ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 458, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंसातिर्न वोऽमवती स्वर्वती त्वेषा विपाका मरुतः पिपिष्वती. भद्रा वो रातिः पृणतो न दक्षिणा पृथुञ्ज्रयी असुर्येव जञ्जती.. (७) हे मरुतो! तुम्हारे धन के समान ही तुम्हारा दान भी प्रशंसनीय है. इंद्र तुम्हारे दान में सहायता करते हैं. उस में सुख, तेज, फल का परिपाक एवं किसानों का कल्याण है. तुम्हारा दान दाता की दक्षिणा के समान तुरंत फल देने वाला एवं अपनी शक्ति के समान सबको हराने वाला है. (७) प्रति ष्टोभन्ति सिन्धवः पविभ्यो यदभ्रियां वाचमुदीरयन्ति. अव स्मयन्त विद्युततः पृथिव्यां यदि घृतं मरुतः प्रुष्णुवन्ति.. (८) जिस समय नीचे गिरने वाला जल चलता है, उस समय वज्र के शब्द के समान गर्जन करता है. जब मरुद्गण धरती पर जल बरसाते हैं, उस समय बिजली नीचे की ओर मुंह करके प्रकट हो जाती है. (८) असूत पृश्निर्महते रणाय त्वेषमयासां मरुतामनीकम्. ते सप्सरासोऽजनयन्ताभ्वमादित्स्वधामिषिरां पर्यपश्यन्.. (९) पृश्नि ने शीघ्र गति वाले मरुतों के समूह को विशाल युद्ध के लिए जन्म दिया है. समान रूप वाले मरुतों ने जल को उत्पन्न किया. इसके पश्चात् सब लोगों ने अभिलषित अन्न के दर्शन किए. (९) एष वः स्तोमो मरुत इयं गीर्मान्दार्यस्य मान्यस्य कारोः. एषा यासीष्ट तन्वे वयां विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (१०) हे मरुतो! आदर के योग्य मांदार्य कवि का यह स्तुतिसमूह तुम्हारे लिए है. यह स्तुति तुम्हें इस अभिलाषा से प्राप्त होती है कि स्तुतिकर्त्ता का शरीर पुष्ट हो. हम भी इस स्तुति द्वारा अन्न, बल एवं दीर्घ-आयु प्राप्त करें. (१०) सूक्त—१६९ देवता—इंद्र महश्चित्त्वमिन्द्र यत एतान्महश्चिदसि त्यजसो वरूता. स नो वेधो मरुतां चिकित्स्वान्त्सुम्ना वनुष्व तव हि प्रेष्ठा.. (१) हे इंद्र! तुम रक्षा करने वाले महान् मरुतों को नहीं छोड़ते हो, इसलिए तुम निश्चित रूप से महान् हो. हे मरुतों को बुलाने वाले! तुम हमारे प्रति अनुग्रह करके हमें अत्यंत प्रिय सुख प्रदान करो. (१) अयुज्रन्त इन्द्र विश्वकृष्टीर्विदानासो निषिधो मर्त्यत्रा. ebook converter DEMO Watermarks*