ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 456, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्र तं विवक्मि वक्म्यो य एषां मरुतां महिमा सत्यो अस्ति. सचा यदीं वृषमणा अहंग्युः स्थिरा चिज्जनीर्वहते सुभागाः.. (७) मैं मरुतों की प्रशंसनीय एवं सरलता से समझ में न आने वाली महिमा का वर्णन करता हूं. मरुतों से संबंधित बिजली बरसने की इच्छा वाली, अहंकार युक्त स्थिर सौभाग्यशालिनी एवं जननसमर्थ प्रजाओं को धारण करने वाली है. (७) पान्ति मित्रावरुणाववद्याच्चयत ईमर्यमो अप्रशस्तान्. उत च्यवन्ते अच्युता ध्रुवाणि वावृध ईं मरुतो दातिवारः.. (८) हे मरुतो! मित्र, वरुण और अर्यमा इस यज्ञ की निंदा से रक्षा करते हैं तथा यज्ञ के दोषयुक्त पदार्थों का नाश करते हैं. इन्हीं के कारण समय पर मेघ का अच्युत एवं ध्रुव जल टपक पड़ता है. जल की अधिकता से मित्रादि ही जगत् की रक्षा करते हैं. (८) नही नु वो मरुतो अन्त्यस्मे आरात्ताच्चिच्छवसो अन्तमापुः. ते धृष्णुना शवसा शूशुवांसोऽर्णो न द्वेषो धृषता परि ष्ठूः.. (९) हे मरुद्गण! हम लोगों में से एक भी व्यक्ति दूर रहकर भी तुम्हारे बल की सीमा नहीं जान सका. तुम शत्रुओं को हराने वाले बल से जलराशि के समान बढ़ते हो और अपनी शक्ति से उन्हें हराते हो. (९) वयमद्येन्द्रस्य प्रेष्ठा वयं श्वो वोचेमहि समर्यें. वयं पुरा महि च नो अनु द्यून तन्न ऋभुक्षा नरामनु ष्यात्.. (१०) आज हम इंद्र के अत्यंत प्रिय बनकर यज्ञ में उनकी महिमा का वर्णन करेंगे. हमने प्राचीन काल में इंद्र की महिमा का वर्णन किया था और प्रतिदिन कर रहे हैं. इसलिए महान् इंद्र अन्य लोगों की अपेक्षा हमारे अनुकूल बनें. (१०) एष वः स्तोमो मरुत इयं गीर्मान्दार्यस्य मान्यस्य कारोः. एषा यासीष्ट तन्वे वयां विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (११) हे मरुतो! आदर के योग्य मांदार्य कवि का यह स्तुतिसमूह तुम्हारे लिए है. यह स्तुति इस अभिलाषा से तुम्हारे पास जाती है कि स्तुतिकर्त्ता का शरीर पुष्ट हो. हम भी इस स्तुति द्वारा अन्न, बल एवं दीर्घ आयु प्राप्त करें. (११) सूक्त—१६८ देवता—मरुद्गण यज्ञायज्ञा वः समना तुतुर्वणिर्धियन्धिं वो देवया उ दधिध्वे. आ वोऽर्वाचः सुविताय रोदस्योर्महे ववृत्यामवसे सुवृक्तिभिः.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*