ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 426, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंता ईं वर्धन्ति मह्यस्य पौंस्यं नि मातरा नयति रेतसे भुजे. दधाति पुत्रोऽवरं परं पितुर्नाम तृतीयमधि रोचने दिवः.. (३) यजमान द्वारा दी गई सोमरस रूपी आहुतियां इंद्र की शक्ति को बढ़ाती हैं, वह सब प्राणियों को पुत्रादि उत्पादन में समर्थ करने एवं रक्षा पाने के उद्देश्य से उसी शक्ति को सबकी माता तुल्य धरती और आकाश में रखते हैं. पुत्र का नाम निम्न, पिता का उच्च और तीसरे नाती का नाम प्रकाशयुक्त आकाश में है. (३) तत्तदिदस्य पौंस्यं गृणीमसीनस्य त्रातुरवृकस्य मीळ्हुषः. यः पार्थिवानि त्रिभिरिद्विगामभिरुरु क्रमिष्टोरुगायाय जीवसे.. (४) हम सबके स्वामी, पालक, हिंसक एवं नित्य तरुण विष्णु के पराक्रमों की स्तुति करते हैं. उन्होंने तीनों लोकों की प्रशंसनीय रक्षा के लिए तीन चरण रखकर पृथ्वी आदि समस्त लोकों की परिक्रमा कर ली थी. (४) द्वे इदस्य क्रमणे स्वर्दृशोऽभिख्याय मर्त्यो भुरण्यति. तृतीयमस्य नकिरा दधर्षति वयश्चन पतयन्तः पतत्रिणः.. (५) मनुष्य विभूतियों का वर्णन करते हुए स्वर्गदर्शी विष्णु के दो चरणक्षेपों को ही प्राप्त करते हैं. उनके तीसरे पादक्षेप को मनुष्य क्या आकाश में उड़ने वाले पक्षी भी नहीं पा सकते. (५) चतुर्भिः साकं नवतिं च नामभिश्चक्रं न वृत्तं व्यतीँरवीविपत्. बृहच्छरीरो विमिमान ऋक्वभिर्युवाकुमारः प्रत्येत्याहवम्.. (६) विष्णु ने अपनी विशेष गतियों द्वारा काल के चौरासी भागों को चक्र के समान गोलाकार में घुमा रखा है. वह विशाल शरीर वाले, विविध प्राणियों को विभक्त करने वाले, स्तुतिसंपन्न, तरुण एवं कौमार्यरहित हैं. वे युद्ध में गमन करते हैं. (६) सूक्त—१५६ देवता—विष्णु भवा मित्रो न शेव्यो घृतासुतिर्विभूतद्युम्न एवया उ सप्रथाः. अधा ते विष्णो विदुषा चिदर्ध्यः स्तोमो यज्ञश्च राध्यो हविष्मता.. (१) हे विष्णु! तुम मित्र के समान सुखकर्त्ता, घृत की आहुति के पात्र, अधिक अन्नयुक्त, रक्षणकर्त्ता एवं सबसे अधिक स्वस्थ हो, इसलिए तुम्हारी स्तुतियां ज्ञानी यजमानों द्वारा बार- बार वृद्धि करने योग्य हैं. तुम्हारा यज्ञ हव्यसंपन्न यजमान द्वारा पूर्ण करने योग्य है. (१) यः पूर्वाय वेधसे नवीयसे सुमज्जानये विष्णवे ददाशति. ebook converter DEMO Watermarks*