भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 396, कुल 1855 में से

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में क्रूर उपाय अपनाते हो, पर अपने यजमानों का ध्वंस नहीं करते. हे वीर! तुम इक्कीस सेवकों से घिरे रहते हो, इसलिए शत्रु तुम पर आक्रमण नहीं करते. (६) वनोति हि सुन्वन्क्षयं परीणसः सुन्वानो हि ष्मा यजत्यव द्विषो देवानामव द्विषः. सुन्वान इत्सिषासति सहस्रा वाजव्यवृतः. सुन्वानायेन्द्रो ददात्याभुवं रयिं ददात्याभुवम्.. (७) हे इंद्र! सोमरस निचोड़ने वाला यजमान उत्तम घर पाता है. सोमयज्ञकर्त्ता चारों ओर घिरे हुए शत्रुओं को समाप्त करके देवों के विरोधियों को भी नष्ट करता है. वह अन्न का स्वामी बनता है. उस पर कोई शत्रु आक्रमण नहीं करता. वह असीमित संपत्ति प्राप्त करता है. जो व्यक्ति इंद्र के निमित्त सोमयज्ञ करता है, उसे इंद्र चारों ओर अवस्थित एवं अति समृद्ध धन देते हैं. (७) सूक्त—१३४ देवता—वायु आ त्वा जुवो रारहाणा अभि प्रयो वायो वहन्त्विह पूर्वपीतये सोमस्य पूर्वपीतये. ऊर्ध्वा ते अनु सूनृता मनस्तिष्ठतु जानती. नियुत्वता रथेना याहि दावने वायो मखस्य दावने.. (१) हे वायु! तुम्हें शीघ्रगामी एवं शक्तिशाली अश्व सबसे प्रथम सोमपान के लिए यज्ञ में ले आवें. तुम पहले के समान सोमपान करते हो. तुम्हारे मन के अनुकूल एवं सच्ची हमारी स्तुति तुम्हारे गुणों का वर्णन करती है, वह तुम्हें सदा प्रसन्न करती रहे. यज्ञ में दिए हुए द्रव्य को स्वीकारने एवं हमें वांछित फल देने के हेतु रथ से शीघ्र आओ. तुम्हारे रथ में नियुत नामक घोड़े जुते हैं. (१) मन्दन्तु त्वा मन्दिनो वायविन्दवोऽस्मत्क्राणासः सुकृता अभिद्यवो गोभिः क्राणा अभिद्यवः. यद्ध क्राणा इरध्यै दक्षं सचन्त ऊतयः. सध्रीचीना नियुतो दावने धिय उप ब्रुवत ईं धियः.. (२) हे वायु! यज्ञभूमि में पहुंचने के लिए तुम्हें नियुत नामक अश्व मिले हैं. वे अपने कार्य में कुशल, तुमसे अनुराग करने वाले, सर्वदा तुम्हारे साथ रहने वाले हैं एवं तुम्हारी रुचि देखकर चलते हैं. हर्ष उत्पन्न करने वाले, मादक, भली प्रकार रखे गए, उज्ज्वल और मंत्र द्वारा आहूत सोमरस की बूंदें तुम्हें मुदित करें. बुद्धिसंपन्न यजमान तुम्हारे पास जाकर स्तुति करते हैं. (२) वायुर्युङ्क्ते रोहिता वायुररुणा वायू रथे अजिरा धुरि वोळ्हवे वहिष्ठा धुरि वोळ्हवे. प्र बोधया पुरन्धिं जार आ ससतीमिव. प्र चक्षय रोदसी वासयोषसः श्रवसे वासयोषसः.. (३) ebook converter DEMO Watermarks*