भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 429, कुल 1855 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 429

जिगृतमस्मे रेवतीः पुरन्धीः कामप्रेणेव मनसा चरन्ता.. (२) हे वासदाता अश्विनीकुमारो! तुम्हारी अनुग्रह बुद्धि के अनुकूल तुम्हें कौन हव्य दे सकता है? तुम निश्चित यज्ञवेदी पर आने के लिए हमारा बुलावा सुनकर हमें पर्याप्त अन्न देने का निश्चय करके आते हो. हमें बहुत सी गाएं दो जो हमारा शरीर पुष्ट करें, रंभाती हों और दुधारू हों. तुम यजमानों की कामनाएं पूरी करने की इच्छा से घूमते हो. (२) युक्तो ह यद्वां तौग्र्याय पेरुर्वि मध्ये अर्णसो धायि पज्रः. उप वामवः शरणं गमेयं शूरो नाज्म पतयद्भिरश्वैः.. (३) हे अश्विनीकुमारो! तुम्हारा पार पहुंचाने वाला रथ तुग्रपुत्र के उद्धार के लिए अश्वयुक्त था. तुमने उस रथ को अपनी शक्ति से समुद्र के बीच स्थापित किया. जिस प्रकार शूर व्यक्ति युद्ध जीत कर गतिशील अश्वों द्वारा अपने घर में पहुंचता है, उसी प्रकार हम तुम्हारी शरण में आए हैं. (३) उपस्तुतिरौचथ्यमुरुष्येन्मा मामिमे पतत्रिणी वि दुग्धाम्. मा मामेधो दशतयश्चितो धाक् प्र यद्वां बद्धस्त्मनि खादति क्षाम्.. (४) हे अश्विनीकुमारो! तुम्हारे उद्देश्य से की गई स्तुति उचथ्य के पुत्र दीर्घतमा की दाह आदि से रक्षा करे तथा रात एवं दिन मुझे सारहीन न करे. दस बार प्रज्वलित अग्नि मुझे न जलावे. तुम्हारा यह भक्त पाशों से बंधा हुआ धरती पर लोट रहा है. (४) न मा गरन्नद्यो मातृतमा दासा यदीं सुसमुब्धमवाधुः. शिरो यदस्य त्रैतनो वितक्षत्स्वयं दास उरो अंसावपि ग्ध.. (५) माता के समान संसार का हित करने वाली नदियां मुझे न डुबावें. अनार्य दासों ने मुझे अच्छी तरह बंधनों से जकड़ कर नीचे को मुख करके गिराया है. त्रितन नामक दास ने अनेक प्रकार से मेरा सिर काटने का प्रयत्न किया था एवं सीने तथा दोनों कंधों पर भी चोट की थी. (५) दीर्घतमा मामतेयो जुजुर्वान्दशमे युगे. अपामर्थं यतीनां ब्रह्मा भवति सारथिः.. (६) ममता के पुत्र दीर्घतमा अश्विनीकुमारों के प्रभाव से दसवें युग में वृद्ध हुए थे. वे स्वर्गादि कर्मफल पाने वाली प्रजाओं के नेता एवं सारथि के समान निर्देशक हुए. (६) सूक्त—१५९ देवता—द्यावा-पृथ्वी प्र द्यावा यज्ञैः पृथिवी ऋतावृधा मही स्तुषे विदथेषु प्रचेतसा. देवेभिर्ये देवपुत्रे सुदंससेत्था धिया वार्याणि प्रभूषतः.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*