भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 427, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 427

यो जातमस्य महतो महि ब्रवत्सेदु श्रवोभिर्युज्यं चिदभ्यसत्.. (२) जो लोग नित्य, जगत्कर्त्ता, नवीनतम तथा स्वयं उत्पन्न विष्णु को हव्य देते हैं एवं जो इस महापुरुष के पूज्य जन्म वृत्तांत को कहते हैं, वे ही इनका सामीप्य पाते हैं. (२) तमु स्तोतारः पूर्व्यं यथा विद ऋतस्य गर्भं जनुषा पिपर्तन. आस्य जानन्तो नाम चिद्विवक्तन महस्ते विष्णो सुमतिं भजामहे.. (३) हे स्तोताओ! प्राचीन एवं यज्ञ के गर्भ रूप विष्णु को तुम जैसा जानते हो, उन्हें उसी प्रकार स्वयं प्रसन्न करो एवं उनका नाम जानकर भली-भांति कीर्तन करो. हे महान् विष्णु! हम तुम्हारी स्तुति की सेवा करते हैं. (३) तमस्य राजा वरुणस्तमश्विना क्रतुं सचन्त मारुतस्य वेधसः. दाधार दक्षमूत्तममहर्विदं व्रजं च विष्णुः सखिवाँ अपोर्णुते.. (४) तेजस्वी वरुण एवं अश्विनीकुमार ऋत्विजों वाले यजमान के यज्ञरूप विष्णु की सेवा करते हैं. यजमान आदि की मित्रता से युक्त विष्णु उत्तम एवं स्वर्गोत्पादक बल को धारण करते हैं एवं मेघ को बरसने के लिए आवरणरहित करते हैं. (४) आ यो विवाय सचथाय दैव्य इन्द्राय विष्णुः सुकृते सुकृत्तरः. वेधा अजिन्वत्त्रिषधस्थ आर्यममृतस्य भागे यजमानमाभजत्.. (५) जो विष्णु दिव्य एवं शोभन फलदाताओं में श्रेष्ठ होते हुए उत्तम कर्म करने वाले इंद्र के साथ मिलकर यज्ञ की सहायता करने के लिए आते हैं, वे ही अभिमत फलदाता एवं तीनों लोकों में स्थित विष्णु आने वाले यजमान को प्रसन्न करते थे एवं उसे यज्ञ का भाग देते थे. (५) सूक्त—१५७ देवता—अश्विनीकुमार अबोध्यग्निर्ज्म उदेति सूर्यो व्यु१षाश्चन्द्रा मह्यावो अर्चिषा. आयुक्षातामश्विना यातवे रथं प्रासावीद्देवः सविता जगत्पृथक्.. (१) वेदीरूपी धरती पर अग्नि जगे, सूर्य का उदय हुआ और महती उषा अपने तेज से प्राणियों को प्रसन्न करती हुई अंधकार का विनाश करने लगी. हे अश्विनीकुमारो! यज्ञप्रदेश में आने के लिए अपना रथ तैयार करो. सविता देवता समस्त संसार को अपने-अपने काम में लगावें. (१) यद्युञ्जाथे वृषणमश्विना रथं घृतेन नो मधुना क्षत्रमुक्षतम्. अस्माकं ब्रह्म पृतनासु जिन्वतं वयं धना शूरसाता भजेमहि.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*