भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 406, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 406

हैं. अग्नि द्वारा भक्षित धान्य एक वर्ष में बढ़ जाता है. कामवर्षी अग्नि एक रूप से मुख एवं जिह्वा द्वारा बढ़ते हैं एवं दूसरे दावाग्नि रूप से सबको अपने से दूर हटाते हुए वनों को जलाते हैं. (२) कृष्णप्रुतौ वेविजे अस्य सक्षिता उभा तरेते अभि मातरा शिशुम्. प्राचाजिह्वं ध्वसयन्तं तृषुच्युतमा साच्यं कुपयं वर्धनं पितुः.. (३) अग्नि की माता के समान काले दोनों काष्ठ जलते हैं एवं समान कार्य करते हुए अग्नि को उस प्रकार प्राप्त करते हैं, जिस प्रकार माता शिशु को. वह शिशु रूप अग्नि पूर्वाभिमुख, जिह्वा वाला, तम विनाशक, शीघ्र उत्पन्न काष्ठ से शनैः-शनैः मिलने वाला, रक्षणीय एवं पालक यजमान का वर्द्धक है. (३) मुमुक्ष्वो३ मनवे मानवस्यते रघुद्रुवः कृष्णसीतास ऊ जुवः. असमना अजिरासो रघुष्यदो वातजूता उप युज्यन्त आशवः.. (४) अग्निज्वालाएं मोक्षदायक, शीघ्रगामिनी, काले मार्ग वाली, शीघ्रकारिणी, भिन्नवर्ण वाली, गमनशील, शीघ्र कंपित होनेवाली, हवा के द्वारा प्रेरित, व्याप्तिपूर्ण, मननशील एवं यजमान के लिए उपयोगी हैं. (४) आदस्य ते ध्वसयन्तो वृथेरते कृष्णमभवं महि वर्पः करिक्रतः. यत्सीं महीमवनिं प्राभि मर्मृशदभिश्वसन्तसनयन्नेति नानदत्.. (५) जिस प्रकार अग्नि सब ओर चेष्टा और शब्द करते हुए तथा अत्यंत गरजते हुए महती भूमि का बार-बार स्पर्श करते हैं, उस समय इनकी चिनगारियां अंधकार का विनाश करती हुई एवं काले रंग के गमन मार्ग को प्रकाश से भरती हुई सब ओर जाती हैं. (५) भूषन्न योऽधि बभ्रूषु नम्रते वृषेव पत्नीरभ्येति रोरुवत्. ओजायमानस्तन्वश्च शुम्भते भीमो न शृङ्गा दविधाव दुर्गृभिः.. (६) अग्नि पीले रंग की लकड़ियों को अलंकृत करते हुए उन में प्रवेश करते हैं. जिस तरह बैल गायों की ओर दौड़ता है, उसी प्रकार अग्नि महान् शब्द करते हुए उन लकड़ियों की ओर चारों तरफ से जाते हैं. वे बलप्रदर्शन सा करते हुए अपनी ज्वालाएं दीप्त करते हैं. जिस प्रकार न पकड़ा जा सकने वाला भयंकर पशु सींग घुमाता है, उसी प्रकार अग्नि ज्वालाओं को चलाते हैं. (६) स संस्तिरो विष्टिरः सं गृभायति जानन्नेव जानतीर्नित्य आ शये. पुनर्वर्धन्ते अपि यन्ति देव्यमन्यद्वर्पः पित्रो कृण्वते सचा.. (७) अग्नि कभी प्रच्छन्न और कभी विस्तृत होकर लकड़ियों में व्याप्त होते हैं. यजमान का अभिप्राय जानने वाले अग्नि अपनी उन ज्वालाओं का आश्रय लेते हैं जो यजमान की ebook converter DEMO Watermarks*