ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 554, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंयया रध्रं पारयथात्यंहो यया निदो मुञ्चथ वन्दितारम्. अर्वाची सा मरुतो या व ऊतिरो षु वाश्रेव सुमतिर्जिगातु.. (१५) हे मरुद्गण! तुम जिस रक्षाबुद्धि द्वारा यजमान को पापों से दूर करते हो, एवं जिससे स्तोता को शत्रु के हाथ से छुड़ाते हो, तुम्हारी वही रक्षाबुद्धि हमारी ओर ऐसे आए, जैसे रंभाती हुई गाय अपने बछड़े के पास आती है. (१५) सूक्त—३५ देवता—अपांनपात् (अग्नि) उपैमस्सृक्षि वाजयुर्वचस्यां चनो दधीत नाद्यो गिरो मे. अपां नपादाशुहेमा कुवित्स सुपेशसस्करति जोषिषद्धि.. (१) मैं अन्न का अभिलाषी बनकर यह स्तुति बोल रहा हूं. शब्दकारी स्तुति पसंद करने वाले एवं शीघ्रगतिशील जल के नाती अर्थात् अग्नि मुझ स्तोता को अधिक अन्न एवं उत्तम रूप प्रदान करें. (१) इमं स्वस्मै हृद आ सुतष्टं मन्त्रं वोचेम कुविदस्य वेदत्. अपां नपादसुर्यस्य मह्ना विश्वान्यर्यो भुवना जजान.. (२) स्वामी अपांनपात् (जल के नाती अर्थात् अग्नि) को लक्ष्य करके हम अपने हृदय से बनाए हुए मंत्र को भली प्रकार कहेंगे. वह उसे अधिक मात्रा में जानें. उन्होंने शत्रुनाशक बल से सारे भुवनों को बनाया है. (२) समन्या यन्त्युप यन्त्यन्याः समानमूर्वं नद्यः पृणन्ति. तम् शूचिं शुचयो दीदिवांसमपां नपातं परि तस्थुरापः.. (३) धरती में जल पहले से भरा रहता है. दूसरा जल उस में मिलता है. वे जल नदी का रूप धारण करके सागर की बाड़वाग्नि को प्रसन्न करते हैं. शुद्ध जल पवित्र एवं दीप्तियुक्त अपांनपात् को चारों ओर से घेरकर स्थित है. (३) तमस्मेरा युवतयो युवानं मर्मृज्यमानाः परि यन्त्यापः. स शुक्रेभिः शिक्वभी रेवदस्मै दीदायानिध्मो घृतनिर्णिगप्सु.. (४) जल दर्पहीन युवती के समान है. वह युवा के समान अपांनपात् को अत्यधिक अलंकृत करके चारों ओर से घेरता है. ईंधनरहित एवं दीप्तरूप वे अपांनपात् धनरहित अन्न की उत्पत्ति के लिए निर्मल तेज जल के बीच प्रकाशित होते हैं. (४) अस्मै तिस्रो अव्यथ्याय नारीर्देवाय देवीर्दिधिषन्त्यन्नम्. कृता इवोप हि प्रसर्सें अप्सु स पीयूषं धयति पूर्वसूनाम्.. (५) ebook converter DEMO Watermarks*