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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

तुम्हारी इच्छा पूर्ण करने वाले राजा दिवोदास के निमित्त उसके शत्रुओं के नब्बे नगरों का ध्वंस किया था. हे विराट् बल संपन्न इंद्र! तुमने अतिथिसेवक दिवोदास राजा के कल्याण के लिए शंबर असुर को पर्वत से नीचे गिरा दिया था एवं अपनी शक्ति से अपरिमित धन दिया था. वह धन थोड़ा नहीं, संपूर्ण था. (७) इन्द्रः समत्सु यजमानमार्यं प्रावद्विश्वेषु शतमूतिराजिषु स्वर्मीळ्हेष्वाजिषु. मनवे शासदव्रतान्त्वचं कृष्णामरन्धयत्. दक्षन्न विश्वं ततृषाणमोषति न्यर्शसानमोषति.. (८) हे इंद्र! युद्ध में आर्य यजमान की रक्षा करते हैं. अपने भक्तों की अनेक प्रकार से रक्षा करने वाले इंद्र उसे समस्त युद्धों में बचाते हैं एवं सुखकारी संग्रामों में उसकी रक्षा करते हैं. इंद्र ने अपने भक्तों के कल्याण के निमित्त यज्ञद्वेषियों की हिंसा की थी. इंद्र ने कृष्ण नामक असुर की काली खाल उतारकर उसे अंशुमती नदी के किनारे मारा और भस्म कर दिया. इंद्र ने सभी हिंसक मनुष्यों को नष्ट कर डाला. (८) सूरश्चक्रं प्र वृहज्जात ओजसा प्रपित्वे वाचमरुणो मुषायतीशान आ मुषायति. उशना यत्परावतोऽजगन्नूतये कवे. सुम्नानि विश्वा मनुष्येव तुर्वणिरहा विश्वेव तुर्वणिः.. (९) ये इंद्र सूर्य के रथ का पहिया हाथ में उठाकर अत्यंत बलसंपन्न हो उठे और उसे विरोधियों पर फेंका. इंद्र परम तेजस्वी अरुण रूप बनाकर शत्रुओं के समीप पहुंचे और उनके प्राणों का हरण कर लिया. इंद्र ने अंधकार निवारण के लिए चक्र चलाया था. हे क्रांतदर्शी इंद्र! जिस प्रकार तुम उशना की रक्षा के लिए दूर स्वर्ग से आए थे, उसी प्रकार हमारे समस्त सुखों का साधन रूप धन लेकर शीघ्र ही हमारे समीप आओ. तुम जिस तरह दूसरे यजमानों के लिए समस्त धन लेकर आते हो, उसी प्रकार हमारे लिए भी लाओ. (९) स नो नव्येभिर्वृषकर्मन्नुक्थैः पुरां दर्तः पायुभिः पाहि शग्मैः. दिवोदासेभिरिन्द्र स्तवानो वावृधीथा अहोभिरिव द्यौः.. (१०) हे वर्षाकारक एवं असुर नगर विध्वंसक इंद्र! तुम हमारे नए स्तोत्रों से प्रसन्न होकर सभी प्रकार से रक्षा करते हुए हमें सुख दो. दिवोदास के गोत्र में उत्पन्न हम तुम्हारी स्तुति करते हैं. जिस प्रकार दिन में सूर्य बढ़ता है, उसी तरह हमारी स्तुति से तुम उन्नति प्राप्त करो. (१०) सूक्त—१३१ देवता—इंद्र इन्द्राय हि द्यौरसुरो अनम्नतेन्द्राय मही पृथिवी वरीमभिर्द्युम्नसाता वरीमभिः. इन्द्रं विश्वे सजोषसो देवासो दधिरे पुरः. इन्द्राय विश्वा सवनानि मानुषा रातानि सन्तु मानुषा.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

विस्तृत आकाश इंद्र के सामने झुक गया है एवं महती पृथ्वी वरणीय स्तोत्रों द्वारा नत हुई है. उत्तम हवि लिए हुए यजमान भी अन्न एवं यश पाने के लिए इंद्र के सामने नत हैं. समस्त देवों ने प्रसन्न मन से तुम्हें अपने आगे रखा है. इंद्र के सुख के लिए ही लोग सारे यज्ञ और दान करते हैं. (१) विश्वेषु हि त्वा सवनेषु तुञ्जते समानमेकं वृषमण्यवः पृथक् स्वः सनिष्यवः पृथक्. तं त्वा नावं न पर्षणिं शूषस्य धुरि धीमहि. इन्द्रं न यज्ञैश्शितयन्त आयवः स्तोमेभिरिन्द्रमायवः.. (२) हे इंद्र! यजमान मनचाही वर्षा की इच्छा से प्रत्येक यज्ञ में एकमात्र तुम्हें ही हवि आदि प्रदान करते हैं. तुम सबके लिए एकरूप हो एवं स्वर्ण पाने के लिए तुम्हें ही हव्य दिया जाता है. जिस प्रकार नदी पार जाने के लिए समर्थ नाव का सहारा लिया जाता है, उसी प्रकार हम विजय की अभिलाषा से तुम्हें अपनी सेना के आगे रखते हैं. यजमान यज्ञों एवं स्तुतियों द्वारा ईश्वर के समान इंद्र की ही चिंता करते हैं. (२) वि त्वा ततस्रे मिथुना अवस्यवो व्रजस्य साता गव्यस्य निःसृजः सक्षन्त इन्द्र निःसृजः. यदगव्यन्ता द्वा जना स्वर्यन्ता समूहसि. आविष्करिक्रद्वृषणं सचाभुवं वज्रमिन्द्र सचाभुवम्.. (३) हे इंद्र! तुम्हारे भक्त और पापरहित यजमान पत्नियों को साथ में लेकर तुम्हें तृप्त करने की इच्छा से अधिक मात्रा में हव्य देते हुए यज्ञ करते हैं. गायों के चाहने वाले एवं स्वर्ग जाने के इच्छुक वे बहुत सी गायों को पाने के लिए तुम्हारे उद्देश्य से यज्ञ करते हैं. तुमने अपने साथ उत्पन्न हुए इच्छापूरक एवं साथ रहने वाले वज्र को बनाया है. (३) विदुष्टे अस्य वीर्यस्य पूरवः पुरो यदिन्द्र शारदीरवातिरः सासहानो अवातिरः. शासस्तमिन्द्र मर्त्यमयज्युं शवसस्पते. महीममुष्णाः पृथिवीमिमा अपो मन्दसान इमा अपः.. (४) हे इंद्र! जो यजमान तुम्हारी महिमा जानते हैं, वे तुम्हारे ही उद्देश्य से यज्ञ करते हैं. तुमने वर्ष भर खाई से सुरक्षित शत्रु नगरों को नष्ट करके उन्हें पीड़ित किया था. हे सेना के पालक इंद्र! तुमने यज्ञविनाशक मरणधर्मा को वश में किया था एवं उसके अधीन रहने वाली विशाल धरती एवं महान् सागर को बलपूर्वक छीन लिया था. तुमने उसके अन्न ले लिए थे. (४) आदित्ते अस्य वीर्यस्य चर्किरन्मदेषु वृषन्नुशिजो यदाविथ सखीयतो यदाविथ. चकर्थ कारमेभ्यः पृतनासु प्रवन्तवे. ते अन्यामन्यां नद्यं सनिष्णत श्रवस्यन्तः सनिष्णत.. (५) हे इंद्र! तुम सोमपान से प्रसन्न होकर यजमानों की रक्षा करते हो एवं इच्छा पूर्ण करते हो. इसी हेतु तुम्हारी शक्ति बढ़ाने के लिए वे तुम्हें बार-बार सोमरस प्रदान करते हैं. तुम

यजमानों के सुख के निमित्त युद्ध में सिंहनाद करते हो. यजमान भांति-भांति की भोग्य वस्तुएं एवं विजय के द्वारा अन्न प्राप्त करने की इच्छा से तुम्हारे समीप जाते हैं. (५) उतो नो अस्या उषसो जुषेत ह्यार्कस्य बोधि हविषो हवीमभिः स्वर्षाता हवीमभिः. यदिन्द्र हन्तवे मृधो वृषा वज्रिञ्जिकेतसि. आ मे अस्य वेधसो नवीयसो मन्म श्रुधि नवीयसः.. (६) क्या इंद्र हमारे प्रातःकालीन यज्ञों में सम्मिलित होंगे? हे इंद्र! हवि देने के लिए स्वर्ग प्रदाता यज्ञों में हमारे द्वारा बुलाए जाने पर आओ और हवि स्वीकार करो. हे वज्रधारी! हिंसक शत्रुओं के नाश के लिए हमारे इच्छापूरक बनकर आओ एवं मुझ मेधावी, नवीन एवं असाधारण स्तुति वाले के उत्तम स्तोत्र सुनो. (६) त्वं तमिन्द्र वावृधानो अस्मयुरमित्रयन्तं तुविजात मर्त्यं वज्रेण शूर मर्त्यम्. जहि यो नो अघायति शृणुष्व सुश्रवस्तमः. रिष्टं न यामन्नप भूतु दुर्मतिर्विश्वाप भूतु दुर्मतिः.. (७) हे इंद्र! तुम शूर, अनेक गुण युक्त एवं हमारी स्तुति के कारण उन्नत हो. तुम हमें चाहते हो. जो लोग हमारे प्रति शत्रुता रखते एवं हमें दुःख देते हैं, अपने वज्र द्वारा तुम उनका विनाश करो. हे सुंदर कानों वाले! हमारी बात सुनो. जिस प्रकार मार्ग में थके हुए पथिक को चोर बाधा पहुंचाते हैं, उसी प्रकार के दुष्टबुद्धि हिंसक तुम्हारी कृपा से हमारे समीप न रहें. (७) सूक्त—१३२        देवता—इंद्र त्वया वयं मघवन्पूर्व्ये धन इन्द्रत्वोताः सासह्वाम पृतन्यतो वनुयाम वनुष्यतः. नेदिष्ठे अस्मिन्नहन्यधि वोचा नु सुन्वते. अस्मिन्यज्ञे वि चयेमा भरे कृतं वाजायन्तो भरे कृतम्.. (१) हे सुखस्वामी इंद्र! यदि तुम हमारी रक्षा करोगे तो हम प्रबल सेना वाले शत्रुओं को भी हरा देंगे. जो शत्रु हमें मारने के लिए तत्पर होंगे, उन पर हम प्रहार करेंगे. पूर्वोक्त धनों से युक्त इस निकटवर्ती यह में हवि देने वाले यजमान से बार-बार कहो, युद्धों में विजय पाने वाले तुम्हारे उद्देश्य से हम हवि रूप अन्न लाते हैं. (१) स्वर्जषे भर आप्रस्य वक्मन्युषर्बुधः स्वस्मिन्नञ्जसि क्राणस्य स्वस्मिन्नञ्जसि. अहन्त्रिन्द्रो यथा विदे शीर्ष्णाशीर्ष्णोपवाच्यः. अस्मत्रा ते सध्रयक् सन्तु रातयो भद्रा भद्रस्य रातयः.. (२) जो वीर पुरुष युद्ध में मारे जाते हैं, उन्हें इंद्र स्वर्ग देते हैं. युद्ध स्वर्ग प्राप्ति का निष्कपट मार्ग है. इंद्र ऐसे युद्ध के आगे रहते हैं एवं जो यज्ञकर्त्ता प्रातःकाल जागते हैं, उनके शत्रुओं का ebook converter DEMO Watermarks*

विनाश करते हैं. जैसे सर्वज्ञ व्यक्तियों को सिर झुका कर प्रणाम करते हैं, उसी प्रकार इंद्र को भी करना चाहिए. हे भद्र इंद्र! तुम्हारा दिया हुआ धन हमारे लिए हो एवं स्थिर हो. (२) तत्तु प्रयः प्रत्नथा ते शुशुक्वनं यस्मिन्यज्ञे वारमकृण्वत क्षयमृतस्य वारसि क्षयम्. वि तद्द्रोचेरध द्वितान्तः पश्यन्ति रश्मिभिः. स घा विदे अन्विन्द्रो गवेषणो बन्धुक्षिद्भयो गवेषणः.. (३) हे इंद्र! जिस प्रकार पूर्वकाल में दिया हुआ तेजस्वी एवं प्रसिद्ध अन्न तुम्हारा था, इसी प्रकार इस समय भी है. तुम मनोरथ पूर्ण करने वाले यज्ञ में रहते हो. तुम धरती और आकाश के मध्य जो जलवृष्टि करते हो, वह सूर्य की किरणों के प्रकाश में देखी जा सकती है. जल की खोज में लगे इंद्र अपने बंधुओं को यज्ञ फल देते एवं जल प्राप्ति का ढंग जानते हैं. (३) नू इत्था ते पूर्वथा च प्रवाच्यं यदङ्गिरोभ्योऽवृणोरप व्रजमिन्द्र शिक्षन्नप व्रजम्. ऐभ्यः समान्या दिशास्मभ्यं जेषि योत्सि च. सुन्वद्भ्यो रन्धया कं चिदव्रतं हृणायन्तं चिदव्रतम्.. (४) हे इंद्र! तुम्हारे उक्त प्रकार के कार्य पहले के समान इस समय भी प्रशंसनीय हैं. तुमने अंगिरा ऋषियों के निमित्त जल बरसाया था एवं असुरों द्वारा चुराई हुई गाएं छुड़ाकर उन्हें दी थीं. इन ऋषियों के समान ही तुम हमारे धन के निमित्त युद्ध करो और विजयी बनो. सोमरस निचोड़ने वाले हम लोगों के कल्याण के निमित्त तुम यज्ञविरोधी शत्रुओं को हराते हो. क्रोध दिखाने वाले यज्ञविरोधी तुम्हारे सामने हार जाते हैं. (४) सं यज्जनान् क्रतुभिः शूर ईक्षयद्धने हिते तरुषन्त श्रवस्यवः प्र यक्षन्त श्रवस्यवः. तस्मा आयुः प्रजावद्दिद्धाधे अर्चन्त्योजसा. इन्द्र ओक्यं दिधिषन्त धीतयो देवाँ अच्छा न धीत्यः.. (५) बलशाली इंद्र यज्ञ के द्वारा सब मनुष्यों के विषय में सत्य बात जानते हैं. इसीलिए अन्न की अभिलाषा करने वाले यजमान पर्याप्त यज्ञ करते हैं. इंद्र के निमित्त दिया हुआ हव्य यजमान को पुत्र, सेवक आदि देता है, जिनकी सहायता से वह शत्रुओं को बाधा पहुंचाता है एवं इंद्र की पूजा करता है. यज्ञकर्म करने वाले यजमान इंद्रलोक प्राप्त करते हैं. इस प्रकार वे देवों के मध्य ही निवास करते हैं. (५) युवं तमिन्द्रापर्वता पुरोयुधा यो नः पृतन्यादप तन्तमिद्धतं वज्रेण तन्तमिद्धतम्. दूरे चत्ताय च्छन्त्सद्गहनं यदिनक्षत्. अस्माकं शत्रून्परि शूर विश्वतो दर्मा दर्षीष्ट विश्वतः.. (६) हे इंद्र एवं मेघ! हमारे जो विरोधी शत्रु सेना एकत्र करते हैं, तुम दोनों हमारे आगे चलकर वज्रप्रहार द्वारा उनका ध्वंस करो. तुम्हारा वज्र दूरवर्ती शत्रु को भी नष्ट करना चाहता है और दुर्गम स्थानों में भी पहुंच जाता है. हे शूर! हमारे शत्रुओं को विविध उपायों से विदीर्ण करो. ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—१३३ देवता—इंद्र

तुम्हारा वज्र शत्रुओं को समस्त उपायों से नष्ट करता है. (६) सूक्त—१३३ देवता—इंद्र उभे पुनामि रोदसी ऋतेन द्रुहो दहामि सं महीरनिन्द्राः. अभिव्लग्य यत्र हता अमित्रा वैलस्थानं परि तृळ्हा अशेरन्.. (१) हे इंद्र! मैं यज्ञ द्वारा धरती और आकाश दोनों को पवित्र करता हूं एवं इंद्रद्रोहियों को आश्रय देने वाली धरती को भली-भांति जानता हूं. एकत्र हुए शत्रु हमें जहां भी मिले, वहीं मारे गए. मरे हुए वे श्मशानभूमि में इधर-उधर पड़े हैं. (१) अभिव्लग्या चिदद्रिवः शीर्षा यातुमतीनाम्. छिन्धि वट्रिणा पदा महावटूरिणा पदा.. (२) हे वैरीभक्षणकर्त्ता इंद्र! शत्रुओं की सेना का सिर अपने विस्तृत पैरों से कुचल दो. (२) अवासां मघवञ्जहि शर्धो यातुमतीनाम्. वैलस्थानके अर्मके महावैलस्थे अर्मके.. (३) हे धनस्वामी इंद्र! इन आयुधसंपन्न सेनाओं की शक्ति नष्ट करके इन्हें निंदनीय श्मशान में फेंक दो. (३) यासां तिस्रः पञ्चाशतोऽभिव्लङ्गैरपावपः. तत्सु ते मनायति तकत्सु ते मनायति.. (४) हे इंद्र! तुमने एक सौ पचास शत्रु सेनाओं का विनाश किया. लोग इस काम को बड़ा कहते हैं, पर तुम्हारे लिए यह छोटा है. (४) पिशङ्गभृष्टिमम्भृणं पिशाचिमिन्द्र सं मृण. सर्वं रक्षो नि बर्हय.. (५) हे इंद्र! पीले रंग वाले, भयंकर शब्द करने वाले पिशाचों का नाश करो एवं संपूर्ण राक्षसों को समाप्त करो. (५) अवर्मह इन्द्र दादृहि श्रुधी नः शुशोच हि द्यौः क्षा न भीषाँ अद्रिवो घृणान्न भीषाँ अद्रिवः. शुष्मिन्तमो हि शुष्मिभिर्धैरुग्रेभरीयसे. अपूरुषघ्नो अप्रतीत शूर सत्वभिस्त्रिसप्तैः शूर सत्वभिः.. (६) हे इंद्र! तुम हमारी स्तुति सुनो और महान् मेघ को अधोमुख करके उसका विदारण करो. हे मेघस्वामी इंद्र! जिस प्रकार वृष्टि के अभाव में अन्न न होने से धरती दुःखी होती है, उसी प्रकार आकाश भी शोक करता है. जैसे त्वष्टा के भय से धरती और आकाश दुःखी थे, उसी प्रकार अन्न के अभाव से होते हैं. हे इंद्र! तुम अधिक बलवान् होने के कारण शत्रु विनाश ebook converter DEMO Watermarks*

में क्रूर उपाय अपनाते हो, पर अपने यजमानों का ध्वंस नहीं करते. हे वीर! तुम इक्कीस सेवकों से घिरे रहते हो, इसलिए शत्रु तुम पर आक्रमण नहीं करते. (६) वनोति हि सुन्वन्क्षयं परीणसः सुन्वानो हि ष्मा यजत्यव द्विषो देवानामव द्विषः. सुन्वान इत्सिषासति सहस्रा वाजव्यवृतः. सुन्वानायेन्द्रो ददात्याभुवं रयिं ददात्याभुवम्.. (७) हे इंद्र! सोमरस निचोड़ने वाला यजमान उत्तम घर पाता है. सोमयज्ञकर्त्ता चारों ओर घिरे हुए शत्रुओं को समाप्त करके देवों के विरोधियों को भी नष्ट करता है. वह अन्न का स्वामी बनता है. उस पर कोई शत्रु आक्रमण नहीं करता. वह असीमित संपत्ति प्राप्त करता है. जो व्यक्ति इंद्र के निमित्त सोमयज्ञ करता है, उसे इंद्र चारों ओर अवस्थित एवं अति समृद्ध धन देते हैं. (७) सूक्त—१३४ देवता—वायु आ त्वा जुवो रारहाणा अभि प्रयो वायो वहन्त्विह पूर्वपीतये सोमस्य पूर्वपीतये. ऊर्ध्वा ते अनु सूनृता मनस्तिष्ठतु जानती. नियुत्वता रथेना याहि दावने वायो मखस्य दावने.. (१) हे वायु! तुम्हें शीघ्रगामी एवं शक्तिशाली अश्व सबसे प्रथम सोमपान के लिए यज्ञ में ले आवें. तुम पहले के समान सोमपान करते हो. तुम्हारे मन के अनुकूल एवं सच्ची हमारी स्तुति तुम्हारे गुणों का वर्णन करती है, वह तुम्हें सदा प्रसन्न करती रहे. यज्ञ में दिए हुए द्रव्य को स्वीकारने एवं हमें वांछित फल देने के हेतु रथ से शीघ्र आओ. तुम्हारे रथ में नियुत नामक घोड़े जुते हैं. (१) मन्दन्तु त्वा मन्दिनो वायविन्दवोऽस्मत्क्राणासः सुकृता अभिद्यवो गोभिः क्राणा अभिद्यवः. यद्ध क्राणा इरध्यै दक्षं सचन्त ऊतयः. सध्रीचीना नियुतो दावने धिय उप ब्रुवत ईं धियः.. (२) हे वायु! यज्ञभूमि में पहुंचने के लिए तुम्हें नियुत नामक अश्व मिले हैं. वे अपने कार्य में कुशल, तुमसे अनुराग करने वाले, सर्वदा तुम्हारे साथ रहने वाले हैं एवं तुम्हारी रुचि देखकर चलते हैं. हर्ष उत्पन्न करने वाले, मादक, भली प्रकार रखे गए, उज्ज्वल और मंत्र द्वारा आहूत सोमरस की बूंदें तुम्हें मुदित करें. बुद्धिसंपन्न यजमान तुम्हारे पास जाकर स्तुति करते हैं. (२) वायुर्युङ्क्ते रोहिता वायुररुणा वायू रथे अजिरा धुरि वोळ्हवे वहिष्ठा धुरि वोळ्हवे. प्र बोधया पुरन्धिं जार आ ससतीमिव. प्र चक्षय रोदसी वासयोषसः श्रवसे वासयोषसः.. (३) ebook converter DEMO Watermarks*

वायु भार ढोने के लिए रथ के अग्रभाग में लाल रंग के घोड़े जोड़ते हैं. वे अत्यंत गमनशील एवं बोझा ढोने में समर्थ हैं. जार जिस प्रकार तंद्रा में पड़ी नारी को जगा देता है, उसी प्रकार तुम यज्ञकर्त्ता यजमान को हव्यदान के लिए सावधान कर देते हो. धरती और आकाश को प्रकाशित करके तुम हव्य प्राप्ति के लिए उषाकाल को स्थापित करते हो. (३) तुभ्यमुषासः शुचयः परावति भद्रा वस्त्रा तन्वते दंसु रश्मिषु चित्रा नव्येषु रश्मिषु. तुभ्यं धेनुः सबर्दुघा विश्वा वसूनि दोहते. अजनयो मरुतो वक्षणाभ्यो दिव आ वक्षणाभ्यः.. (४) हे वायु! उषाएं दूरवर्ती आकाश में अपनी किरणों से घरों को आच्छादित करती हुई पहले के समान कल्याणकारी वस्त्र का विस्तार करती हैं. उषाओं की किरणें नवीन हैं. तुम्हारे यज्ञ को संपन्न कराने के लिए ही गाएं अमृत बरसाती हुई अन्न देती हैं. तुमने दीप्त आकाश में मेघों को पूर्ण करके नदियों को प्रभावशील बनाया. (४) तुभ्यं शुक्रासः शुचयस्तुरण्यवो मदेषूग्रा इषणन्त भुर्वण्यपामिषन्त भुर्वणि. त्वां त्सारी दसमानो भगमीट्टे तक्ववीये. त्वं विश्वस्माद्भुवनात्पासि धर्मणासुर्यत्यासि धर्मणा.. (५) हे वायु! उज्ज्वल, पवित्र एवं तेजपूर्ण सोम तुम्हें प्रमुदित करने के निमित्त आह्वान योग्य अग्नि के समीप जाते हैं एवं जलवर्षा की अभिलाषा करते हैं. अत्यंत भयभीत एवं बलहीन यजमान यज्ञादि विघातकों को भगाने के लिए तुम्हारी स्तुति करता है. हम हविधारणरूप धर्म से युक्त हैं, इसलिए तुम सभी भयों से हमारी रक्षा करो. (५) त्वं नो वायवेषामपूर्व्यः सोमानां प्रथमः पीतिमर्हसि सुतानां पीतिमर्हसि. उतो विहुत्मतीनां विशां ववर्जुषीणाम्. विश्वा इत्ते धेनवो दुह आशिरं घृतं दुहत आशिरम्.. (६) हे वायु! तुमने सबसे पहले सोमरस पिया है. तुम्हीं सबसे पहले निचोड़े गए सोम को पीने योग्य हो. तुम पापरहित एवं यज्ञकर्त्ता यजमानों का हव्य स्वीकार करते हो. समस्त गाएं तुम्हारे निमित्त ही दूध और घी देती हैं. (६) सूक्त—१३५ देवता—वायु स्तीर्णं बर्हिरुप नो याहि वीतये सहस्रेण नियुता नियुतवते शतिनीभिर्नियुत्वते. तुभ्यं हि पूर्वपीतये देवा देवाय येमिरे. प्र ते सुतासो मधुमन्तो अस्थिरन्मदाय क्रत्वे अस्थिरन्.. (१) हे वायु! तुम नियुत नामक अश्वों पर चढ़कर उस द्रव्य को स्वीकार करने के लिए आओ ebook converter DEMO Watermarks*

जो हमने बिछे हुए कुशों पर रखा है. तुम नियुत नामक अश्वों के स्वामी हो. सब देवता चुप हैं. तुमसे पहले कोई सोमरस नहीं पी रहा. निचोड़े हुए सोम को तुम्हारे आनंद एवं हमारी यज्ञसिद्धि के निमित्त तैयार किया गया है. (१) तुभ्यायं सोमः परिपूतो अद्रिभिः स्पार्हा वसानः परि कोशमर्षति शुक्रा वसानो अर्षति. तवायं भाग आयुषु सोमो देवेषु हूयते. वह वायो नियुतो याह्यस्मयुर्जुषाणो याह्यस्मयुः.. (२) हे वायु! पत्थरों द्वारा पीसा गया, सबके द्वारा अभिलाषा करने योग्य एवं तेजस्वी सोमरस पात्र में आता है एवं निर्मल प्रकाश से युक्त होकर तुम्हें प्राप्त होता है. मनुष्यों में सोम यज्ञ के योग्य है. वही सब देवों के मध्य तुम्हें दिया जाता है. तुम हमारे यज्ञ में आने के लिए रथ में नियुत अश्व जोतकर प्रस्थान करो एवं हमारे ऊपर अनुग्रह करो. (२) आ नो नियुद्भिः शतिनीभिरध्वरं सहस्रिणीभिरुप याहि वीतये वायो हव्यानि वीतये. तवायं भाग ऋत्वियः सरश्मिः सूर्ये सचा. अध्वर्युभिर्भरमाणा अयंसत वायो शुक्रा अयंसत.. (३) हे वायु! तुम नियुत नामक सैकड़ों और हजारों घोड़ों से अपनी इच्छा पूर्ति और हव्य भक्षण के लिए हमारे यज्ञ में आओ. ऋत्विज् द्वारा अपने हाथ से निर्मित पवित्र एवं उदित सूर्य के समान तेजस्वी सोम तुम्हारा भाग है. (३) आ वां रथो नियुत्वान्वक्षदवसेऽभि प्रयांसि सुधितानि वीतये वायो हव्यानि वीतये. पिबतं मध्वो अन्धसः पूर्वपेयं हि वां हितम्. वायवा चन्द्रेण राधसा गतमिन्द्रश्च राधसा गतम्.. (४) हे वायु! नियुत नामक घोड़ों से युक्त रथ तुम्हारे साथ-साथ इंद्र को भी हमारी रक्षा, हमारे द्वारा गृहीत अन्न के भक्षण एवं अन्य हव्यों को स्वीकारने के लिए यज्ञ में लावें. तुम दोनों का मधुर सोमरस पिओ. अन्य देवों से पहले तुम्हारा सोमपान करना उचित है. तुम और इंद्र हमें प्रसन्न करने वाला धन लेकर आओ. (४) आ वां धियो ववृत्युरध्वरां उपेममिन्दुं मर्मृजन्त वाजिनमाशुमत्यं न वाजिनम्. तेषां पिबतमस्मयू आ नो गन्तमिहोत्या. इन्द्रवायू सुतानामद्रिभिर्युवं मदाय वाजदा युवम्.. (५) हे इंद्र और वायु! हमारे स्तोत्र तुम्हें यज्ञ में आने की प्रेरणा दें. जिस प्रकार तेज चलने वाले घोड़े की मालिश की जाती है, उसी प्रकार घर से कलश में रखकर यज्ञभूमि में लाए गए सोम को ऋत्विज् रगड़ते हैं. तुम उनका सोमरस पिओ और हमारे यज्ञ की रक्षा के लिए पधारो. तुम दोनों अन्न देने वाले हो, इसलिए अपनी तृप्ति के लिए पत्थरों द्वारा पीसे गए सोम को पिओ. (५) ebook converter DEMO Watermarks*

इमे वां सोमा अप्स्वा सुता इहाध्वर्युभिर्भरमाणा अयंसत वायो शुक्रा अयंसत. एते वामभ्यसृक्षत तिरः पवित्रमाशवः युवायवोऽति रोमाण्याव्यया सोमासो अत्यव्यया.. (६) हे वायु! हमारे यज्ञ में निचोड़ा गया और अध्वर्युजनों द्वारा धारण किया हुआ उज्ज्वल सोम निश्चय ही तुम दोनों का है. तिरछे बिछे हुए कुशों पर रखा हुआ पर्याप्त सोमरस तुम्हारा है. वह समस्त देवों को लांघकर प्रचुर मात्रा में तुम्हें मिलता है. (६) अति वायो ससतो याहि शश्वतो यत्र ग्रावा वदति तत्र गच्छतं गृहमिन्द्रश्च गच्छतम्. वि सूनृता ददृशे रीयते घृतमा पूर्णया नियुता याथो अध्वरमिन्द्रश्च याथो अध्वरम्.. (७) हे वायु! आलस्य के कारण सोते हुए यजमानों को लांघ कर हमारे इस यज्ञ में आओ, जहां सोमरस कूटने के लिए पत्थरों का शब्द उत्पन्न हो रहा है. इंद्र भी ऐसा ही करें. जहां प्यारी और तथ्यपूर्ण स्तुतियां हो रही हैं, जहां होम के निमित्त घी ले जाया जा रहा है, अपने नियुत नामक घोड़ों के साथ वहीं यज्ञस्थल में जाओ. (७) अत्राह तद्द्वहेथे मध्व आहुतिं यमश्वत्थमुपतिष्ठन्त जायवोऽस्मे ते सन्तु जायवः. साकं गावः सुवते पच्यते यवो न ते वाय उप दस्यन्ति धेनवो नाप दस्यन्ति धेनवः.. (८) हे इंद्र और वायु! तुम हमारे यज्ञ में मधु के समान आहुति को स्वीकार करो. सोम को प्राप्त करने के लिए विजयी यजमान पर्वतीय प्रदेशों में जाते हैं. हमारे ऋत्विज् तुम्हारा यज्ञकर्म करने में समर्थ हों. इस यज्ञ में बहुत सी गाएं तुम्हारे निमित्त एक साथ बहुत सा दूध देती हैं एवं पुरोडाश पकाया जाता है. ये गाएं न कम हों और न दुबली हों. (८) इमे ये ते सु वायो बाह्वोजसोऽन्तर्नदी ते पतयन्त्युक्षणो महिव्राधन्त उक्षणः. धन्वञ्चिद्ये अनाशवो जीराश्चिदगिरौकसः. सूर्यस्येव रश्मयो दुर्नियन्तवो हस्तयोर्दुर्नियन्तवः.. (९) हे उत्तम फलदाता वायु! तुम्हारे परम बलशाली, अत्यंत मोटे-ताजे एवं जवान बैलों जैसे घोड़े तुम्हें धरती और आकाश के मध्य भाग से यज्ञस्थल में लाते हैं एवं देर नहीं करते. ये अत्यंत शीघ्रता से चलते हैं. सूर्यकिरणों के समान इनकी चाल भी नहीं रुकती. (९) सूक्त—१३६ देवता—मित्र एवं वरुण प्र सु ज्येष्ठं निचिरभ्यां बृहन्नमो हव्यं मतिं भरता मृळयद्भ्यां स्वादिष्ठं मृळयद्भ्याम्. ता सम्राजा घृतासुती यज्ञेयज्ञ उपस्तुता. अथैनोः क्षत्रं न कुतश्चनाधृषे देवत्वं नू चिदाधृषे.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

हे ऋत्विजो! नित्य रहने वाले मित्र और वरुण को लक्ष्य करके प्रशंसनीय एवं महान् स्तोत्र को आरंभ करो एवं उन्हें द्रव्य देने का निश्चय कर लो. वे यजमानों को सुख देते हैं एवं स्वादिष्ट हवि का भक्षण करके भली-भांति सुशोभित होते हैं. उन्हीं के लिए घी एकत्र किया जाता है एवं प्रत्येक यज्ञ में उनकी स्तुति की जाती है. उनका बल अलंघनीय है एवं उनके देव होने में किसी को संदेह नहीं है. (१) अदर्शि गातुरुरवे वरीयसी पन्था ऋतस्य समयंस्त रश्मिभिश्चक्षुर्भगस्य रश्मिभिः. द्युक्षं मित्रस्य सादनमर्यम्णो वरुणस्य च. अथा दधाते बृहदुक्थ्यं१ वय उपस्तुत्यं बृहद्वयः.. (२) सब लोगों ने देखा है कि महती उषा विस्तृत यज्ञ की ओर जाती है. गतिशील सूर्य का मार्ग आकाश प्रकाश से भर गया एवं सूर्यकिरणों से सभी को आंखें मिलीं. मित्र, अर्यमा और वरुण का आकाशरूपी घर उज्ज्वल प्रकाश से पूर्ण हो गया. हे मित्र एवं वरुण! तुम दोनों स्तुतियोग्य अन्न को अधिक मात्रा में धारण करो. (२) ज्योतिष्मतीमदितिं धारयत्क्षितिं स्वर्वतीमा सचेते दिवेदिवे जागृवांसा दिवेदिवे. ज्योतिष्मत्क्षत्रमाशाते आदित्या दानुनस्पती. मित्रस्तयोर्वरुणो यातयज्जनोऽर्यमा यातयज्जनः.. (३) यजमान ने अग्नि के तेज से युक्त, समस्त लक्षणों तथा स्वर्ग प्रदान करने वाली यज्ञवेदी अपने आप बनाई है. तुम दोनों एकत्र होकर प्रतिदिन सावधान रहो एवं प्रतिदिन यज्ञवेदी पर आकर तेज और बल प्राप्त करो. तुम अदिति के पुत्र एवं समस्त देवों के पालक हो. मित्र, वरुण और अर्यमा लोगों को अपने-अपने काम में लगाते हैं. (३) अयं मित्राय वरुणाय शन्तमः सोमो भूत्ववपानेष्वाभगो देवो देवेष्वाभगः. तं देवासो जुषेरत विश्वे अद्य सजोषसः. तथा राजाना करथो यदीमह ऋतावाना यदीमहे.. (४) नीचे की ओर मुंह करके पीने वाले मित्र और वरुण के लिए सोमपान प्रसन्नता प्रदान करे. समस्त देव अपनी सेवा के उपयुक्त एवं तेजस्वी सोम को प्रसन्नतापूर्वक पिएं. हे समान प्रीतयुक्त मित्र एवं वरुण! तुम यज्ञ के स्वामी हो. तुम हमारी प्रार्थना के अनुसार कार्य करो. (४) यो मित्राय वरुणायाविधज्जनोंऽनर्वाणं तं परि पातो अंहसो दाश्वांसं मर्तमंहसः. तमर्यमाभि रक्षत्यूजूयन्तमनु व्रतम्. उक्थैर्य एनोः परिभूषति व्रतं स्तोमैराभूषति व्रतम्.. (५) हे मित्र एवं वरुण! तुम अपनी सेवा करने वाले, द्वेषरहित एवं हव्यदाता यजमान की समस्त पापों से रक्षा करो. अर्यमा सरल स्वभाव वाले यजमान को देखते हैं एवं उसकी रक्षा ebook converter DEMO Watermarks*

करते हैं. यजमान मंत्र द्वारा मित्र और वरुण का यज्ञ करता है एवं स्तुतियों के द्वारा उसको सुशोभित करता है. (५) नमो दिवे बृहते रोदसीभ्यां मित्राय वोचं वरुणाय मीळ्हुषे सुमृळीकाय मीळ्हुषे. इन्द्रमग्निमुप स्तुहि द्युक्षमर्यमणं भगम्. ज्योग्जीवन्तः प्रजया सचेमहि सोमस्योतौ सचेमहि.. (६) मैं अभीष्ट फल तथा सुख के दाता महान् एवं प्रकाशयुक्त सूर्य, धरती, आकाश, मित्र, वरुण और रुद्र को नमस्कार करता हूं. हे होताओ! इस समय इंद्र, अग्नि, दीप्तिसंपन्न अर्यमा एवं भग की स्तुति करो. इनकी कृपा से हम पूजा से घिरे हुए एवं सोमरस द्वारा रक्षित रहेंगे. (६) ऊती देवानां वयमिन्द्रवन्तो मंसीमहि स्वयशसो मरुद्भिः. अग्निर्मित्रो वरुणः शर्म यंसन् तदश्याम मघवानो वयं च.. (७) हमने अपनी स्तुतियों से मरुद्गणों को प्रसन्न कर लिया है. इंद्र हम पर प्रसन्न हैं. हम देवों की रक्षा चाहते हैं. इंद्र, अग्नि, मित्र और वरुण हमें सुख दें. हम उनके दिए हुए अन्न से सुख भोगें. (७) सूक्त—१३७ देवता—मित्र और वरुण सुषुमा यातमद्रिभिर्गोश्रीता मत्सरा इमे सोमासो मत्सरा इमे. आ राजाना दिविस्पृशास्मत्रा गन्तमुप नः. इमे वां मित्रावरुणा गवाशिरः सोमाः शुक्रा गवाशिरः.. (१) हे मित्र एवं वरुण! हम पत्थरों से सोम कूटते हैं, इसलिए तुम हमारे यज्ञ में आओ. तृप्तिकारक दूध-मिश्रित सोम तैयार है. तुम स्वर्ग में रहने वाले, हमारे पालनकर्त्ता एवं प्रकाशयुक्त हो. तुम हमारे यज्ञ में आओ. दूध मिला हुआ यह उज्ज्वल सोम तुम्हारे ही निमित्त है. (१) इम आ यातमिन्दवः सोमासो दध्याशिरः सुतासो दध्याशिरः. उत वामुषसो बुधि साकं सूर्यस्य रश्मिभिः. सुतो मित्राय वरुणाय पीतये चारुरृताय पीतये.. (२) हे मित्र एवं वरुण! हमारे यज्ञ में आओ, क्योंकि यह निचोड़ा हुआ पतला सोमरस दही के साथ मिला दिया गया है. चाहे उषाकाल हो, चाहे सूर्य की किरणें चमकने लगी हों, यह निचोड़ा हुआ सोम वरुण एवं मित्र के पीने हेतु यज्ञभूमि में प्रस्तुत है. (२) तां वां धेनुं न वासरीमंशुं दुहन्त्यद्रिभिः सोमं दुहन्त्यद्रिभिः.

अस्मत्रा गन्तमुप नोऽर्वाञ्चा सोमपीतये. अयं वां मित्रावरुणा नृभिः सुतः सोम आ पीतये सुतः.. (३) अध्वर्यु तुम्हारे निमित्त पत्थर के टुकड़ों से उसी प्रकार सोमरस को निचोड़ते हैं, जिस प्रकार गाय से दूध काढ़ा जाता है. हमारी रक्षा करने वाले तुम दोनों सोमपान के लिए समीप आओ. यज्ञ संपन्न करने वाले लोगों ने यह सोम तुम्हारे पीने के लिए ठीक से निचोड़ा है. (३) सूक्त—१३८ देवता—पूषा प्रप्र पूष्णस्तुविजातस्य शस्यते महित्वमस्य तवसो न तन्दते स्तोत्रमस्य न तन्दते. अर्चामि सुम्नयन्नहमन्त्यूतिं मयोभुवम्. विश्वस्य यो मन आयुयुवे मखो देव आयुयुवे मखः.. (१) अनेक यजमानों के कल्याण के निमित्त उत्पन्न पूषादेव के बल की सभी स्तुति करते हैं. कोई भी न उनकी स्तुति को समाप्त करता है और न उनके बल का विरोध करता है. इसी कारण मैं भी सुख की इच्छा से रक्षा के लिए तत्पर, सुख के उत्पन्न करने वाले, यज्ञ के स्वामी एवं सब मनुष्यों के मन के साथ एकरूप होने वाले पूषा की स्तुति करता हूं. (१) प्र हि त्वा पूषन्नजिरं न यामनि स्तोमेभिः कृण्व ऋणवो यथा मृध उष्ट्रो न पीपरो मृधः. हुवे यत्त्वा मयोभुवं देवं सख्याय मर्त्यः. अस्माकमाङ्गूषान्युम्निनस्कृधि वाजेषु द्युम्निनस्कृधि.. (२) हे पूषा! लोग जैसे शीघ्रगामी घोड़े की प्रशंसा करते हैं, उसी प्रकार मैं यज्ञस्थल में शीघ्र आने के लिए तुम्हारी स्तुति करता हूं. तुम हमें ऊंट के समान संग्राम के पार पहुंचाते हो, इसलिए मैं युद्ध में आने के लिए तुम्हारी स्तुति करता हूं. मैं मरणधर्मा तुम्हारी मित्रता पाने के लिए सुख के उत्पादक तुम्हारा आह्वान करता हूं. हमारे आह्वान को सफल करके हमें युद्ध में विजयी बनाओ. (२) यस्य ते पूषन्त्सख्ये विपन्यवः क्रत्वा चित्सन्तोऽवसा बुभुजिर इति क्रत्वा बुभुजिरे. तामनु त्वा नवीयसीं नियुतं राय ईमहे. अहेळमान उरुशंस सरी भव वाजेवाजे सरी भव.. (३) हे पूषा! यजमान तुम्हारी मित्रता प्राप्त करके उत्तम यज्ञों द्वारा तुम्हें प्रसन्न करते हैं एवं स्तोत्र बोलते हुए तुम्हारी रक्षा प्राप्त करके भांति-भांति के सुख भोगते हैं. तुमसे नवीन रक्षण प्राप्त करने के बाद हम तुमसे नियुत धन की याचना करते हैं. हे पूषा! बहुत से लोग तुम्हारी स्तुति करते हैं. तुम हमारे प्रति दयालु बनकर आओ और युद्ध में हमारे आगे चलो. (३) अस्या ऊ षु ण उप सातये भुवोऽहेळमानो ररिवाँ अजाश्व श्रवस्यतामजाश्व. ebook converter DEMO Watermarks*

ओ षु त्वा ववृतीमहि स्तोमेभिर्दस्म साधुभिः. नहि त्वा पूषन्नतिमन्य आघृणे न ते सख्यमपह्नुवे.. (४) हे पूषा! बकरे ही तुम्हारे अश्व हैं. हमारे इस लाभ का अनादर न करते हुए तुम दाता बनकर हमारे समीप आओ. हम अन्न की इच्छा करते हैं. हे शत्रुनाशक! हम उत्तम स्तोत्र बोलते हुए तुम्हारे चारों ओर वर्तमान रहें. हे वर्षाकारक! हम न कभी तुम्हारा अपमान करते हैं और न कभी तुम्हारी मित्रता का त्याग करते हैं. (४) सूक्त—१३९ देवता—विश्वेदेव अस्तु श्रौषट् पुरो अग्निं धिया दध आ नु तच्छर्धो दिव्यं वृणीमह इन्द्रवायू वृणीमहे. यद्ध क्राणा विवस्वति नाभा सन्दायि नव्यसी. अध प्र सू न उप यन्तु धीतयो देवाँ अच्छा न धीतयः.. (१) मैंने उत्तरी वेदी में श्रद्धापूर्वक अग्नि को धारण किया है. मैं अग्नि की दिव्य शक्ति की एवं इंद्र व वायु की सम्मुख होकर प्रार्थना करता हूं. पृथ्वी की प्रकाशित नाभि अर्थात् यज्ञभूमि को लक्ष्य करके यह स्वार्थ प्रकाशन करती हुई नई स्तुति बनाई गई है, इसलिए वह सुनी जावे. हमारे स्तुतिरूपी कर्म देवों के समीप पहुंचें. (१) यद्ध त्यन्मित्रावरुणावृतादध्याददाथे अनृतं स्वेन मन्युना दक्षस्य स्वेन मन्युना. युवोरित्थाधि सद्मास्वपश्याम हिरण्ययम्. धीभिश्चन मनसा स्वेभिरक्षभिः सोमस्य स्वेभिरक्षभिः.. (२) हे मित्र एवं वरुण! तुम अपने तेज से जो सूखने वाला जल आदित्य से भली प्रकार ग्रहण करते हो, वही हमें सब ओर से देते हो. हम यज्ञादि रूपी कर्मों द्वारा, सोमरस द्वारा तथा ज्ञान में आसक्त इंद्रियों द्वारा तुम दोनों का हिरणमय रूप देखें. (२) युवां स्तोमेभिर्देवयन्तो अश्विनाश्रावयन्त इव श्लोकमायवो युवां हव्याभ्या३ यवः. युवोर्विश्वा अधि श्रियः पृक्षश्च विश्ववेदसा. प्रुषायन्ते वां पवयो हिरण्यये रथे दस्रा हिरण्यये.. (३) हे अश्विनीकुमारो! स्तुतियों द्वारा तुम्हें अपने अनुकूल बनाने की इच्छा करने वाले यजमान तुम्हें सुनाते हुए श्लोक बोलते हैं. हे समस्त धनों के स्वामियो! वे तुम्हारी अनुकंपा से सभी संपत्तियां एवं अन्न प्राप्त करते हैं. हे शत्रुनाशको! तुम्हारे स्वर्णमय रथ की नेमियों से मधु टपकता है. तुम उसी रथ पर मधुर हवि धारण करो. (३) अचेति दस्रा व्यृणाकमृण्वथो युञ्जते वां रथयुजो दिविष्टिष्वध्वस्मानो दिविष्टिषु. अधि वां स्थाम वन्धुरे रथे दस्रा हिरण्यये.

पथेव यन्तावनुशासता रजोऽञ्जसा शासता रजः.. (४) हे शत्रुनाशको! तुम्हारे इन कार्यों को लोग भली प्रकार जानते हैं. तुम स्वर्ग को जाते हो, इसलिए तुम्हारे रथचालक तुम्हें स्वर्ग के मार्गरूप यज्ञों में ले जाने को रथ तैयार करते हैं एवं मार्ग के अभाव में भी रथ को नष्ट नहीं करते. हम तीन बंधनों वाले स्वर्णरथ पर सुंदर मार्ग से स्वर्ग को जाने वाले, शत्रुओं को वश में करने वाले एवं मुख्य रूप से वर्षा का जल बिखेरने वाले तुमको बैठाते हैं. (४) शचीभिर्नः शचीवसू दिवा नक्तं दशस्यतम्. मा वां रातिरुष दसत्कदा चनास्मद्रातिः कदा चन.. (५) हे कर्मरूप धन के स्वामियो! हमारे यज्ञादि कर्म द्वारा हमें रात-दिन मनचाही वस्तुएं दो. तुम्हारा एवं हमारा दान कभी भी समाप्त न हो. (५) वृषन्निन्द्र वृषपाणास इन्दव इमे सुता अद्रिषुतास उद्भिदस्तुभ्यं सुतास उद्भिदः. ते त्वा मन्दन्तु दावने महे चित्राय राधसे. गीर्भिर्गिर्वाहः स्तवमान आ गहि सुमृळीको न आ गहि.. (६) हे कामवर्षक इंद्र! पाषाण खंडों द्वारा कुचलकर निचोड़ा गया यह सोम तुम्हारे पीने के लिए ही तैयार किया गया है. पर्वत पर उत्पन्न होने वाला सोम तुम्हारे निमित्त निचोड़ा गया है. अभिमतदान, महान् एवं विचित्र धन प्राप्ति के लिए दिया गया सोम तुम्हें प्रसन्न करे. हे स्तुतिधारक! हमारी स्तुतियां सुनकर हमारे ऊपर प्रसन्न होते हुए आओ. (६) ओ षू णो अग्ने शृणुहि त्वमीळितो देवेभ्यो ब्रवसि यज्ञियेभ्यो राजभ्यो यज्ञियेभ्यः. यद्ध त्यामङ्गिोभ्यो धेनुं देवा अदत्तन. वि तां दुहे अर्यमा कर्तरी सचाँ एष तां वेद मे सचा.. (७) हे अग्नि! तुम हमारे द्वारा स्तुत होकर हमारा आह्वान सुनो. तुम यज्ञ के योग्य एवं तेजस्वी देवों को यजमान के यज्ञकर्मों की सूचना देना. देवों ने अंगिरागोत्रीय ऋषियों को प्रसिद्ध गाय दी थी. अर्यमा ने अन्य देवों के साथ अग्नि के लिए उस गाय को दुहा. वे अर्यमा उस गाय को तथा मुझे जानते हैं. (७) मो षु वो अस्मदभि तानि पौंस्या सना भूवन्द्युम्नानि मोत जारिषुरस्मत्पुरोत जारिषुः. यद्धश्वित्रं युगेयुगे नव्यं घोषादमर्त्यम्. अस्मासु तन्मरुतो यच्च दुष्टरं दिधृता यच्च दुष्टरम्.. (८) हे मरुतो! तुम्हारी प्रसिद्ध, नित्य एवं प्रकाशयुक्त शक्ति हमसे कभी दूर न जाए. हमारा यश एवं हमारे नगर जीर्ण न हों. तुम्हारी विचित्र, नवीन एवं शब्द करने वाली वस्तुएं हमें युग- युग में प्राप्त हों. दुःख से प्राप्त करने योग्य एवं शत्रुओं द्वारा नष्ट न होने वाला जो धन है, वह ebook converter DEMO Watermarks*

हमारा हो. (८) दध्यङ्ङ ह मे जनुषं पूर्वो अङ्गिराः प्रियमधः कण्वो अत्रिर्मनुर्विदुस्ते मे पूर्वे मनुर्विदुः. तेषां देवेष्वायतिरस्माकं तेषु नाभयः. तेषां पदेन मह्या नमे गिरेन्द्राग्नी आ नमे गिरा.. (९) प्राचीन दध्यङ्, अंगिरा, प्रियमध, कण्व, अत्रि एवं मनु मेरे जन्म को जानते हैं. वे एवं मनु हमारे पितरों को जानते हैं. वे महर्षियों से दीर्घकाल से संबंधित हैं एवं मेरे जीवन के साथ उनका संबंध है. उनकी महत्ता के कारण मैं स्तुति रूपी वाणी से उन्हें नमस्कार करता हूं. (९) होता यक्षद्धनिनो वन्त वार्यं बृहस्पतिर्यजति वेन उक्षभिः पुरुवारेभिरुक्षभिः. जगृभ्मा दूर आदिशं श्लोकमद्रेरध त्मना. अधारयदरिन्दानि सुक्रतुः पुरू सद्मानि सुक्रतुः.. (१०) होता यज्ञ करे एवं हव्य की कामना करने वाले देव सोमरस प्राप्त करें. इच्छा करते हुए बृहस्पति तृप्त करने वाले एवं वरणीय सोमरस से यज्ञ करते हैं. हम यजमानों ने दूर देश में उत्पन्न होने वाले एवं सोम कूटने के साधन पत्थरों की आवाज सुनी थी. यह शोभन कर्म वाला यजमान स्वयं जल एवं बहुत से निवास योग्य घरों को धारण करता है. (१०) ये देवासो दिव्येकादश स्थ पृथिव्यामध्येकादश स्थ. अप्सुक्षितो महिनैकादश स्थ ते देवासो यज्ञमिमं जुषध्वम्.. (११) स्वर्ग में जो ग्यारह देव हैं, धरती पर जो ग्यारह देव हैं एवं अंतरिक्ष में जो ग्यारह देव हैं, वे अपनी महिमा से इस यज्ञ की सेवा करें. (११) सूक्त—१४० देवता—अग्नि वेदिषदे प्रियधामाय सुद्युते धासिमिव प्र भरा योनिमग्नये. वस्त्रेणेव वासया मन्मना शुचिं ज्योतीरथं शुक्रवर्णं तमोहनम्.. (१) हे अध्वर्यु! यज्ञवेदी पर विराजने वाले, अपने स्थान को प्रेम करने वाले एवं शोभन प्रकाशयुक्त अग्नि के लिए हव्य अन्न के समान वेदीरूपी स्थान तैयार करो. उस शुद्ध, प्रकाशयुक्त, दीप्तवर्ण एवं अंधकारनाशक स्थान को सुंदर कुशों से इस प्रकार ढक दो, जिस प्रकार किसी को कपड़े से ढका जाता है. (१) अभि द्विजन्मा त्रिवृदन्नमृज्यते संवत्सरे वावृधे जग्धमी पुनः. अन्यस्यासा जिह्वया जेन्यो वृषा न्य१न्येन वनिनो मृष्ट वारणः.. (२) द्विजन्मा अग्नि, आज्य, पुरोडाश एवं सोम नामक तीन भाइयों को सामने आकर खाते ebook converter DEMO Watermarks*

हैं. अग्नि द्वारा भक्षित धान्य एक वर्ष में बढ़ जाता है. कामवर्षी अग्नि एक रूप से मुख एवं जिह्वा द्वारा बढ़ते हैं एवं दूसरे दावाग्नि रूप से सबको अपने से दूर हटाते हुए वनों को जलाते हैं. (२) कृष्णप्रुतौ वेविजे अस्य सक्षिता उभा तरेते अभि मातरा शिशुम्. प्राचाजिह्वं ध्वसयन्तं तृषुच्युतमा साच्यं कुपयं वर्धनं पितुः.. (३) अग्नि की माता के समान काले दोनों काष्ठ जलते हैं एवं समान कार्य करते हुए अग्नि को उस प्रकार प्राप्त करते हैं, जिस प्रकार माता शिशु को. वह शिशु रूप अग्नि पूर्वाभिमुख, जिह्वा वाला, तम विनाशक, शीघ्र उत्पन्न काष्ठ से शनैः-शनैः मिलने वाला, रक्षणीय एवं पालक यजमान का वर्द्धक है. (३) मुमुक्ष्वो३ मनवे मानवस्यते रघुद्रुवः कृष्णसीतास ऊ जुवः. असमना अजिरासो रघुष्यदो वातजूता उप युज्यन्त आशवः.. (४) अग्निज्वालाएं मोक्षदायक, शीघ्रगामिनी, काले मार्ग वाली, शीघ्रकारिणी, भिन्नवर्ण वाली, गमनशील, शीघ्र कंपित होनेवाली, हवा के द्वारा प्रेरित, व्याप्तिपूर्ण, मननशील एवं यजमान के लिए उपयोगी हैं. (४) आदस्य ते ध्वसयन्तो वृथेरते कृष्णमभवं महि वर्पः करिक्रतः. यत्सीं महीमवनिं प्राभि मर्मृशदभिश्वसन्तसनयन्नेति नानदत्.. (५) जिस प्रकार अग्नि सब ओर चेष्टा और शब्द करते हुए तथा अत्यंत गरजते हुए महती भूमि का बार-बार स्पर्श करते हैं, उस समय इनकी चिनगारियां अंधकार का विनाश करती हुई एवं काले रंग के गमन मार्ग को प्रकाश से भरती हुई सब ओर जाती हैं. (५) भूषन्न योऽधि बभ्रूषु नम्रते वृषेव पत्नीरभ्येति रोरुवत्. ओजायमानस्तन्वश्च शुम्भते भीमो न शृङ्गा दविधाव दुर्गृभिः.. (६) अग्नि पीले रंग की लकड़ियों को अलंकृत करते हुए उन में प्रवेश करते हैं. जिस तरह बैल गायों की ओर दौड़ता है, उसी प्रकार अग्नि महान् शब्द करते हुए उन लकड़ियों की ओर चारों तरफ से जाते हैं. वे बलप्रदर्शन सा करते हुए अपनी ज्वालाएं दीप्त करते हैं. जिस प्रकार न पकड़ा जा सकने वाला भयंकर पशु सींग घुमाता है, उसी प्रकार अग्नि ज्वालाओं को चलाते हैं. (६) स संस्तिरो विष्टिरः सं गृभायति जानन्नेव जानतीर्नित्य आ शये. पुनर्वर्धन्ते अपि यन्ति देव्यमन्यद्वर्पः पित्रो कृण्वते सचा.. (७) अग्नि कभी प्रच्छन्न और कभी विस्तृत होकर लकड़ियों में व्याप्त होते हैं. यजमान का अभिप्राय जानने वाले अग्नि अपनी उन ज्वालाओं का आश्रय लेते हैं जो यजमान की ebook converter DEMO Watermarks*

इच्छाओं को जानती हैं. ऐसी ज्वालाएं बार-बार बढ़कर दिव्य अग्नि को प्राप्त होती हैं एवं अग्नि के साथ ही धरती और आकाश का रूप तेजोमय बना देती हैं. (७) तमग्रुवः केशिनीः सं हि रेभिर ऊर्ध्वास्तस्थुर्मृषीः प्रायवे पुनः. तासां जरां प्रमुञ्चन्नेति नानददसुं परं जनयञ्जीवमस्तृतम्.. (८) आगे स्थित केशों के समान ज्वालाएं अग्नि का आलिंगन करती हैं. ज्वालाएं मरी हुई होने पर भी आने वाले अग्नि के स्वागत के लिए ऊपर उठती हैं, अग्नि ऐसी शिखाओं का बुढ़ापा दूर करके उन्हें अतिशय शक्तिशाली एवं प्राणधारण के योग्य बनाते हुए बार-बार गर्जन करते हैं. (८) अधीवासं परि मातू रिहन्नह तुविग्रेभिः सत्वभिर्याति वि ज्रयः. वयो दधत्पद्वते रेरिहत्सदानु श्येनी सचते वर्तनीरह.. (९) यह अग्नि धरती माता को वस्त्रों के समान ढकने वाली झाड़ियों को चारों ओर से चाटते हुए महान् शब्द करने वाले प्राणियों के साथ तेजी से भांति-भांति का गमन करते हैं. वह चरणों वाले अर्थात् मनुष्यों और पशुओं को खाने की वस्तुएं देते तथा तृणादि को जलाते हुए उस स्थान को काला कर देते हैं, जिससे चलकर आते हैं. (९) अस्माकमग्ने मघवत्सु दीदिह्यध श्वसीवान्वृषभो दमूनाः. अवास्या शिशुमतीरदीदेर्वेर्मेव युत्सु परिजर्भुराणः.. (१०) हे अग्नि! तुम हमारे धनसंपन्न घरों में प्रज्वलित होओ. इसके पश्चात् तुम कामवर्षी एवं दानाभिलाषी होकर ज्वाला रूपी सांसें इधर-उधर छोड़ते हुए बच्चों जैसी चंचल बुद्धि त्याग दो एवं संग्राम में कवच के समान शत्रुओं से बार-बार हमारी रक्षा करते हुए जल उठो. (१०) इदमग्ने सुधितं दुर्धितादधि प्रियादु चिन्मन्मनः प्रेयो अस्तु ते. यत्ते शुक्रं तन्वो३ रोचते शुचि तेनास्मभ्यं वनसे रत्नमा त्वम्.. (११) हे अग्नि! कठोर काठ के ऊपर रखा हुआ जो हवि तुम्हें भली प्रकार दिया गया है, वह तुम्हें प्रिय वस्तु से भी अधिक प्रिय हो. तुम्हारे ज्वलारूपी शरीर से जो भी तेज प्रकाशित होता है, उसके साथ-साथ हमारे लिए रत्न दो. (११) रथाय नावमुत नो गृहाय नित्यारित्रां पद्धतीं रास्यग्ने. अस्माकं वीराँ उत नो मघोनो जनाँश्च या पारयाच्छर्म या च.. (१२) हे अग्नि! हमारे गमनशील यजमान को संसार से पार उतारने वाली यज्ञ रूपी नाव दो. ऋत्विज् उसके डांड एवं मंत्र उसके चरण हैं. वह हमारे वीर पुत्रों एवं संपत्तिशाली लोगों को पार लगाएगी तथा कल्याण करेगी. (१२) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—१४१ देवता—अग्नि

अभी नो अग्न उक्थमिज्जुगुर्या द्यावाक्षामा सिन्धवश्च स्वगूर्ताः. गव्यं यव्यं यन्तो दीर्घाहेषं वरमरुण्यो वरन्त.. (१३) हे अग्नि! हमारे मंत्रों को प्रोत्साहित करो. धरती, आकाश एवं स्वयं बहने वाली नदियां हमें घी, दूध, जौ, गेहूं आदि देकर प्रोत्साहित करें. लाल रंग वाली उषाएं हमें सदा उत्तम अन्न दें. (१३) सूक्त—१४१ देवता—अग्नि बळित्था तद्वपुषे धायि दर्शतं देवस्य भर्गः सहसो यतो जनि. यदीमुप ह्वरते साधते मतिर्ऋतस्य धेना अनयन्त सस्रुतः.. (१) द्योतनशील अग्नि का दर्शनीय वह तेज सब लोग शरीर की दृढ़ता के लिए धारण करते हैं, क्योंकि वह बल से उत्पन्न है. यह बात सत्य है. यह प्रसिद्ध है कि उसी तेज का सहारा लेकर मेरी बुद्धि कार्य करती है और अपना इष्ट सिद्ध करती है. यज्ञसाधक अग्नि के तेज को ही सबकी स्तुतियां प्राप्त होती हैं. (१) पृक्षो वपुः पितुमान्नित्य आ शये द्वितीयमा सप्तशिवासु मातृषु. तृतीयमस्य वृषभस्य दोहसे दशप्रमतिं जनयन्त योषणः.. (२) यह अग्नि अन्नसाधक, शरीर बढ़ाने वाला एवं हव्य अन्न से युक्त होकर एक रूप में नित्य धरती पर रहता है. दूसरे रूप में सातों लोकों का कल्याण करने वाली वर्षाओं में रहता है. तीसरे रूप में इस कामवर्षी बादल का जल बरसाने के लिए रहता है. इस प्रकार परस्पर मिली हुई दसों दिशाएं इस अग्नि को उत्पन्न करती हैं. (२) निर्यदिं बुध्नान्महिषस्य वर्पस ईशानासः शवसा क्रन्त सूरयः. यदीमनु प्रदिवो मध्व आधवे गुहा सन्तं मातरिश्वा मथायति.. (३) महान् यज्ञ के आरंभ से सब कार्य सिद्ध करने में समर्थ ऋत्विज् बल से अग्नि को उत्पन्न करते हैं एवं वेदीरूपी गुफा में छिपी हुई अग्नि को फैलाने के लिए चलती हुई वायु अनादि काल से प्रेरित करती है. (३) प्र यत्पितुः परमान्नीयते पर्या पृक्षुधो वीरुधो दंसु रोहति. उभा यदस्य जनुषं यदिन्वत आदिद्यविष्ठो अभवद्घृणा शुचिः.. (४) अन्न की उत्कृष्टता के निमित्त अग्नि को उत्पन्न किया जाता है. भोजन की इच्छा वाली लताएं अग्नि के दांतों में प्रवेश करती हैं. ऋत्विज् एवं यजमान दोनों ही अग्नि की उत्पत्ति का प्रयत्न करते हैं, इसलिए शुद्ध अग्नि यजमानों पर कृपा करते हुए युवा होते हैं. (४) ebook converter DEMO Watermarks*

आदिन्मातृराविशद्यास्वा शुचिरहिंस्यमान उर्विया वि वावृधे. अनु यत्पूर्वा अरुहत्सनाजुवो नि नव्यसीष्ववरासु धावते.. (५) दूसरों द्वारा बिना सताए हुए अग्नि, जिन माता रूपी दिशाओं के बीच वृद्धि को प्राप्त हुए हैं, प्रकाशित होते हुए उन्हीं में प्रविष्ट होते हैं. अग्नि स्थापन के समय जो ओषधियां डाली गई थीं, अग्नि उन पर चढ़ गए थे. इस समय वे नई डाली गई ओषधियों की ओर दौड़ते हैं. (५) आदिद्धोतारं वृणते दिविष्टिषु भगमिव पपृचानास ऋञ्जते. देवान्यत्क्रत्वा मज्मना पुरुष्टुतो मर्त्तं शंसं विश्वधा वेति धायसे.. (६) ऋत्विज् द्युलोक में जाने की इच्छा के कारण होम संपादक अग्नि की राजा के समान पूजा करते हैं, क्योंकि ये बहुत से लोगों द्वारा स्तुत एवं यज्ञरूप कर्म तथा अपने शारीरिक बल से देवों एवं स्तुति योग्य मानवों के लिए अन्न की इच्छा करते हैं. अग्नि विश्वरूप हैं. (६) वि यदस्थाद्यजतो वातचोदितो ह्वारो न वक्वा जरणा अनाकृत:. तस्य पत्मन्दक्षुषः कृष्णजंहसः शुचिजन्मनो रज आ व्यध्वनः.. (७) यज्ञ के योग्य अग्नि वायु द्वारा प्रेरित होकर चारों ओर उसी प्रकार फैल जाते हैं, जिस प्रकार बहुवक्ता विदूषक भांति-भांति की स्तुतियां करता है. जलाने वाले, कृष्णमार्ग वाले एवं पवित्रजन्म वाले अग्नि के गमनमार्ग में समस्त लोक स्थित हैं. (७) रथो न यातः शिक्वभिः कृतो द्यामङ्गेभिररुषेभिरीयते. आदस्य ते कृष्णासो दक्षि सूरयः शूरस्येव त्वेषथादीषते वयः.. (८) जिस प्रकार रस्सियों से बंधा हुआ रथ अपने पहिए आदि अंगों के सहारे चलता है, उसी प्रकार अग्नि अपनी ज्वालाओं के साथ आकाश में जाते हैं. वे अपने मार्ग को काले रंग का बनाने के लिए लकड़ियों को जलाते हैं. अग्नि के तेज से पक्षी उसी प्रकार भाग जाते हैं, जिस प्रकार वीर के भय से लोग भागते हैं. (८) त्वया ह्यग्ने वरुणो धृतव्रतो मित्रः शाशद्रे अर्यमा सुदानवः. यत्सीमनु क्रतुना विश्वथा विभुररान्न नेमिः परिभूरजायथाः.. (९) हे अग्नि! तुम्हारे कारण वरुण व्रतधारी, मित्र अंधकारनाशकर्त्ता एवं अर्यमा शोभनदानशील होते हैं. जिस प्रकार नेमि रथ के पहियों के अरों को धारण करती है, उसी प्रकार अग्नि अपने यज्ञरूपी कर्म के द्वारा सर्वव्यापक एवं अपने तेज से सबका पराभव करते हुए उत्पन्न होते हैं. (९) त्वमग्ने शशमानाय सुन्वते रत्नं यविष्ठ देवतातिमन्वसि. तं त्वा नु नव्यं सहसो युवन्वयं भगं न कारे महिरत्न धीमहि.. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*

हे अत्यंत युवा अग्नि! तुम स्तुति करने वाले एवं सोम निचोड़ने वाले यजमानों के कल्याण के निमित्त उनका रमणीय हव्य देवों के समीप ले जाकर विस्तृत करते हो. हे बलपुत्र, धनसंपन्न, नित्यतरुण एवं हव्यभोक्ता अग्नि! हम यजमान स्तोत्र बोलते समय तुम्हें शीघ्र स्थापित करते हैं. (१०) अस्मे रयिं न स्वर्थं दमूनसं भगं दक्षं न पपृचासि धर्णसिम्. रश्मीँरिव यो यमति जन्मनी उभे देवानां शंसमृत आ च सुक्रतुः.. (११) हे अग्नि! जिस प्रकार तुम हमें वरणीय एवं पूज्य धन देते हो, उसी प्रकार सबको आकृष्ट करने वाला, उत्साहित एवं विद्याधारण में कुशल पुत्र देते हो. अग्नि अपनी किरणों के समान ही अपने जन के आधार दोनों लोकों का विस्तार करते हैं. शोभनयज्ञकर्त्ता अग्नि हमारे यज्ञ में देवस्तुति को विस्तार देते हैं. (११) उत नः सुद्योत्मा जीराश्वो होता मन्द्रः शृणवच्चन्द्ररथः. स नो नेषन्नेषतमैरमूरोऽग्निर्वामं सुवितं वस्यो अच्छ.. (१२) क्या अत्यंत द्योतमान, गतिशील अश्वों वाले, देवों को बुलाने वाले, आनंदपूर्ण स्वर्णरथ के स्वामी, अमोघशक्तिसंपन्न एवं निवासयोग्य अग्नि हमारा आह्वान सुनेंगे? क्या वह हमें सरलता से प्राप्त एवं सबके द्वारा अभिलषित स्वर्ग में हमारे कर्मों द्वारा ले जाएंगे? (१२) अस्ताव्यग्निः शिमीवद्भिरर्कैः साम्राज्याय प्रतरं दधानः. अमी च ये मघवानो वयं च मिहं न सूरो अति निष्टतन्युः.. (१३) अत्यंत प्रकाश धारण करने वाले अग्नि की हमने हव्यप्रदान आदि कर्मों एवं अर्चनासाधक मंत्रों द्वारा स्तुति की है. जिस प्रकार सूर्य बरसने वाले बादल को शब्द युक्त करता है, उसी प्रकार हम सब यजमान इस अग्नि की स्तुति करते हैं. (१३) सूक्त—१४२ देवता—अग्नि समिद्धो अग्न आ वह देवाँ अद्य यतस्रुचे. तन्तुं तनुष्व पूर्व्यं सुतसोमाय दाशुषे.. (१) हे समिद्ध अग्नि! आज स्रुच उठाए हुए यजमान के कल्याण के लिए देवों को बुलाओ. सोम निचोड़ने वाले और यज्ञ में हवि देने वाले यजमान के निमित्त पूर्वकालीन यज्ञ का विस्तार करो. (१) घृतवन्तमुप मासि मधुमन्तं तनूनपात्. यज्ञं विप्रस्य मावतः शशमानस्य दाशुषः.. (२) हे तनूनपात! मेधावी, स्तुतिकर्त्ता एवं हव्यदाता मुझ जैसे यजमान के घृत एवं मधु से संपन्न यज्ञ में आकर अंत तक रहो. (२) ebook converter DEMO Watermarks*