ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 459, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंमरुतां पृत्सुतिर्हासमाना स्व॑र्मीळ्हस्य प्रधनस्य सातौ.. (२) हे इंद्र! सब मनुष्यों के स्वामी, मनुष्यों के कल्याण के लिए जल बरसाने वाले एवं विद्वान् मरुद्गण तुम्हारे साथ मिलें. मरुतों की सेना उस युद्ध में विजय पाने के लिए हंसती हुई सदा आगे बढ़ी है जो सुख पाने के हेतु लड़ा जाता है. (२) अम्यक्सा त इन्द्र ऋष्टिरस्मे सनेम्यभ्वं मरुतो जुनन्ति. अग्निश्चिद्धि ष्मातसे शुशुक्वानापो न द्वीपं दधति प्रयांसि.. (३) हे इंद्र! तुम्हारा विशेष आयुध वज्र हमारी उन्नति के लिए बादलों के पास पहुंचता है. मरुत् भी चिरकाल से एकत्र किए हुए जल को धरती पर बरसा देते हैं. अग्नि भी महान् यज्ञ के लिए दीप्त हुए हैं. जिस प्रकार जल द्वीपों को धारण करता है, उसी प्रकार अग्नि हव्य को धारण करता है. (३) त्वं तू न इन्द्र तं रयिं दा ओजिष्ठया दक्षिणयेव रातिम्. स्तुतश्च यास्ते चकनन्त वायोः स्तनं न मध्वः पीपयन्त वाजैः.. (४) हे दाता इंद्र! तुम वह धन हमें दो जो तुम्हारे देने योग्य है, जिस प्रकार यजमान अधिक दक्षिणा देकर ऋत्विज् को प्रसन्न करता है, उसी प्रकार मैं भी तुम्हें प्रसन्न करूंगा. स्तोता शीघ्र वर देने वाले तुम्हारी स्तुति करना चाहते हैं. जिस प्रकार लोग दूध पाने के लिए नारी के स्तन को पुष्ट करते हैं, उसी प्रकार हम तुम्हें अन्न देकर पुष्ट करेंगे. (४) त्वे राय इन्द्र तोशतमाः प्रणेतारः कस्य चिदृतायोः. ते षु णो मरुतो मृळयन्तु ये स्मा पुरा गातूयन्तीव देवाः.. (५) हे इंद्र! तुम्हारा धन परम संतोषदाता एवं यजमान के यज्ञ को पूरा करने वाला है. वे मरुद्गण हमें प्रसन्न करें जो पहले ही यज्ञ में आने के लिए तत्पर हैं. (५) प्रति प्र याहीन्द्र मीळहुषो नॄन्महः पार्थिवे सदने यतस्व. अध यदेषां पृथुबुध्नास एतांस्तीर्थे नार्यः पौंस्यानि तस्थुः.. (६) हे इंद्र! तुम जल बरसाने वाले विश्व के नेता एवं महान् मेघों के सम्मुख जाओ एवं अंतरिक्ष में स्थित रहकर प्रयत्न करो. जिस प्रकार युद्धक्षेत्र में राजा की सेनाएं ठहरती हैं, उसी प्रकार मरुतों के चौड़े खुरों वाले घोड़े स्थित होते हैं. (६) प्रति घोराणामेतानामयासां मरुतां शृण्व आयतामुपब्दिः. ये मर्त्यं पृतनायन्तमूर्मैर्ऋणावानं न पतयन्त सर्गैः.. (७) हे इंद्र! भयानक, काले रंग वाले एवं गमनशील मरुतों के आने का शब्द सुनाई दे रहा है. जिस प्रकार अधम शत्रु को पीड़ा देकर उसका धन छीनते हैं, उसी प्रकार मरुद्गण अपने ebook converter DEMO Watermarks*