भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 425, कुल 1855 में से

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विष्णु को हमारे मनोहर स्तोत्र एवं यज्ञकर्म से उत्पन्न शक्ति प्राप्त हो. उन्होंने अत्यंत विस्तृत एवं स्थिर इन तीनों को अकेले ही तीन कदम रखकर नाप लिया था. (३) यस्य त्री पूर्णा मधुना पदान्यक्षीयमाणा स्वधया मदन्ति. य उ त्रिधातु पृथिवीमुत द्यामेको दाधार भुवनानि विश्वा.. (४) जिस विष्णु के मधु से पूर्ण एवं क्षीणतारहित तीन चरणों ने अन्न द्वारा मनुष्यों को प्रसन्न किया है, उन्होंने अकेले ही तीनों धातुओं, धरती, आकाश एवं समस्त लोकों को धारण किया है. (४) तदस्य प्रियमभि पाथो अश्यां नरो यत्र देवयवो मदन्ति. उरुक्रमस्य स हि बन्धुरित्था विष्णोः पदे परमे मध्व उत्सः.. (५) स्वयं को विष्णु रूप में परिवर्तित करके इच्छुक लोग विष्णु के जिस प्रिय एवं सबके द्वारा सेवनीय अविनाशी ब्रह्मलोक में तृप्ति प्राप्त करते हैं, मैं उसी लोक को प्राप्त करूं. वे सबके बंधु हैं एवं उनके स्थान पर अमृत बरसता है. (५) ता वां वास्तून्युश्मसि गमध्यै यत्र गावो भूरिशृङ्गा अयासः. अत्राह तदुरुगायस्य वृष्णः परमं पदमव भाति भूरि.. (६) हे यजमान एवं यजमान पत्नी! हम तुम दोनों के उस लोक में जाने की अभिलाषा करते हैं, जहां बड़े सींगों वाली गाएं निवास करती हैं. अनेक लोगों द्वारा प्रशंसित विष्णु का परम पद सभी प्रकार सुशोभित होता है. (६) सूक्त—१५५ देवता—इंद्र व विष्णु प्र वः पान्तमन्धसो धियायते महे शूराय विष्णवे चार्चत. या सानुनि पर्वतानामदाभ्या महस्तस्थतुरर्वतेव साधुना.. (१) हे अध्वर्यु लोगो! तुम स्तुति चाहने वाले, महावीर इंद्र एवं विष्णु के निमित्त पीने के योग्य सोमरस विशेष रूप से तैयार करो. वे दोनों अपराजेय, महान् एवं पर्वतों के ऊपर इस प्रकार स्थित हैं, जिस प्रकार कोई इच्छित स्थान पर पहुंचने में समर्थ घोड़े पर बैठता है. (१) त्वेषमित्था समरणं शिमीवतोरिन्द्राविष्णू सुतपा वामुरुष्यति. या मर्त्याय प्रतिधीयमानमित्कृशानोरस्तुरसनामुरुष्यथः.. (२) हे इष्टप्रद इंद्र व विष्णु! यज्ञ से बचे हुए सोमरस को पीने वाले यजमान तुम्हारे यज्ञस्थल पर तेजस्वी आगमन का आदर करते हैं. तुम दोनों यजमान के लिए यज्ञफल रूप में देने योग्य अन्न शत्रुपराजयकारी अग्नि से सदा दिलाते हो. (२) ebook converter DEMO Watermarks*