भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 457, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 457

हे मरुतो! सभी यज्ञों के प्रति तुम्हारी समान भावना जान पड़ती है. तुम अपने जल- प्रदान आदि सारे कर्मों को देवों को प्राप्त कराने के लिए धारण करते हो. मैं तुम्हें महान् स्तोत्र के द्वारा अपने सामने इसलिए बुलाता हूं कि तुम धरती और आकाश की भली प्रकार रक्षा कर सको. (१) वव्रासो न यो स्वजाः स्वतवस इषं स्वरभिजायन्त धूतयः. सहस्रियासो अपां नोर्मय आसा गावो वन्द्यासो नोक्षणः.. (२) रूपसंपन्न, स्वयं उत्पन्न एवं कंपनशील मरुद्गण अन्न एवं स्वर्ग आदि के साधन बनकर प्रकट होते हैं. समुद्र की लहरों के समान हजारों उत्तम दुधारू गाएं जिस प्रकार दूध देती हैं, उसी प्रकार वे जल बरसाते हैं. (२) सोमासो न ये सुतास्तृप्तांशवो हृत्सु पीतासो दुवसो नासते. ऐषामंसेषु रम्भिणीव रारभे हस्तेषु खादिश्च कृतिश्च सं दधे.. (३) जिस प्रकार सोमलता पहले जल से सींची जाने पर बढ़ती है एवं बाद में रस निचोड़कर पीने से सेविका के समान मन को आनंद देती है, उसी प्रकार मरुद्गण भी लोगों को प्रसन्न करते हैं. स्त्री के समान आयुध इनके कंधों को चूमते हैं एवं इनके हाथों में हस्तत्राण तथा तलवार सुशोभित है. (३) अव स्वयुक्ता दिव आ वृथा ययुरमर्त्याः कशया चोदत त्मना. अरेणवस्तुविजाता अचुच्युवुर्दृळ्हानि चिन्मरुतो भ्राजदृष्टयः.. (४) मरुद्गण एक-दूसरे से मिले हुए स्वर्ग से नीचे आते हैं. हे मरुतो! अपनी वाणी से हमें प्रेरित करो. तेजस्वी एवं पापरहित मरुद्गण अनेक यज्ञों में जब उपस्थित होते हैं तो स्थिर पर्वत भी कांपने लगते हैं. (४) को वोऽन्तर्मरुत ऋष्टिविद्युतो रेजति त्मना हन्वेव जिह्वया. धन्वच्युत इषां न यामनि पुरुप्रैषा अहन्यो३ नैतशः.. (५) हे आयुधधारी मरुतो! जबड़ों को चलाने वाली जीभ के समान तुम्हारे भीतर रहकर तुम्हें कौन चलाता है? अर्थात् कोई नहीं. जल बरसाने वाला बादल जिस प्रकार दिन में चलता है, उसी प्रकार यजमान अन्न प्राप्त करने के लिए तुम्हें चलाता है. (५) क्व स्विदस्य रजसो महस्परं क्वावरं मरुतो यस्मिन्नायय. यच्च्यावयथ विथुरेव संहितं व्यद्रिणा पतथ त्वेषमर्णवम्.. (६) हे मरुतो! उस विशाल वर्षा जल का आदि और अंत कहां है? जिसे बरसाने के लिए तुम जिस समय ढीली घास के समान जल को बिखराते हो, उस समय तेजस्वी बादल को वज्र द्वारा टुकड़े-टुकड़े कर देते हो. (६) ebook converter DEMO Watermarks*

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