भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 460, कुल 1855 में से

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रक्षणोपायों द्वारा अपने शत्रु मेघ को गिरा लेते हैं. (७) त्वं मानेभ्य इन्द्र विश्वजन्या रदा मरुद्भिः शुरुधो गोअग्राः. स्तवानेभिः स्तवसे देव देवैर्विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (८) हे समस्त प्राणियों को जन्म देने वाले इंद्र! तुम मरुतों के साथ आओ और अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए शोकनाशिनी एवं जलधारण करने वाली घटा को विदीर्ण करो. हे देव! स्तुति किए जाते हुए देवगण तुम्हारी स्तुति करते हैं. हमें अन्न, बल और दीर्घ आयु दो. (८) सूक्त—१७० देवता—इंद्र न नूनमस्ति नो श्वः कस्तद्वेद यदद्भुतम्. अन्यस्य चित्तमभि सञ्चरेण्यमुताधीतं वि नश्यति.. (१) इंद्र ने कहा—"आज या कल वास्तव में कुछ नहीं है. जो कार्य विचित्र है, उसे कौन जानता है? अन्य लोगों का मन इतना चंचल होता है कि वे जो भी पढ़ते हैं, सो भूल जाते हैं." (१) किं न इन्द्र जिघांससि भ्रातरो मरुतस्तव. तेभिः कल्पस्व साधुया मा नः समरणे वधीः.. (२) अगस्त्य बोले—"हे इंद्र! तुम क्या मुझे मारना चाहते हो? अपने भ्राता मरुतों के साथ जाकर भली प्रकार यज्ञ के भागों का भोग करो. संग्राम में हमारी हत्या मत करना." (२) किं नो भ्रातरगस्त्य सखा सन्नति मन्यसे. विद्या हि ते यथा मनोऽस्मभ्यमिन्न दित्ससि.. (३) इंद्र बोले—"हे भाई अगस्त्य! तुम मित्र होकर हमारा अपमान क्यों कर रहे हो? तुम्हारे मन में जो बात है, उसे हम जानते हैं. तुम हमें हव्य देना नहीं चाहते हो." (३) अरं कृण्वन्तु वेदिं समग्निमिन्धतां पुरः. तत्रामृतस्य चेतनं यज्ञं ते तनवावहै.. (४) हे ऋत्विजो! तुम वेदी को अलंकृत करो एवं हमारे सामने अग्नि को जलाओ. हम और तुम उस अग्नि में अमृत की सूचना देने वाला यह करेंगे." (४) त्वमीशिषे वसुपते वसूनां त्वं मित्राणां मित्रपते धेष्ठः. इन्द्र त्वं मरुद्भिः सं वदस्वाध प्राशान ऋतुथा हवींषि.. (५) अगस्त्य ने कहा—"हे धन के अधिपति, मित्रों के मित्र, सबके स्वामी एवं आश्रय इंद्र! तुम मरुतों से कहो कि हमारा यज्ञ पूरा हो गया है. तुम ठीक समय पर आकर हमारा हव्य ebook converter DEMO Watermarks*