भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 390, कुल 1855 में से

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इंद्र ने जिस प्रकार उस गोशाला को खोज लिया, उसी प्रकार सोमरस को भी ढूंढा. अन्न के कारण जल को मेघ ने रोक लिया था. इंद्र ने मेघ का भेदन करके जल बरसाया और धरती पर अन्न का विस्तार किया. (३) दादृहाणो वज्रमिन्द्रो गभस्त्योः क्षत्रेव तिग्ममसनाय सं श्यदहिहत्याय सं श्यत्. संविव्यान ओजसा शवोभिरिन्द्र मज्मना. तष्टेव वृक्षं वनिनो नि वृश्चसि परश्वेव नि वृश्चसि.. (४) इंद्र अपने हाथों में वज्र को दृढ़ता से धारण किए हैं. वज्र तेज है. जैसे मंत्रों की सहायता से जल को प्रभावशाली बनाया जाता है, उसी प्रकार शत्रु पर चलाने के लिए वज्र को और भी तेज किया जाता है. हे इंद्र! जैसे बढ़ई कुल्हाड़ी से वन के वृक्षों को काटता है, उसी प्रकार तुम अपने तेज, शरीर, बल एवं शक्ति से बुद्धि प्राप्त करके हमारे शत्रुओं को छिन्न करते हो. (४) त्वं वृथा नद्य इन्द्र सर्तवेऽच्छा समुद्रमसृजो रथाँ इव वाजयतो रथाँ इव. इत ऊतीरयुञ्जत समानमर्थमक्षितम्. धेनूरिव मनवे विश्वदोहसो जनाय विश्वदोहसः.. (५) हे इंद्र! जिस प्रकार तुमने हमारे यज्ञ में आने के लिए रथ को बनाया है अथवा योद्धा संग्राम में जाने को रथ बनाता है. उसी प्रकार तुमने समुद्र तक पहुंचने के साधन के रूप में नदियों का निर्माण किया है. जिस प्रकार मनु के लिए अथवा किसी समर्थ पुरुष के लिए गाएं सर्वार्थ देने वाली हैं, उसी प्रकार हमारी ओर बहने वाली नदियां एक ही उद्देश्य से जल का संग्रह करती हैं. (५) इमां ते वाचं वसूयन्त आयवो रथं न धीरः स्वपा अतक्षिषुः सुम्नाय त्वामतक्षिषुः. शुम्भन्तो जेन्यं यथा वाजेषु विप्र वाजिनम्. अत्यमिव शवसे सातये धना विश्वा धनानि सातये.. (६) हे इंद्र! जिस प्रकार शोभन कर्म वाले धीर मनुष्य रथ का निर्माण करते हैं, उसी प्रकार हम यजमानों ने धन प्राप्ति की इच्छा से तुम्हारी स्तुति बनाई है एवं अपनी सुख प्राप्ति के लिए तुम्हें प्रसन्न कर लिया है. जिस प्रकार योद्धा विजयी की प्रशंसा करते हैं, उसी प्रकार हे मेधासंपन्न इंद्र! तुम्हारी प्रशंसा की जा रही है. जैसे युद्ध के समय जयशील अश्व प्रशंसित होता है, उसी प्रकार बल, धन की रक्षा एवं समस्त कल्याण पाने के लिए तुम्हारी प्रशंसा हो रही है. (६) भिनत्पुरो नवतिमिन्द्र पूरवे दिवोदासाय महि दाशुषे नृतो वज्रेण दाशुषे नृतो. अतिथिग्वाय शम्बरं गिरेरुग्रो अवाभरत्. महो धनानि दयमान ओजसा विश्वा धनान्योजसा.. (७) हे रण में तीव्रता से इधर-उधर घूमने वाले इंद्र! तुमने यज्ञ में हविदान करने वाले एवं ebook converter DEMO Watermarks*