेत्. देवो नो अत्र सविता न्वर्थं प्रासावीद् द्विपत्प्र चतुष्पदित्यै.. (१) यह उषा प्रातःकाल अग्नि के प्रज्वलित होने पर अंधकार को हटाती है एवं उदित होते हुए सूर्य के समान प्रभूत प्रकाश फैलाती है. सविता देव हमारे गमन-आगमन व्यवहार के लिए मनुष्य और पशुरूप धन देते हैं. (१) अमिनती दैव्यानि व्रतानि प्रमिनती मनुष्या युगानि. ईयुषीणामुपमा शश्वतीनामायतीनां प्रथमोषा व्यद्यौत्.. (२) उषा देव संबंधी व्रतों में बाधा नहीं डालती तथा मनुष्यों का वियोग करती है. यह भूतकाल में होने वाली तथा सदा आने वाली उषाओं के तुल्य है. यह भविष्य में आने वाली उषाओं में प्रथमा बनकर विशेष प्रकाश दे रही है. (२) एषा दिवो दुहिता प्रत्यदर्शि ज्योतिर्वसाना समना पुरस्तात्. ऋतस्य पन्थामन्वेति साधु प्रजानतीव न दिशो मिनाति.. (३) यह उषा स्वर्ग की पुत्री है. इसलिए यह प्रकाश रूपी वस्त्र को धारण करती हुई पूर्व दिशा में भली-भांति चलती हुई सभी के सामने प्रकाशित होती है. उषा अपने प्रिय सूर्य का अभिप्राय जानती हुई भी उसके मार्ग पर आगे-आगे चलती है एवं पूर्वादि दिशाओं को कभी समाप्त नहीं करती. (३) उपो अदर्शि शुन्ध्युवो न वक्षो नोधा इवाविरकृत प्रियाणि. अद्मसन्न ससतो बोधयन्ती शश्वत्तमागात्पुनरेयुषीणाम्.. (४) जिस प्रकार सूर्य अपना रश्मिसमूह रूपी वक्षस्थल प्रकट करते हैं एवं नोधा ऋषि ने जिस प्रकार अपने प्रिय मंत्रसमूह को प्रकट किया था, उसी प्रकार उषा भी स्वयं को सबके समीप प्रकट करती है. उषा गृहिणी के समान सबसे पहले जागकर शेष लोगों को जगाती है एवं प्रातःकाल आने वाली वारवनिताओं में सर्वाधिक सुंदर है. (४) पूर्वे अर्धे रजसो अप्तसस्य गवां जनित्र्यकृत प्र केतुम्. व्यु प्रथते वितरं वरीय ओभा पृणन्ती पित्रोरुपस्था.. (५) ebook converter DEMO Watermarks*
उषा विस्तृत आकाश के पूर्व भाग में जन्म लेकर दिशाओं का ज्ञान कराती है. धरती और आकाश उसके पिता हैं. उषा इन दोनों के मध्य में स्थित होकर अपने तेज से अत्यंत विस्तीर्ण रूप से प्रसिद्ध हुई है. (५) एवेदेषा पुरुतमा दृशे कं नाजामिं न परि वृणक्ति जामिम्. अरेपसा तन्वा३ शाशदाना नार्भादीषते न महो विभाती.. (६) इस प्रकार विस्तार को प्राप्त हुई उषा अपने जाति वाले देवों और विजातीय मानवों सभी को प्राप्त होती है, जिससे वे सुखपूर्वक देख सकें. अपने निर्मल शरीर के कारण स्पष्ट होती हुई उषा छोटे बड़े किसी के पास से नहीं हटती. (६) अभ्रातेव पुसं एति प्रतीची गर्तारुगिव सनये धनानाम्. जायेव पत्य उशती सुवासा उषा हस्रेव नि रिणीते अप्सः.. (७) उषा बिना भाई की बहिन के समान पश्चिम की ओर मुख करके चलती है तथा पतिहीना नारी के समान प्रकाश रूप धन प्राप्त करने के लिए आकाश में चढ़ती है. उषा पति को प्रसन्न करने वाली पत्नी के समान सुंदर वस्त्र पहनकर हास्य द्वारा अपने दांतों का प्रदर्शन करती है. (७) स्वसा स्वस्रे ज्यायस्यै योनिमारैग्पैत्यस्याः प्रतिचक्ष्यैव. व्युच्छन्ती रश्मिभिः सूर्यस्याञ्ज्यङ्क्ते समनगा इव व्राः.. (८) निशा रूपी छोटी बहिन उषा रूपी बड़ी बहिन को अपना स्थान देकर चली जाती है. सूर्य की किरणों से अंधकार का नाश करती हुई यह उषा बिजलियों के समान संसार में प्रकाश करती है. (८) आसां पूर्वांसामहसु स्वसृणामपरा पूर्वामभ्येति पश्चात्. ताः प्रत्नवन्नव्यसीनूनमस्मे रेवदुच्छन्तु सुदिना उषासः.. (९) सभी उषाएं परस्पर बहिनें हैं एवं एकदूसरी के पीछे चलती हैं. आने वाली उषाएं प्राचीन उषाओं के समान सुदिन लावें एवं हमें बहुधनसंपन्न करें. (९) प्र बोधयोषः पृणतो मघोन्यबुध्यमानाः पणयः ससन्तु. रेवदुच्छ मघवद्भ्यो मघोनि रेवत्स्तोत्रे सूनृते जारयन्ती.. (१०) हे धनवती उषा! हवि देने वालों को जगाओ तथा लालची पणियों को सोने दो. तुम हवियुक्त यजमानों को समृद्ध बनाओ. तुम सुंदर नेत्री हो. तुम सब प्राणियों को क्षीण करती हो, पर अपने यजमान को उन्नत बनाओ. (१०) अवेयमश्वैद्युवतिः पुरस्ताद्युङ्क्ते गवामरुणानामनीकम्. ebook converter DEMO Watermarks*
वि नूनमुच्छादसति प्र केतुर्गृहंगृहमुप तिष्ठाते अग्निः.. (११) युवती के समान पूर्व दिशा से आती हुई उषा अपने रथ में लाल रंग के बैलों को जोड़ती है. यह रूपरहित आकाश में अंधकार को मिटाती है. उषा के आने पर ही सब घरों में आग जलती है. (११) उत्ते वयश्चिद्वसतेरपप्तन्नरश्च ये पितुभाजो व्युष्टौ. अमा सते वहसि भूरि वाममुषो देवि दाशुषे मर्त्याय.. (१२) हे उषा! तुम्हारे प्रकट होते ही पक्षी अपने घोंसलों से उड़ने लगते हैं और मनुष्य अन्न प्राप्ति की इच्छा से अपने-अपने कर्म में उन्मुख होते हैं. हे देवी उषा! जो हव्यदाता यजमान देवयजन मंडप में स्थित है, उसके लिए पर्याप्त धन दो. (१२) अस्तोढ्वं स्तोम्या ब्रह्मणा मे ऽवीवृध्वध्वमुशतीरुषासः. युष्माकं देवीरवसा सनेम सहस्रिणं च शतिनं च वाजम्.. (१३) हे स्तुति योग्य उषाओ! मेरे मंत्र तुम्हारी स्तुति करें. तुम हमारी उन्नति चाहती हुई हमारी वृद्धि करो. हे उषा देवियो! तुम यदि हमारी रक्षा करोगी तो हम हजारों और सैकड़ों धन प्राप्त करेंगे. (१३) सूक्त—१२५ देवता—दान प्राता रत्नं प्रातरित्वा दधाति तं चिकित्त्वान्प्रतिगृह्या नि धत्ते. तेन प्रजां वर्धयमान आयू रायस्पोषेण सचते सुवीरः.. (१) स्वनय नाम का राजा प्रातःकाल आकर मेरे समीप रत्न रखे. ज्ञानी कक्षीवान् अर्थात् मैंने उन्हें स्वीकार किया एवं उनके द्वारा पुत्र, सेवक एवं अपनी अवस्था में वृद्धि करके राजा को आशीर्वाद दिया है कि वह बार-बार धन प्राप्त करे. (१) सुगुरसत्सुहिरण्यः स्वश्वो बृहदस्मै वय इन्द्रो दधाति. यस्त्वायन्तं वसूनां प्रातरित्वो मुक्षीजयेव पदि मुत्सिनाति.. (२) यह स्वनय राजा बहुत सी गायों, स्वर्ण और घोड़ों का स्वामी है. इंद्र इन्हें अतुल संपत्ति दें. जिस प्रकार पशु-पक्षी आदि को रस्सी से बांध लिया जाता है, उसी प्रकार राजा ने प्रातःकाल ही पैदल आकर जाने वाले यात्री कक्षीवान् को जाने नहीं दिया. (२) आयमद्य सुकृतं प्रातरिच्छन्निष्टेः पुत्रं वसुमता रथेन. अंशोः सुतं पायय मत्सरस्य क्षयद्वीरं वर्धन्ध सूनृताभिः.. (३) मैं शोभनकर्मा एवं यज्ञरक्षक को देखने के लिए धनयुक्त रथ में बैठकर आज आया हूं. ebook converter DEMO Watermarks*
प्रकाशयुक्त एवं मादकता प्रदान करने वाले सोमरस को पिओ तथा सुंदर पुत्र, भृत्य आदि की कामना करो. (३) उप क्षरन्ति सिन्धवो मयोभुव ईजानं च यक्ष्यमाणं च धेनवः. पृणन्तं च पपुरिं च श्रवस्यवो घृतस्य धारा उप यन्ति विश्वतः.. (४) सुख देने वाली एवं दुधारू गाएं यज्ञकर्त्ता और यज्ञ का संकल्प करने वाले के पास जाकर उसे दूध देती हैं. पितरों को तर्पण करने वाले एवं प्राणियों को प्रसन्न करने वाले पुरुष के समीप समृद्धि देने वाली घृतधाराएं आकर संतोष देती हैं. (४) नाकस्य पृष्ठे अधि तिष्ठति श्रितो यः पृणाति स ह देवेषु गच्छति. तस्मा आपो घृतमर्षन्ति सिन्धवस्तस्मा इयं दक्षिणा पिन्वते सदा.. (५) हव्य देकर देवों को प्रसन्न करने वाला स्वर्ग में पहुंचकर देवों के बीच बैठता है. बहता हुआ जल उसे तेज एवं धरती फसलों द्वारा उसे संतोष देती है. (५) दक्षिणावतामिदमानि चित्रा दक्षिणावतां दिवि सूर्यांसः. दक्षिणावन्तो अमृतं भजन्ते दक्षिणावन्तः प्र तिरन्त आयुः.. (६) दान देने वाले व्यक्ति को धरती पर दृश्यमान वस्तुएं प्राप्त होती हैं एवं सूर्यादि लोक समृद्ध होते हैं. दाता जरामरण-रहित दीर्घ आयु प्राप्त करके अमर बनता है. (६) मा पृणन्तो दुरितमेन आरन्मा जारिषुः सूरयः सुव्रतासः. अन्यस्तेषां परिधिरस्तु कश्चिदपृणन्तमभि सं यन्तु शोकाः.. (७) हवि द्वारा देवों को प्रसन्न करने वाला दुःख और पापों से दूर रहता है एवं स्तोता विद्वान् वृद्धावस्था से दूर रहते हैं. इन दोनों से भिन्न अर्थात् दान एवं स्तुति न करने वालों को पाप और शोक प्राप्त होता है. (७) सूक्त—१२६ देवता—भावयव्य आदि अमन्दान्त्सोमान्प्र भरे मनीषा सिन्धावधि क्षियतो भाव्यस्य. यो मे सहस्रममिमीत सवानतूर्तो राजा श्रव इच्छमानः.. (१) मैं सिंधु तीर पर रहने वाले भावयव्य के पुत्र स्वनय के निमित्त स्तोत्रों की रचना करता हूं. उस अजेय राजा ने यश प्राप्ति की इच्छा से मेरे लिए एक हजार सोमयज्ञ किए थे. (१) शतं राज्ञो नाधमानस्य निष्काञ्छतमश्वान्प्रयतान्सद्य आदम्. शतं कक्षीवाँ असुरस्य गोनां दिवि श्रवोऽजरमा ततान.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
दानशील राजा ने मुझ कक्षीवान् से प्रार्थना की. मैंने उससे सौ स्वर्ण मुद्राएं, सौ घोड़े एवं सौ बैल स्वीकार किए. इस दान से राजा ने स्वर्गलोक में स्थायी यश प्राप्त कर लिया. (२) उप मा श्यावा: स्वनयेन दत्ता वधूमन्तो दश रथासो अस्थु:. षष्टि: सहस्रमनु गव्यमागात्सनत्कक्षीवाँ अभिपित्वे अह्नाम्.. (३) स्वनय ने मुझे सफेद घोड़ों वाले दस रथ दिए. उन में वधुएं बैठी थीं. रथों के पीछे एक हजार साठ गाएं चल रही थीं. मैंने यह सब स्वीकार करके अगले ही दिन अपने पिता को दे दिया. (३) चत्वारिंशद्दशरथस्य शोणा: सहस्रस्याग्रे श्रेणिं नयन्ति. मदच्युतः कृशनावतो अत्यान्कक्षीवन्त उद्मृक्षन्त पज्राः.. (४) पीछे हजार गाएं हैं. आगे दस रथों में लाल रंग के चालीस घोड़े पंक्तिबद्ध होकर चलते हैं. घास लिए हुए कक्षीवान् के अनुचर घोड़ों को मलने लगे. स्वर्णाभूषणों से युक्त वे मतवाले घोड़े शत्रु का गर्व नष्ट करते हैं. (४) पूर्वामनु प्रयतिमा ददे वस्त्रीन्युक्ताँ अष्टावरिधायसो गाः. सुबन्धवो ये विश्या इव व्रा अनस्वन्तः श्रव ऐषन्त पज्राः.. (५) हे भाइयो! मैंने पूर्वदान के अनुसार तुम्हारे लिए तीन और आठ रथ तथा बहुमूल्य गाएं स्वीकार की हैं. अंगिरा के सभी पुत्र प्रजाओं के समान परस्पर अनुराग युक्त होकर हव्य अन्न से भरी गाड़ियों सहित यश की इच्छा करें. (५) आगधिता परिगधिता या कशीकेव जङ्गहे. ददाति मह्यं यादुरी याशूनां भोज्या शता.. (६) भावयव्य ने अपनी पत्नी लोमशा को लक्ष्य करके कहा—“जिस प्रकार नकुली अपने पति से चिपटी रहती है उसी प्रकार यह संभोग-योग्य युवती आलिंगन करने के पश्चात् चिरकाल रमण करती है. यह रेतोयुक्त रमणी मुझे सैकड़ों भोग प्रदान करती है.” (६) उपोप मे परा मृश मा मे दभ्राणि मन्यथाः. सर्वाहमस्मि रोमशा गन्धारीणामिवाविका.. (७) लोमशा पति से कहती है—“समीप आकर मेरा स्पर्श करो. मेरे अंगों को अल्प मत समझो. मैं गंधार देश की भेड़ के समान संपूर्ण अवयव वाली एवं रोमयुक्त हूं.” (७) सूक्त—१२७ देवता—अग्नि अग्निं होतारं मन्ये दास्वन्तं वसुं सूनुं सहसो जातवेदसं विप्रं न जातवेदसम्. ebook converter DEMO Watermarks*
य ऊर्ध्वया स्वध्वरो देवो देवाच्या कृपा. घृतस्य विभ्राष्टिमनु वष्टि शोचिषाजुह्वानस्य सर्पिषः.. (१) मैं अग्नि को देवों का आह्वानकर्त्ता, अतिशय दानशील, निवास योग्य, बल का पुत्र एवं मेधावी ब्राह्मण के समान सर्वज्ञ मानता हूं. अग्नि यज्ञ संपादन में समर्थ एवं देवपूजा की इच्छा से युक्त हैं. वे अपनी ज्वालाओं से घृत का अनुसरण करके उसकी कामना करते हैं. (१) यजिष्ठं त्वा यजमाना हुवेम ज्येष्ठमङ्गिरसां विप्र मन्मभिर्विप्रेभिः शुक्र मन्मभिः. परिज्मानमिव द्यां होतारं चर्षणीनाम्. शोचिष्केशं वृषणं यमिमा विशः प्रावन्तु जूतये विशः.. (२) हे मेधावी एवं दीप्त ज्वालायुक्त अग्नि! हम यजमान मनुष्यों पर कृपा करने के हेतु मनन-साधन एवं प्रसन्नतादायक मंत्रों द्वारा अंगिराओं में श्रेष्ठ एवं यजन योग्य तुम्हें बुलाते हैं. तुम सब ओर चलने वाले सूर्य के समान देवों को बुलाते हो. तुम्हारी लपटें केशों के समान विस्तृत हैं. यजमान लोग वांछित फल पाने के लिए तुम्हें प्रसन्न करें. तुम वर्षाकारक हो. (२) स हि पुरू चिदोजसा विरुक्मता दीद्यानो भवति द्रुहन्तरः परशुर्न द्रुहन्तरः. वीळु चिद्यस्य समृतौ श्रुवद्वनेव यत्स्थिरम्. निष्षहमाणो यमते नायते धन्वासहा नायते.. (३) चमकती हुई ज्वालाओं से युक्त अग्नि परशु के समान शत्रुओं का नाश करने में अद्वितीय हैं. अग्नि से मिलकर जिस प्रकार जल नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार दृढ़ वस्तुएं भी समाप्त हो जाती हैं. अग्नि शत्रुनाशक धनुर्धर के समान कभी पीठ नहीं दिखाते. (३) दृळ्हा चिदस्मा अनु दुर्यथा विदे तेजिष्ठाभिररणिभिर्दाष्ट्यवसे ऽग्नये दाष्ट्यवसे. प्र यः पुरूणि गाहते तक्षद्वनेव शोचिषा. स्थिरा चिदन्ना निरिणात्योजसा नि स्थिराणि चिदोजसा.. (४) जैसे विद्वान् को द्रव्य दान किया जाता है, उसी तरह प्रत्येक मंत्र के बाद अग्नि को सारवान हव्य दिया जाता है. अग्नि यज्ञादि साधन द्वारा हमारी रक्षा के लिए स्वर्ग प्रदान करते हैं. अग्नि यजमान द्वारा दिए गए हव्य में प्रविष्ट होकर उसे जंगल की तरह जला देते हैं. ये अपने तेज द्वारा जौ आदि अन्नों को पकाते तथा अपने ओज से दृढ़ शत्रुओं का नाश करते हैं. (४) तमस्य पृक्षमुपरासु धीमहि नक्तं यः सुदर्शतरो दिवातरादप्रायुषे दिवातरात्. आदस्यायुर्गर्भणवद्वीळु शर्म न सूनवे. भक्तमभक्तमवो व्यन्तो अजरा अग्नयो व्यन्तो अजराः.. (५) हम रात में अधिक प्रकाशित होने वाले और दिन में तेजशून्य रहने वाले अग्नि को वेदों ebook converter DEMO Watermarks*
के समीप हव्य देते हैं. पिता के समीप उत्तम एवं सुखदायक घर प्राप्त करने वाले पुत्र के समान अग्नि अन्न ग्रहण करते हैं. वे भक्त और अभक्त को जानते हुए भी दोनों की रक्षा करते हैं एवं हव्य का भक्षण करके सदा युवा बने रहते हैं. (५) स हि शर्धो न मारुतं तुविष्वणिरप्रस्वतीषूर्वरास्विष्टनिरार्तनास्विष्टनिः. आदद्धव्यान्याददिर्यज्ञस्य केतुरर्हणा. अध स्मास्य हर्षतो हृषीवतो विश्वे जुषन्त पन्थां नरः शुभे न पन्थाम्.. (६) जिस प्रकार वायु का वेग शब्द करता है, उसी प्रकार स्तुति योग्य अग्नि भी जलते समय शब्द करता है. अग्नि का यज्ञ उपजाऊ धरती पर करना चाहिए. हव्य एवं दानशील अग्नि यज्ञ के झंडे के समान सर्वत्र पूजनीय हैं. जिस प्रकार लोग सुख पाने के लिए राजपथ पर चलते हैं, उसी प्रकार यजमानों को प्रसन्नता देने वाले अग्नि की सेवा की जाती है. (६) द्विता यदीं कीस्तासो अभिद्यवो नमस्यन्त उपवोचन्त भृगवो मथन्तो दाशा भृगवः. अग्नीरीशे वसूनां शुचिर्यो धर्णिरेषाम्. प्रियाँ अपिर्धीर्वनिषीष्ट मेधिर आ वनिषीष्ट मेधिरः.. (७) भृगुगोत्र में उत्पन्न महर्षि हव्य दान करने के उद्देश्य से अरणि में अग्नि का मंथन करते हुए स्तुति बोलते हैं. वे महर्षि श्रौत एवं स्मार्त दोनों प्रकार की अग्नियों का गुण वर्णन करने वाले, तेजस्वी एवं नमनशील हैं. प्रदीप्त अग्नि धनों के स्वामी यज्ञकर्त्ता एवं प्रियहव्य का भली-भांति उपभोग करने वाले हैं. मेधावी अग्नि दूसरे देवों को भी यज्ञ का भाग प्रदान करते हैं. (७) विश्वासां त्वा विशां पतिं हवामहे सर्वासां समानं दम्पतिं भुजे सत्यगिर्वाहसं भुजे. अतिथिं मानुषाणां पितुर्न यस्यासया. अमी च विश्वे अमृतास आ वयो हव्या देवेष्वा वयः.. (८) हम अतिथि के समान पूज्य अग्नि को हव्य भोग करने के लिए बुलाते हैं. वे समस्त प्रजाओं के रक्षक, समान रूप से मानवों के गृहपालक एवं स्तुतिवाहक हैं. जैसे पुत्र अन्नादि पाने के लिए पिता के समीप आता है, उसी प्रकार समस्त देव हव्य प्राप्ति के लिए अग्नि के समीप पहुंचते हैं. इसीलिए ऋत्विज् अन्य देवताओं को हवि देने की इच्छा से अग्नि में ही हवन करते हैं. (८) त्वमग्ने सहसा सहन्तमः शुष्मिन्तमो जायसे देवतातये रयिर्न देवतातये. शुष्मिन्तमो हि ते मदो द्युम्निन्तम उत क्रतुः. अध स्मा ते परि चरन्त्यजर श्रुष्टीवानो नाजर.. (९) हे अग्नि! तुम भी धन के समान देवों के यज्ञ के निमित्त ही उत्पन्न होते हो. तुम अपने बल से शत्रुनाश करते हो एवं तेजस्वी हो. हव्य स्वीकार से उत्पन्न तुम्हारा हर्ष अत्यंत बलवान् ebook converter DEMO Watermarks*
एवं तुम्हारा यज्ञ परम यशस्वी होता है. हे जरारहित एवं भक्तों की जरा का निवारण करने वाले अग्नि! यजमान दूतों के समान तुम्हारी सेवा करते हैं. (९) प्र वो महे सहसा सहस्वत उषर्बुधे पशुषे नाग्नये स्तोमो बभूत्वग्नये. प्रति यदीं हविष्मान्विश्वासु क्षासु जोगुवे. अग्रे रेभो न जरत ऋषूणां जूर्णिर्होत ऋषूणाम्.. (१०) हे स्तुतिकर्त्ताओं! यजमान अग्नि को लक्ष्य करके वेदी की भूमि पर इधर-उधर गमन करते हैं. तुम्हारी स्तुति पूजनीय, शक्ति द्वारा शत्रुओं को हराने वाली, प्रातःकाल जागरणशील एवं पशुदाता अग्नि को प्रसन्न करने वाली हो. बंदीजन जिस प्रकार धनियों की प्रशंसा करते हैं, उसी प्रकार स्तुतिकुशल होता देवों में श्रेष्ठ अग्नि की स्तुति सबसे पहले करता है. (१०) स नो नेदिष्ठं ददृशान आ भराग्ने देवेभिः सचनाः सुचेतुना महो रायः सुचेतुना. महि शविष्ठ नस्कृधि सञ्चक्षे भुजे अस्यै. महि स्तोतृभ्यो मघवन्त्सुवीर्यं मथीरुग्रो न शवसा.. (११) हे अग्नि! तुम हमें अपने समीप दिखाई देते हुए भी देवों के साथ हव्य का भोग करते हो. तुम भक्तों के प्रति अनुग्रह भरे शोभन चित्त से पूजनीय धन लाते हो. हे बलसंपन्न अग्नि! पृथ्वी का दर्शन एवं भोग करने के लिए हमें अधिक अन्न दो. हे धनस्वामी अग्नि! स्तोताओं को पुत्रभृत्ययुक्त धन प्रदान करो. तुम परम बली एवं क्रूर व्यक्ति के समान हमारे शत्रुओं को नष्ट करो. (११) सूक्त—१२८ देवता—अग्नि अयं जायत मनुषो धरीमणि होता यजिष्ठ उशिजामनु व्रतमग्निः स्वमनु व्रतम्. विश्वश्रुष्टिः सखीयते रयिरिव श्रवस्यते. अदब्धो होता नि षददिळस्पदे परिवीत इळस्पदे.. (१) देवों का आह्वान करने वाले एवं यजन योग्य अग्नि फल की कामना करने वालों एवं हवि का भोजन करने के निमित्त मनुष्य द्वारा अरणि से उत्पन्न होते हैं. समस्त सुखों के कर्त्ता अग्नि मित्रता चाहने वाले एवं प्रसिद्ध अन्न की इच्छा करने वाले यजमान के लिए धन के समान हैं. यज्ञवेदी धरती के उत्तम स्थान में है. वहां शक्तिसंपन्न एवं यज्ञकर्त्ता अग्नि ऋत्विजों से घिरे बैठे हैं. (१) तं यज्ञसाधमपि वातयामस्यूतस्य पथा नमसा हविष्मता देवताता हविष्मता. स न ऊर्जामुपाभृत्यया कृपा न जूर्यति. यं मातरिश्वा मनवे परावतो देवं भाः परावतः.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
हमारा स्तोत्र यज्ञ और घृत से युक्त तथा नम्रतासंपन्न है. हम इस स्तोत्र द्वारा अग्नि की तब तक सेवा करते हैं, जब तक वे संतुष्ट न हो जावें. अग्नि हव्यसंपन्न देवयज्ञ को पूर्ण करने में सहायता करते हैं. हमारे हव्य को स्वीकार करने से अग्नि का नाश नहीं होगा. जिस प्रकार मातरिश्वा मनु के निमित्त अग्नि को दूर से लाए और उसे जलाया, उसी प्रकार अग्नि दूर देश से हमारे यज्ञ में आवें. (२) एवेन सद्यः पर्येति पार्थिवं मुहुर्गी रेतो वृषभः कनिक्रदद्दध्रेतः कनिक्रदत्. शतं यक्षाणो अक्षभिर्देवो वनेषु तुर्वणिः. सदो दधान उपरेषु सानुष्वग्निः परेषु सानुषु.. (३) अग्नि की सदा स्तुति की जाती है. वे अन्नयुक्त, कामवर्षी, सामर्थ्यशाली एवं शब्द करने वाले हैं. वे हमारे आह्वान के तुरंत बाद ही वेदी के चारों ओर चलने लगते हैं. वे ग्रहण करने योग्य स्तोत्रों के कारण अपनी ज्वालाओं द्वारा यजमान के कार्य को सौगुना प्रकाशित करते हैं. उच्चस्थान प्राप्त अग्नि यज्ञ को सदा घेरे रहते हैं. (३) स सुक्रतुः पुरोहितो दमेदमेऽग्निर्यज्ञस्याध्वरस्य चेतति क्रत्वा यज्ञस्य चेतति. क्रत्वा वेधा इष्यते विश्वा जातानि पस्पशे. यतो घृतश्रीरतिथिर्जायत वह्निर्वेधा अजायत.. (४) शोभनकर्मा एवं यज्ञनिष्पादक अग्नि प्रत्येक यजमान के घर में नाशरहित यज्ञ को जानते हैं एवं विविध कर्मों के फलदाता बनकर यजमान को अन्न देने की इच्छा करते हैं. अग्नि घृतसेवी अतिथि के रूप में उत्पन्न होने के कारण संपूर्ण हव्य को स्वीकार करते हैं. अग्नि के प्रज्वलित होने पर यजमान को बहुत से फल मिलते हैं. (४) क्रत्वा यदस्य तविषीषु पृञ्चतेऽग्नेर्वेण मरुतां न भोज्येषिराय न भोज्या. स हि ष्मा दानमिन्वति वसूनां च मज्मना. स नस्त्रासते दुरितादभिहुतः शंसादघादभिहुतः... (५) वायु द्वारा मेघों से वर्षा किए जाने पर जिस प्रकार सभी अन्न समान रूप से पकते हैं अथवा याचक को जिस प्रकार सभी भक्षणीय द्रव्य दिए जाते हैं, उसी प्रकार यजमान अग्नि को तृप्त करने के लिए उसकी ज्वालाओं में पुरोडाश आदि द्रव्य मिलाते हैं. यजमान अपने धन के अनुसार हव्य देता है. अग्नि हमें दुःखद एवं हिंसक पाप से बचावें. (५) विश्वो विहाया अरतिर्व्युर्दधे हस्ते दक्षिणे तरणिर्न शिश्रथच्छ्रवस्यया न शिश्रथत्. विश्वस्मा इदिष्यते देवत्रा हव्यमोहिषे. विश्वस्मा इत्सुकृते वारमृण्वत्यग्निर्द्वारा वृण्वति.. (६) सर्वगंतव्य, महान् एवं नित्य गतिशील अग्नि देने की इच्छा से सूर्य के समान दक्षिण हाथ में धन रखते हैं. वह हाथ यज्ञ करने वाले के लिए सदा ढीला रहता है. अग्नि हवि पाने की ebook converter DEMO Watermarks*
आशा से यजमान को नहीं त्यागते. हे अग्नि! तुम हवि के इच्छुक सभी देवों के लिए हवि वहन करते हो. अग्नि उत्तम कर्म करने वाले मनुष्यों के लिए उत्तम धन देते हैं एवं स्वर्ग का द्वार खोलते हैं. (६) स मानुषे वृजने शन्तमो हितोऽग्निर्यज्ञेषु जेन्यो न विशपतिः प्रियो यज्ञेषु विशपतिः. स हव्या मानुषाणामिळा कृतानि पत्यते. स नस्त्रासते वरुणस्य धूर्तेर्महो देवस्य धूर्तेः.. (७) मनुष्य पापों के निवारण के लिए जो यज्ञ करता है, उस में अग्नि सहायक हैं. ये विजयी राजा के समान यज्ञस्थल में मनुष्य के पालक एवं प्रिय हैं. यजमान यज्ञवेदी पर जो हवि एकत्रित करता है, अग्नि उसी को स्वीकार करने के लिए आते हैं. अग्नि यज्ञ में बाधा पहुंचाने वाले और हमारी हिंसा करने वाले व्यक्तियों के भय से तथा महान् पापों से हमारी रक्षा करें. (७) अग्निं होतारमीळते वसुधितिं प्रियं चेतिष्ठमरतिं न्येरिरे हव्यवाहं न्येरिरे. विश्वायुं विश्ववेदसं होतारं यजतं कविम्. देवासो रण्वमवसे वसूयवो गीर्भी रण्वं वसूयवः.. (८) ऋत्विज् यज्ञसंपन्नकर्त्ता, धन धारण करने वाले, सर्वप्रिय, बुद्धिदाता एवं नित्य प्रज्वलित अग्नि की स्तुति करते हैं एवं भली-भांति सुख प्राप्त करते हैं. अग्नि हव्यवाही, समस्त प्राणियों के जीवन, परम बुद्धि संपन्न, देवों को बुलाने वाले, यजनीय एवं सर्वज्ञ हैं. यजमान धन की इच्छा से अग्नि को हव्य देना चाहते हैं एवं आश्रय पाने वाले की इच्छा से शब्द करने वाले एवं रमणीय अग्नि को प्राप्त करते हैं. (८) सूक्त—१२९ देवता—इंद्र यं त्वं रथमिन्द्र मेधसातयेऽपाका सन्तमिषिर प्रणयसि प्रानवद्य नयसि. सद्यश्चित्तमभिष्टये करो वशश्च वाजिनम्. सास्माकमनवद्य तूतुजान वेधसामिमां वाचं न वेधसाम्.. (१) हे यज्ञगामी एवं अनिंदित इंद्र! यज्ञ लाभ के लिए तुम अधिक ज्ञानसंपन्न यजमान के पास जाते हो और धन, विद्या आदि से उसे उन्नत बनाते हो. उसे तुरंत सफल-मनोरथ एवं अन्नयुक्त कर दो. हे इंद्र! तुम समस्त पुरोहितों में उत्तम हो. जिस शीघ्रता से तुम हमारी स्तुति स्वीकार करते हो, उसी शीघ्रता से हमारे द्वारा दिया हुआ हवि भी ग्रहण करो. (१) स श्रुधि यः स्मा पृतनासु कासु चिद्धक्षाय्य इन्द्र भरहूतये नृभिरसि प्रतूर्तये नृभिः. यः शूरैः स्व१ः सनिता यो विप्रैर्वाजं तरुता. तमीशानास इरधन्त वाजिनं पृक्षमत्यं न वाजिनम्.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
हे इंद्र! तुम मनुष्यों एवं मरुतों के साथ प्रसिद्ध युद्धों में शत्रु का संहार करने में प्रसिद्ध हो एवं शूरों के साथ संग्राम सुख का अनुभव करने वाले हो. स्तुति करने वाले ऋत्विजों को तुम अन्न देते हो. जिस प्रकार मनुष्य घोड़े की सेवा करता है, उसी प्रकार ऋत्विज् गतिशील एवं अन्नदाता इंद्र की सेवा करते हैं. तुम हमारा आह्वान सुनो. (२) दस्मो हि ष्मा वृषणं पिन्वसि त्वचं कं चिद्यावीररुरूं शूर मर्त्यं परिवृणक्षि मर्त्यम्. इन्द्रोत तुभ्यं तद्दिवे तद्रुद्राय स्वयशसे. मित्राय वोचं वरुणाय सप्रथः सुमृळीकाय सप्रथः.. (३) हे इंद्र! तुम शत्रुसंहारक हो. इसीलिए तुम जलधारी मेघ का त्वचा के समान भेदन करके जल गिराते हो एवं चलते हुए मेघ को मनुष्य के समान पकड़कर बरसने के लिए विवश कर देते हो. हे इंद्र! तुम्हारे इस कार्य को हम तुमसे, आकाश से, यशसंपन्न रुद्रों से, प्रजाओं को सुख देने वाले मित्र एवं वरुण से कहेंगे. (३) अस्माकं व इन्द्रमुश्मसीष्टये सखायं विश्वायुं प्रासहं युजं वाजेषु प्रासहं युजम्.. अस्माकं ब्रह्मोतयेऽवा पृत्सुषु कासु चित्. नहि त्वा शत्रुः स्तरते स्तृणोषि यं विश्वं शत्रुं स्तृणोषि यम्.. (४) हे ऋत्विजो! हम अपने यज्ञ में अपने मित्र, समस्त यज्ञों में पहुंचने वाले, शत्रुनाशक, अपने सहायक, यज्ञ में विघ्न डालने वालों को पराजित करने वाले एवं मरुद्गणों के साथ रहने वाले इंद्र को चाहते हैं. हे इंद्र! हमारी रक्षा के लिए हमारे यज्ञ का पालन करो. युद्धक्षेत्र में तुम सभी शत्रुओं का संहार करते हो. कोई भी शत्रु तुम्हारा सामना नहीं करता. (४) नि षू नमातिमतिं कयस्य चित्तेजिष्ठाभिररणिभिर्नोतिभिरुग्राभिरुग्रोतिभिः. नेषि णो यथा पुरानेनाः शूर मन्यसे. विश्वानि पूरोरप पर्षि वह्निरासा वह्निर्नो अच्छ.. (५) हे बलसंपन्न इंद्र! जो तुम्हारे भक्त यजमान के विरुद्ध आचरण करते हैं, उन्हें तुम रक्षण संबंधी अपने तेज से अवनत कर देते हो. तुम प्राचीन काल में हमारे पूर्वजों को जिन यज्ञमार्गों से ले गए थे, उन्हीं से हमें भी ले जाओ. तुम्हें सब लोग पापहीन एवं जगत्पालक मानते हैं. तुम यज्ञस्थल में हमें यज्ञफल दो एवं अनिष्टों को समाप्त करो. (५) प्र तद्वोचेयं भव्यायेन्दवे हव्यो न य इषवान्मन्म रेजति रक्षोहा मन्म रेजति. स्वयं सो अस्मदा निदो वधैरजेत दुर्मतिम्. अव स्रवेदघशंसोऽवतरमव क्षुद्रमिव स्रवेत्.. (६) हम वर्धनशील इंद्र के लिए स्तुति करते हैं. जिस प्रकार आह्वान के योग्य एवं राक्षसहंता इंद्र हमारे बुलाने पर आते हैं, उसी प्रकार इंद्र अभिलाषापूर्वक हमारे यज्ञकर्म के प्रति आगमन करते हैं एवं हमारे बुद्धिहीन निंदकों को वध के उपायों द्वारा दूर कर देते हैं. जिस प्रकार जल ebook converter DEMO Watermarks*
नीचे की ओर बहता है, उसी प्रकार चोर का भी अधःपतन होता है. (६) वनेम तद्धोत्रया चितन्त्या वनेम रयिं रयिवः सुवीर्यं रण्वं सन्तं सुवीर्यम्. दुर्मन्मानं सुमन्तुभिरेमिषा पृचीमहि. आ सत्याभिरिन्द्र द्युम्नहूतिभिर्यजत्रं द्युम्नहूतिभिः.. (७) हे इंद्र! स्तोत्रों द्वारा तुम्हारे गुणों का वर्णन करते हुए हम तुम्हारे समीप आते हैं. हे धन के स्वामी! हम शोभन सामर्थ्ययुक्त, रमणीय, सदा वर्तमान एवं पुत्रभृत्यादि से युक्त धन को प्राप्त करें. हे अमित महिमाशली इंद्र! हमारे पास उत्तम स्तोत्र एवं अन्न हों. हम यज्ञ की अभिलाषा के समान फल देने वाली तथा यशोवर्द्धक स्तुतियों द्वारा यज्ञनिष्पादक इंद्र को प्राप्त करें. (७) प्रप्रा वो अस्मे स्वयशोभिरूती परिवर्ग इन्द्रो दुर्मतीनां दरीमन्दुर्मतीनाम्. स्वयं सा रिषयध्यै या न उपेषे अत्रैः. हतेमसन्न वक्षति क्षिप्ता जूर्णिर्न वक्षति.. (८) हे ऋत्विजो! इंद्र अपने यशस्कर रक्षण द्वारा तुम्हारे और हमारे निमित्त दुर्बुद्धि विरोधियों के विनाशकारी संग्राम में समर्थ हों एवं उन्हें विदीर्ण करें. हमारे भक्षक शत्रुओं ने जो वेगवती सेना भेजी थी, वह स्वयं ही नाश को प्राप्त हो गई. वह न तो हमारे पास आई और न लौटकर हमारे विरोधियों के पास पहुंची. (८) त्वं न इन्द्र राया परीणसा याहि पथाँ अनेहसा पुरो याह्यरक्षसा. सचस्व नः पराक आ सचस्वास्तमीक आ. पाहि नो दूरादारादभिष्टिभिः सदा पाह्यभिष्टिभिः.. (९) हे इंद्र! तुम राक्षसहीन एवं पापरहित मार्ग द्वारा हमें देने के लिए धन लेकर हमारे समीप आओ. तुम दूरवर्ती एवं निकटवर्ती स्थान से आकर हमसे मिलो, दूर एवं समीप से यज्ञ निर्वाह के लिए हमारी रक्षा करो तथा हमें पालो. (९) त्वं न इन्द्र राया तरूषसोग्रं चित्त्वा महिमा सक्षदवसे महे मित्रं नावसे. ओजिष्ठ त्रातरविता रथं कं चिदमर्त्य. अन्यमस्मद्रिरिषेः कं चिदद्रिवो रिरिक्षन्तं चिदद्रिवः.. (१०) हे इंद्र! हमारी आपत्तियों को समाप्त करने वाले धन से हमारा उद्धार करो. जिस प्रकार सर्वहितकारी मित्र की महिमा है, उसी प्रकार उग्र बल संपन्न इंद्र हमारी रक्षा के लिए महिमायुक्त हैं. हे शक्तिशाली, रक्षक, पालक, मरणरहित एवं शत्रुनाशक इंद्र! तुम चाहे जिस रथ पर सवार होकर आओ एवं हमारे अतिरिक्त सबको बाधा पहुंचाओ. हे शत्रुनाशक! निंदितकर्म वाले शत्रु के बाधक बनो. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*
पाहि न इन्द्र सुष्टुत स्रिधोऽवयाता सदमिद्दुर्मतीनां देवः सन्दुर्मतीनाम्. हन्ता पापस्य रक्षसस्त्राता विप्रस्य मावतः. अधा हि त्वा जनिता जीजनद्वसो रक्षोहणं त्वा जीजनद्वसो.. (११) हे शोभन स्तुतियों से युक्त इंद्र! हमें दुःखद पापों से बचाओ, क्योंकि तुम दुष्ट राक्षसों की सदा अवनति करने वाले हो. तुम हमारी स्तुतियों से प्रसन्न होकर दुर्बुद्धि यज्ञबाधकों को पराजित करो. तुम फल प्रतिबंधक पाप के घातक तथा हमारे समान मेधावी यजमानों के रक्षक हो. हे निवास हेतु इंद्र! तुम्हें सबके जन्मदाता ने इसीलिए उत्पन्न किया है. हे निवासदाता! तुम राक्षसों के विनाश के लिए उत्पन्न हुए हो. (११) सूक्त—१३० देवता—इंद्र एन्द्र याह्युप नः परावतो नायमच्छा विदथानीव सत्पतिरस्तं राजेव सत्पतिः. हवामहे त्वा वयं प्रयस्वन्तः सुतेसचा. पुत्रासो न पितरं वाजसातये मंहिष्ठं वाजसातये.. (१) हे इंद्र! यज्ञशाला में ऋत्विजों के पालक यजमान के समान, अस्ताचल को जाने वाले नक्षत्रेश चंद्र के समान एवं सम्मुख उपस्थित सोम के समान स्वर्ग से हमारे समीप आओ. जिस प्रकार पुत्र अन्न भक्षण के लिए पिता को बुलाते हैं, उसी प्रकार हम भी सोमरस निचोड़ जाने पर तुम्हें बुलाते हैं. हम ऋत्विजों के साथ महान् इंद्र को हव्य स्वीकार करने के लिए बुलाते हैं. (१) पिबा सोममिन्द्र सुवानमद्रिभिः कोशेन सिक्तमवतं न वंसगस्तातृषाणो न वंसगः. मदाय हर्यताय ते तुविष्माय धायसे. आ त्वा यच्छन्तु हरितो न सूर्यमहा विश्वेव सूर्यम्.. (२) हे शोभन गति संपन्न इंद्र! जिस प्रकार प्यासा बैल जल पीता है, उसी प्रकार तुम तृप्ति, पराक्रम, महत्त्व एवं आनंद के लिए पत्थर द्वारा पीसकर निचोड़े गए एवं जल द्वारा शोधित सोमरस को पिओ. हरि नाम के घोड़े जिस प्रकार सूर्य को बुलाते हैं, उसी प्रकार तुम्हारे घोड़े तुम्हें सोमरस पीने के लिए लावें. (२) अविन्दद्दिवो निहितं गुहा निधिं वेर्न गर्भं परिवीतमश्मन्यनन्ते अन्तरश्मनि. व्रजं वज्री गवामिव सिषासन्नङ्गिरस्तमः. अपावृणोदिष इन्द्रः परीवृता द्वार इषः परीवृताः.. (३) जिस प्रकार कबूतरी दुर्गम स्थान में अपने बच्चों को रखकर उस अपरिचित स्थान को खोज लेती है, वैसे ही इंद्र ने अत्यंत गुप्त स्थान में रखा हुआ तथा पत्थरों के ढेर से घिरा हुआ सोम स्वर्ग में प्राप्त किया. पणियों ने गायों को गोशाला में बंद कर दिया था. अंगिराओं में श्रेष्ठ ebook converter DEMO Watermarks*
इंद्र ने जिस प्रकार उस गोशाला को खोज लिया, उसी प्रकार सोमरस को भी ढूंढा. अन्न के कारण जल को मेघ ने रोक लिया था. इंद्र ने मेघ का भेदन करके जल बरसाया और धरती पर अन्न का विस्तार किया. (३) दादृहाणो वज्रमिन्द्रो गभस्त्योः क्षत्रेव तिग्ममसनाय सं श्यदहिहत्याय सं श्यत्. संविव्यान ओजसा शवोभिरिन्द्र मज्मना. तष्टेव वृक्षं वनिनो नि वृश्चसि परश्वेव नि वृश्चसि.. (४) इंद्र अपने हाथों में वज्र को दृढ़ता से धारण किए हैं. वज्र तेज है. जैसे मंत्रों की सहायता से जल को प्रभावशाली बनाया जाता है, उसी प्रकार शत्रु पर चलाने के लिए वज्र को और भी तेज किया जाता है. हे इंद्र! जैसे बढ़ई कुल्हाड़ी से वन के वृक्षों को काटता है, उसी प्रकार तुम अपने तेज, शरीर, बल एवं शक्ति से बुद्धि प्राप्त करके हमारे शत्रुओं को छिन्न करते हो. (४) त्वं वृथा नद्य इन्द्र सर्तवेऽच्छा समुद्रमसृजो रथाँ इव वाजयतो रथाँ इव. इत ऊतीरयुञ्जत समानमर्थमक्षितम्. धेनूरिव मनवे विश्वदोहसो जनाय विश्वदोहसः.. (५) हे इंद्र! जिस प्रकार तुमने हमारे यज्ञ में आने के लिए रथ को बनाया है अथवा योद्धा संग्राम में जाने को रथ बनाता है. उसी प्रकार तुमने समुद्र तक पहुंचने के साधन के रूप में नदियों का निर्माण किया है. जिस प्रकार मनु के लिए अथवा किसी समर्थ पुरुष के लिए गाएं सर्वार्थ देने वाली हैं, उसी प्रकार हमारी ओर बहने वाली नदियां एक ही उद्देश्य से जल का संग्रह करती हैं. (५) इमां ते वाचं वसूयन्त आयवो रथं न धीरः स्वपा अतक्षिषुः सुम्नाय त्वामतक्षिषुः. शुम्भन्तो जेन्यं यथा वाजेषु विप्र वाजिनम्. अत्यमिव शवसे सातये धना विश्वा धनानि सातये.. (६) हे इंद्र! जिस प्रकार शोभन कर्म वाले धीर मनुष्य रथ का निर्माण करते हैं, उसी प्रकार हम यजमानों ने धन प्राप्ति की इच्छा से तुम्हारी स्तुति बनाई है एवं अपनी सुख प्राप्ति के लिए तुम्हें प्रसन्न कर लिया है. जिस प्रकार योद्धा विजयी की प्रशंसा करते हैं, उसी प्रकार हे मेधासंपन्न इंद्र! तुम्हारी प्रशंसा की जा रही है. जैसे युद्ध के समय जयशील अश्व प्रशंसित होता है, उसी प्रकार बल, धन की रक्षा एवं समस्त कल्याण पाने के लिए तुम्हारी प्रशंसा हो रही है. (६) भिनत्पुरो नवतिमिन्द्र पूरवे दिवोदासाय महि दाशुषे नृतो वज्रेण दाशुषे नृतो. अतिथिग्वाय शम्बरं गिरेरुग्रो अवाभरत्. महो धनानि दयमान ओजसा विश्वा धनान्योजसा.. (७) हे रण में तीव्रता से इधर-उधर घूमने वाले इंद्र! तुमने यज्ञ में हविदान करने वाले एवं ebook converter DEMO Watermarks*
तुम्हारी इच्छा पूर्ण करने वाले राजा दिवोदास के निमित्त उसके शत्रुओं के नब्बे नगरों का ध्वंस किया था. हे विराट् बल संपन्न इंद्र! तुमने अतिथिसेवक दिवोदास राजा के कल्याण के लिए शंबर असुर को पर्वत से नीचे गिरा दिया था एवं अपनी शक्ति से अपरिमित धन दिया था. वह धन थोड़ा नहीं, संपूर्ण था. (७) इन्द्रः समत्सु यजमानमार्यं प्रावद्विश्वेषु शतमूतिराजिषु स्वर्मीळ्हेष्वाजिषु. मनवे शासदव्रतान्त्वचं कृष्णामरन्धयत्. दक्षन्न विश्वं ततृषाणमोषति न्यर्शसानमोषति.. (८) हे इंद्र! युद्ध में आर्य यजमान की रक्षा करते हैं. अपने भक्तों की अनेक प्रकार से रक्षा करने वाले इंद्र उसे समस्त युद्धों में बचाते हैं एवं सुखकारी संग्रामों में उसकी रक्षा करते हैं. इंद्र ने अपने भक्तों के कल्याण के निमित्त यज्ञद्वेषियों की हिंसा की थी. इंद्र ने कृष्ण नामक असुर की काली खाल उतारकर उसे अंशुमती नदी के किनारे मारा और भस्म कर दिया. इंद्र ने सभी हिंसक मनुष्यों को नष्ट कर डाला. (८) सूरश्चक्रं प्र वृहज्जात ओजसा प्रपित्वे वाचमरुणो मुषायतीशान आ मुषायति. उशना यत्परावतोऽजगन्नूतये कवे. सुम्नानि विश्वा मनुष्येव तुर्वणिरहा विश्वेव तुर्वणिः.. (९) ये इंद्र सूर्य के रथ का पहिया हाथ में उठाकर अत्यंत बलसंपन्न हो उठे और उसे विरोधियों पर फेंका. इंद्र परम तेजस्वी अरुण रूप बनाकर शत्रुओं के समीप पहुंचे और उनके प्राणों का हरण कर लिया. इंद्र ने अंधकार निवारण के लिए चक्र चलाया था. हे क्रांतदर्शी इंद्र! जिस प्रकार तुम उशना की रक्षा के लिए दूर स्वर्ग से आए थे, उसी प्रकार हमारे समस्त सुखों का साधन रूप धन लेकर शीघ्र ही हमारे समीप आओ. तुम जिस तरह दूसरे यजमानों के लिए समस्त धन लेकर आते हो, उसी प्रकार हमारे लिए भी लाओ. (९) स नो नव्येभिर्वृषकर्मन्नुक्थैः पुरां दर्तः पायुभिः पाहि शग्मैः. दिवोदासेभिरिन्द्र स्तवानो वावृधीथा अहोभिरिव द्यौः.. (१०) हे वर्षाकारक एवं असुर नगर विध्वंसक इंद्र! तुम हमारे नए स्तोत्रों से प्रसन्न होकर सभी प्रकार से रक्षा करते हुए हमें सुख दो. दिवोदास के गोत्र में उत्पन्न हम तुम्हारी स्तुति करते हैं. जिस प्रकार दिन में सूर्य बढ़ता है, उसी तरह हमारी स्तुति से तुम उन्नति प्राप्त करो. (१०) सूक्त—१३१ देवता—इंद्र इन्द्राय हि द्यौरसुरो अनम्नतेन्द्राय मही पृथिवी वरीमभिर्द्युम्नसाता वरीमभिः. इन्द्रं विश्वे सजोषसो देवासो दधिरे पुरः. इन्द्राय विश्वा सवनानि मानुषा रातानि सन्तु मानुषा.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
विस्तृत आकाश इंद्र के सामने झुक गया है एवं महती पृथ्वी वरणीय स्तोत्रों द्वारा नत हुई है. उत्तम हवि लिए हुए यजमान भी अन्न एवं यश पाने के लिए इंद्र के सामने नत हैं. समस्त देवों ने प्रसन्न मन से तुम्हें अपने आगे रखा है. इंद्र के सुख के लिए ही लोग सारे यज्ञ और दान करते हैं. (१) विश्वेषु हि त्वा सवनेषु तुञ्जते समानमेकं वृषमण्यवः पृथक् स्वः सनिष्यवः पृथक्. तं त्वा नावं न पर्षणिं शूषस्य धुरि धीमहि. इन्द्रं न यज्ञैश्शितयन्त आयवः स्तोमेभिरिन्द्रमायवः.. (२) हे इंद्र! यजमान मनचाही वर्षा की इच्छा से प्रत्येक यज्ञ में एकमात्र तुम्हें ही हवि आदि प्रदान करते हैं. तुम सबके लिए एकरूप हो एवं स्वर्ण पाने के लिए तुम्हें ही हव्य दिया जाता है. जिस प्रकार नदी पार जाने के लिए समर्थ नाव का सहारा लिया जाता है, उसी प्रकार हम विजय की अभिलाषा से तुम्हें अपनी सेना के आगे रखते हैं. यजमान यज्ञों एवं स्तुतियों द्वारा ईश्वर के समान इंद्र की ही चिंता करते हैं. (२) वि त्वा ततस्रे मिथुना अवस्यवो व्रजस्य साता गव्यस्य निःसृजः सक्षन्त इन्द्र निःसृजः. यदगव्यन्ता द्वा जना स्वर्यन्ता समूहसि. आविष्करिक्रद्वृषणं सचाभुवं वज्रमिन्द्र सचाभुवम्.. (३) हे इंद्र! तुम्हारे भक्त और पापरहित यजमान पत्नियों को साथ में लेकर तुम्हें तृप्त करने की इच्छा से अधिक मात्रा में हव्य देते हुए यज्ञ करते हैं. गायों के चाहने वाले एवं स्वर्ग जाने के इच्छुक वे बहुत सी गायों को पाने के लिए तुम्हारे उद्देश्य से यज्ञ करते हैं. तुमने अपने साथ उत्पन्न हुए इच्छापूरक एवं साथ रहने वाले वज्र को बनाया है. (३) विदुष्टे अस्य वीर्यस्य पूरवः पुरो यदिन्द्र शारदीरवातिरः सासहानो अवातिरः. शासस्तमिन्द्र मर्त्यमयज्युं शवसस्पते. महीममुष्णाः पृथिवीमिमा अपो मन्दसान इमा अपः.. (४) हे इंद्र! जो यजमान तुम्हारी महिमा जानते हैं, वे तुम्हारे ही उद्देश्य से यज्ञ करते हैं. तुमने वर्ष भर खाई से सुरक्षित शत्रु नगरों को नष्ट करके उन्हें पीड़ित किया था. हे सेना के पालक इंद्र! तुमने यज्ञविनाशक मरणधर्मा को वश में किया था एवं उसके अधीन रहने वाली विशाल धरती एवं महान् सागर को बलपूर्वक छीन लिया था. तुमने उसके अन्न ले लिए थे. (४) आदित्ते अस्य वीर्यस्य चर्किरन्मदेषु वृषन्नुशिजो यदाविथ सखीयतो यदाविथ. चकर्थ कारमेभ्यः पृतनासु प्रवन्तवे. ते अन्यामन्यां नद्यं सनिष्णत श्रवस्यन्तः सनिष्णत.. (५) हे इंद्र! तुम सोमपान से प्रसन्न होकर यजमानों की रक्षा करते हो एवं इच्छा पूर्ण करते हो. इसी हेतु तुम्हारी शक्ति बढ़ाने के लिए वे तुम्हें बार-बार सोमरस प्रदान करते हैं. तुम
यजमानों के सुख के निमित्त युद्ध में सिंहनाद करते हो. यजमान भांति-भांति की भोग्य वस्तुएं एवं विजय के द्वारा अन्न प्राप्त करने की इच्छा से तुम्हारे समीप जाते हैं. (५) उतो नो अस्या उषसो जुषेत ह्यार्कस्य बोधि हविषो हवीमभिः स्वर्षाता हवीमभिः. यदिन्द्र हन्तवे मृधो वृषा वज्रिञ्जिकेतसि. आ मे अस्य वेधसो नवीयसो मन्म श्रुधि नवीयसः.. (६) क्या इंद्र हमारे प्रातःकालीन यज्ञों में सम्मिलित होंगे? हे इंद्र! हवि देने के लिए स्वर्ग प्रदाता यज्ञों में हमारे द्वारा बुलाए जाने पर आओ और हवि स्वीकार करो. हे वज्रधारी! हिंसक शत्रुओं के नाश के लिए हमारे इच्छापूरक बनकर आओ एवं मुझ मेधावी, नवीन एवं असाधारण स्तुति वाले के उत्तम स्तोत्र सुनो. (६) त्वं तमिन्द्र वावृधानो अस्मयुरमित्रयन्तं तुविजात मर्त्यं वज्रेण शूर मर्त्यम्. जहि यो नो अघायति शृणुष्व सुश्रवस्तमः. रिष्टं न यामन्नप भूतु दुर्मतिर्विश्वाप भूतु दुर्मतिः.. (७) हे इंद्र! तुम शूर, अनेक गुण युक्त एवं हमारी स्तुति के कारण उन्नत हो. तुम हमें चाहते हो. जो लोग हमारे प्रति शत्रुता रखते एवं हमें दुःख देते हैं, अपने वज्र द्वारा तुम उनका विनाश करो. हे सुंदर कानों वाले! हमारी बात सुनो. जिस प्रकार मार्ग में थके हुए पथिक को चोर बाधा पहुंचाते हैं, उसी प्रकार के दुष्टबुद्धि हिंसक तुम्हारी कृपा से हमारे समीप न रहें. (७) सूक्त—१३२ देवता—इंद्र त्वया वयं मघवन्पूर्व्ये धन इन्द्रत्वोताः सासह्वाम पृतन्यतो वनुयाम वनुष्यतः. नेदिष्ठे अस्मिन्नहन्यधि वोचा नु सुन्वते. अस्मिन्यज्ञे वि चयेमा भरे कृतं वाजायन्तो भरे कृतम्.. (१) हे सुखस्वामी इंद्र! यदि तुम हमारी रक्षा करोगे तो हम प्रबल सेना वाले शत्रुओं को भी हरा देंगे. जो शत्रु हमें मारने के लिए तत्पर होंगे, उन पर हम प्रहार करेंगे. पूर्वोक्त धनों से युक्त इस निकटवर्ती यह में हवि देने वाले यजमान से बार-बार कहो, युद्धों में विजय पाने वाले तुम्हारे उद्देश्य से हम हवि रूप अन्न लाते हैं. (१) स्वर्जषे भर आप्रस्य वक्मन्युषर्बुधः स्वस्मिन्नञ्जसि क्राणस्य स्वस्मिन्नञ्जसि. अहन्त्रिन्द्रो यथा विदे शीर्ष्णाशीर्ष्णोपवाच्यः. अस्मत्रा ते सध्रयक् सन्तु रातयो भद्रा भद्रस्य रातयः.. (२) जो वीर पुरुष युद्ध में मारे जाते हैं, उन्हें इंद्र स्वर्ग देते हैं. युद्ध स्वर्ग प्राप्ति का निष्कपट मार्ग है. इंद्र ऐसे युद्ध के आगे रहते हैं एवं जो यज्ञकर्त्ता प्रातःकाल जागते हैं, उनके शत्रुओं का ebook converter DEMO Watermarks*
विनाश करते हैं. जैसे सर्वज्ञ व्यक्तियों को सिर झुका कर प्रणाम करते हैं, उसी प्रकार इंद्र को भी करना चाहिए. हे भद्र इंद्र! तुम्हारा दिया हुआ धन हमारे लिए हो एवं स्थिर हो. (२) तत्तु प्रयः प्रत्नथा ते शुशुक्वनं यस्मिन्यज्ञे वारमकृण्वत क्षयमृतस्य वारसि क्षयम्. वि तद्द्रोचेरध द्वितान्तः पश्यन्ति रश्मिभिः. स घा विदे अन्विन्द्रो गवेषणो बन्धुक्षिद्भयो गवेषणः.. (३) हे इंद्र! जिस प्रकार पूर्वकाल में दिया हुआ तेजस्वी एवं प्रसिद्ध अन्न तुम्हारा था, इसी प्रकार इस समय भी है. तुम मनोरथ पूर्ण करने वाले यज्ञ में रहते हो. तुम धरती और आकाश के मध्य जो जलवृष्टि करते हो, वह सूर्य की किरणों के प्रकाश में देखी जा सकती है. जल की खोज में लगे इंद्र अपने बंधुओं को यज्ञ फल देते एवं जल प्राप्ति का ढंग जानते हैं. (३) नू इत्था ते पूर्वथा च प्रवाच्यं यदङ्गिरोभ्योऽवृणोरप व्रजमिन्द्र शिक्षन्नप व्रजम्. ऐभ्यः समान्या दिशास्मभ्यं जेषि योत्सि च. सुन्वद्भ्यो रन्धया कं चिदव्रतं हृणायन्तं चिदव्रतम्.. (४) हे इंद्र! तुम्हारे उक्त प्रकार के कार्य पहले के समान इस समय भी प्रशंसनीय हैं. तुमने अंगिरा ऋषियों के निमित्त जल बरसाया था एवं असुरों द्वारा चुराई हुई गाएं छुड़ाकर उन्हें दी थीं. इन ऋषियों के समान ही तुम हमारे धन के निमित्त युद्ध करो और विजयी बनो. सोमरस निचोड़ने वाले हम लोगों के कल्याण के निमित्त तुम यज्ञविरोधी शत्रुओं को हराते हो. क्रोध दिखाने वाले यज्ञविरोधी तुम्हारे सामने हार जाते हैं. (४) सं यज्जनान् क्रतुभिः शूर ईक्षयद्धने हिते तरुषन्त श्रवस्यवः प्र यक्षन्त श्रवस्यवः. तस्मा आयुः प्रजावद्दिद्धाधे अर्चन्त्योजसा. इन्द्र ओक्यं दिधिषन्त धीतयो देवाँ अच्छा न धीत्यः.. (५) बलशाली इंद्र यज्ञ के द्वारा सब मनुष्यों के विषय में सत्य बात जानते हैं. इसीलिए अन्न की अभिलाषा करने वाले यजमान पर्याप्त यज्ञ करते हैं. इंद्र के निमित्त दिया हुआ हव्य यजमान को पुत्र, सेवक आदि देता है, जिनकी सहायता से वह शत्रुओं को बाधा पहुंचाता है एवं इंद्र की पूजा करता है. यज्ञकर्म करने वाले यजमान इंद्रलोक प्राप्त करते हैं. इस प्रकार वे देवों के मध्य ही निवास करते हैं. (५) युवं तमिन्द्रापर्वता पुरोयुधा यो नः पृतन्यादप तन्तमिद्धतं वज्रेण तन्तमिद्धतम्. दूरे चत्ताय च्छन्त्सद्गहनं यदिनक्षत्. अस्माकं शत्रून्परि शूर विश्वतो दर्मा दर्षीष्ट विश्वतः.. (६) हे इंद्र एवं मेघ! हमारे जो विरोधी शत्रु सेना एकत्र करते हैं, तुम दोनों हमारे आगे चलकर वज्रप्रहार द्वारा उनका ध्वंस करो. तुम्हारा वज्र दूरवर्ती शत्रु को भी नष्ट करना चाहता है और दुर्गम स्थानों में भी पहुंच जाता है. हे शूर! हमारे शत्रुओं को विविध उपायों से विदीर्ण करो. ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त—१३३ देवता—इंद्र
तुम्हारा वज्र शत्रुओं को समस्त उपायों से नष्ट करता है. (६) सूक्त—१३३ देवता—इंद्र उभे पुनामि रोदसी ऋतेन द्रुहो दहामि सं महीरनिन्द्राः. अभिव्लग्य यत्र हता अमित्रा वैलस्थानं परि तृळ्हा अशेरन्.. (१) हे इंद्र! मैं यज्ञ द्वारा धरती और आकाश दोनों को पवित्र करता हूं एवं इंद्रद्रोहियों को आश्रय देने वाली धरती को भली-भांति जानता हूं. एकत्र हुए शत्रु हमें जहां भी मिले, वहीं मारे गए. मरे हुए वे श्मशानभूमि में इधर-उधर पड़े हैं. (१) अभिव्लग्या चिदद्रिवः शीर्षा यातुमतीनाम्. छिन्धि वट्रिणा पदा महावटूरिणा पदा.. (२) हे वैरीभक्षणकर्त्ता इंद्र! शत्रुओं की सेना का सिर अपने विस्तृत पैरों से कुचल दो. (२) अवासां मघवञ्जहि शर्धो यातुमतीनाम्. वैलस्थानके अर्मके महावैलस्थे अर्मके.. (३) हे धनस्वामी इंद्र! इन आयुधसंपन्न सेनाओं की शक्ति नष्ट करके इन्हें निंदनीय श्मशान में फेंक दो. (३) यासां तिस्रः पञ्चाशतोऽभिव्लङ्गैरपावपः. तत्सु ते मनायति तकत्सु ते मनायति.. (४) हे इंद्र! तुमने एक सौ पचास शत्रु सेनाओं का विनाश किया. लोग इस काम को बड़ा कहते हैं, पर तुम्हारे लिए यह छोटा है. (४) पिशङ्गभृष्टिमम्भृणं पिशाचिमिन्द्र सं मृण. सर्वं रक्षो नि बर्हय.. (५) हे इंद्र! पीले रंग वाले, भयंकर शब्द करने वाले पिशाचों का नाश करो एवं संपूर्ण राक्षसों को समाप्त करो. (५) अवर्मह इन्द्र दादृहि श्रुधी नः शुशोच हि द्यौः क्षा न भीषाँ अद्रिवो घृणान्न भीषाँ अद्रिवः. शुष्मिन्तमो हि शुष्मिभिर्धैरुग्रेभरीयसे. अपूरुषघ्नो अप्रतीत शूर सत्वभिस्त्रिसप्तैः शूर सत्वभिः.. (६) हे इंद्र! तुम हमारी स्तुति सुनो और महान् मेघ को अधोमुख करके उसका विदारण करो. हे मेघस्वामी इंद्र! जिस प्रकार वृष्टि के अभाव में अन्न न होने से धरती दुःखी होती है, उसी प्रकार आकाश भी शोक करता है. जैसे त्वष्टा के भय से धरती और आकाश दुःखी थे, उसी प्रकार अन्न के अभाव से होते हैं. हे इंद्र! तुम अधिक बलवान् होने के कारण शत्रु विनाश ebook converter DEMO Watermarks*