भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 391, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 391

तुम्हारी इच्छा पूर्ण करने वाले राजा दिवोदास के निमित्त उसके शत्रुओं के नब्बे नगरों का ध्वंस किया था. हे विराट् बल संपन्न इंद्र! तुमने अतिथिसेवक दिवोदास राजा के कल्याण के लिए शंबर असुर को पर्वत से नीचे गिरा दिया था एवं अपनी शक्ति से अपरिमित धन दिया था. वह धन थोड़ा नहीं, संपूर्ण था. (७) इन्द्रः समत्सु यजमानमार्यं प्रावद्विश्वेषु शतमूतिराजिषु स्वर्मीळ्हेष्वाजिषु. मनवे शासदव्रतान्त्वचं कृष्णामरन्धयत्. दक्षन्न विश्वं ततृषाणमोषति न्यर्शसानमोषति.. (८) हे इंद्र! युद्ध में आर्य यजमान की रक्षा करते हैं. अपने भक्तों की अनेक प्रकार से रक्षा करने वाले इंद्र उसे समस्त युद्धों में बचाते हैं एवं सुखकारी संग्रामों में उसकी रक्षा करते हैं. इंद्र ने अपने भक्तों के कल्याण के निमित्त यज्ञद्वेषियों की हिंसा की थी. इंद्र ने कृष्ण नामक असुर की काली खाल उतारकर उसे अंशुमती नदी के किनारे मारा और भस्म कर दिया. इंद्र ने सभी हिंसक मनुष्यों को नष्ट कर डाला. (८) सूरश्चक्रं प्र वृहज्जात ओजसा प्रपित्वे वाचमरुणो मुषायतीशान आ मुषायति. उशना यत्परावतोऽजगन्नूतये कवे. सुम्नानि विश्वा मनुष्येव तुर्वणिरहा विश्वेव तुर्वणिः.. (९) ये इंद्र सूर्य के रथ का पहिया हाथ में उठाकर अत्यंत बलसंपन्न हो उठे और उसे विरोधियों पर फेंका. इंद्र परम तेजस्वी अरुण रूप बनाकर शत्रुओं के समीप पहुंचे और उनके प्राणों का हरण कर लिया. इंद्र ने अंधकार निवारण के लिए चक्र चलाया था. हे क्रांतदर्शी इंद्र! जिस प्रकार तुम उशना की रक्षा के लिए दूर स्वर्ग से आए थे, उसी प्रकार हमारे समस्त सुखों का साधन रूप धन लेकर शीघ्र ही हमारे समीप आओ. तुम जिस तरह दूसरे यजमानों के लिए समस्त धन लेकर आते हो, उसी प्रकार हमारे लिए भी लाओ. (९) स नो नव्येभिर्वृषकर्मन्नुक्थैः पुरां दर्तः पायुभिः पाहि शग्मैः. दिवोदासेभिरिन्द्र स्तवानो वावृधीथा अहोभिरिव द्यौः.. (१०) हे वर्षाकारक एवं असुर नगर विध्वंसक इंद्र! तुम हमारे नए स्तोत्रों से प्रसन्न होकर सभी प्रकार से रक्षा करते हुए हमें सुख दो. दिवोदास के गोत्र में उत्पन्न हम तुम्हारी स्तुति करते हैं. जिस प्रकार दिन में सूर्य बढ़ता है, उसी तरह हमारी स्तुति से तुम उन्नति प्राप्त करो. (१०) सूक्त—१३१ देवता—इंद्र इन्द्राय हि द्यौरसुरो अनम्नतेन्द्राय मही पृथिवी वरीमभिर्द्युम्नसाता वरीमभिः. इन्द्रं विश्वे सजोषसो देवासो दधिरे पुरः. इन्द्राय विश्वा सवनानि मानुषा रातानि सन्तु मानुषा.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*