भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 522, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 522

प्रकार तुमने अपनी मुख्य शक्तियों का प्रदर्शन किया है. हरि नामक घोड़ों से युक्त रथ में बैठे हुए तुमने कुछ शत्रुओं को दल बनाकर और कुछ को अलग-अलग भागने पर विवश कर दिया है. (३) अधा यो विश्वा भुवनाभि मज्मनेशन्कृतप्रवया अभ्यवर्धत. आद्रोदसी ज्योतिषा वह्निरातनोत्सीव्यन्तमांसि दुधिता समव्ययत्.. (४) पुरातन इंद्र ने अपनी शक्ति से भुवनों को हरा कर स्वयं को उनके अधिपति के रूप में प्रसिद्ध किया है. इसके पश्चात् विश्व को धारण करने वाले इंद्र ने धरती और आकाश को व्याप्त किया है. उन्होंने अंधकाररूप राक्षसों को दुःख में डालते हुए सारे संसार को घेर लिया है. (४) स प्राचीनान्यर्वतान्दृंहदोजसाधराचीनमकृणोदपामपः. अधारयत्पृथिवीं विश्वधायसमस्तभ्नान्मायया द्यामवस्रसः.. (५) इंद्र ने अपनी शक्ति द्वारा इधर-उधर जाने वाले पर्वतों को अचल बनाया है, मेघों के जल को नीचे की ओर गिराया है, सबको धारण करने वाली धरती को सहारा दिया है और अपने बुद्धिबल से आकाश को नीचे गिरने से रोका है. (५) सास्मा अरं बाहुभ्यां यं पिताकृणोद्विश्वस्मादा जनुषो वेदसस्परि. येना पृथिव्यां नि क्रिविं शयध्यै वज्रेण हन्त्यवृणक्तुविष्मणिः.. (६) इंद्र इस संसार की रक्षा के लिए पर्याप्त सिद्ध हुए हैं. जिन्होंने सभी जीवों की अपेक्षा ज्ञानरूपी बल अधिक मात्रा में प्राप्त करके अपने हाथों से संसार का निर्माण किया है. परम कीर्तिशाली इंद्र ने इसी ज्ञान के द्वारा क्रिवि नामक असुर को अपने वज्र से मारकर धरती पर सुला दिया था. (६) अमाजूरिव पित्रोः सचा सती समानादा सदसस्त्वामिये भगम्. कृधि प्रकेतमुप मास्या भर दद्धि भागं तन्वो३येन मामहः.. (७) हे इंद्र! मृत्युपर्यन्त माता-पिता के साथ रहने की इच्छा वाली कन्या जिस प्रकार अपने पिता के कुल से भाग मांगती है, उसी प्रकार मैं भी तुमसे धन की याचना कर रहा हूं. उस धन को प्रकट करो, उसकी गणना करो एवं उसे पूर्ण करो. मेरे शरीर के भोग के लिए धन दो. जिससे मैं इन स्तोताओं का सत्कार कर सकूं. (७) भोजं त्वामिन्द्र वयं हुवेम ददिष्ट्वमिन्द्रापांसि वाजान्. अविद्धीन्द्र चित्रया न ऊती कृधि वृषन्निन्द्र वस्यसो नः.. (८) हे इंद्र! तुझ पालनकर्त्ता को हम बुलाते हैं. तुम यज्ञकर्म एवं अन्न के दाता हो. तुम अपनी विचित्र रक्षा शक्तियों द्वारा हमारा उद्धार करो. हे कामवर्षक इंद्र! हमें परम संपत्तिशाली ebook converter DEMO Watermarks*