ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त—३५ देवता—अपांनपात् (अग्नि)
यया रध्रं पारयथात्यंहो यया निदो मुञ्चथ वन्दितारम्. अर्वाची सा मरुतो या व ऊतिरो षु वाश्रेव सुमतिर्जिगातु.. (१५) हे मरुद्गण! तुम जिस रक्षाबुद्धि द्वारा यजमान को पापों से दूर करते हो, एवं जिससे स्तोता को शत्रु के हाथ से छुड़ाते हो, तुम्हारी वही रक्षाबुद्धि हमारी ओर ऐसे आए, जैसे रंभाती हुई गाय अपने बछड़े के पास आती है. (१५) सूक्त—३५ देवता—अपांनपात् (अग्नि) उपैमस्सृक्षि वाजयुर्वचस्यां चनो दधीत नाद्यो गिरो मे. अपां नपादाशुहेमा कुवित्स सुपेशसस्करति जोषिषद्धि.. (१) मैं अन्न का अभिलाषी बनकर यह स्तुति बोल रहा हूं. शब्दकारी स्तुति पसंद करने वाले एवं शीघ्रगतिशील जल के नाती अर्थात् अग्नि मुझ स्तोता को अधिक अन्न एवं उत्तम रूप प्रदान करें. (१) इमं स्वस्मै हृद आ सुतष्टं मन्त्रं वोचेम कुविदस्य वेदत्. अपां नपादसुर्यस्य मह्ना विश्वान्यर्यो भुवना जजान.. (२) स्वामी अपांनपात् (जल के नाती अर्थात् अग्नि) को लक्ष्य करके हम अपने हृदय से बनाए हुए मंत्र को भली प्रकार कहेंगे. वह उसे अधिक मात्रा में जानें. उन्होंने शत्रुनाशक बल से सारे भुवनों को बनाया है. (२) समन्या यन्त्युप यन्त्यन्याः समानमूर्वं नद्यः पृणन्ति. तम् शूचिं शुचयो दीदिवांसमपां नपातं परि तस्थुरापः.. (३) धरती में जल पहले से भरा रहता है. दूसरा जल उस में मिलता है. वे जल नदी का रूप धारण करके सागर की बाड़वाग्नि को प्रसन्न करते हैं. शुद्ध जल पवित्र एवं दीप्तियुक्त अपांनपात् को चारों ओर से घेरकर स्थित है. (३) तमस्मेरा युवतयो युवानं मर्मृज्यमानाः परि यन्त्यापः. स शुक्रेभिः शिक्वभी रेवदस्मै दीदायानिध्मो घृतनिर्णिगप्सु.. (४) जल दर्पहीन युवती के समान है. वह युवा के समान अपांनपात् को अत्यधिक अलंकृत करके चारों ओर से घेरता है. ईंधनरहित एवं दीप्तरूप वे अपांनपात् धनरहित अन्न की उत्पत्ति के लिए निर्मल तेज जल के बीच प्रकाशित होते हैं. (४) अस्मै तिस्रो अव्यथ्याय नारीर्देवाय देवीर्दिधिषन्त्यन्नम्. कृता इवोप हि प्रसर्सें अप्सु स पीयूषं धयति पूर्वसूनाम्.. (५) ebook converter DEMO Watermarks*
इड़ा, सरस्वती एवं भारती नामक तीन दिव्य नेत्रियां व्यथारहित अपांनपात् के लिए अन्न धारण करती हैं एवं जल में उत्पन्न सोम को बढ़ाती हैं. अपांनपात् सर्वप्रथम उत्पन्न जलों के अमृत सोम को पीते हैं. (५) अश्वस्यात्र जनिमास्य च स्वर्दुहो रिषः सम्पृचः पाहि सूरीन्. आमासु पूर्षु परो अप्रमृष्यं नारातयो वि नशन्नानृतानि.. (६) अपांनपात् रूप सागर से उच्चैःश्रवा अश्व एवं इस संसार का जन्म हुआ है. वह अपहर्ता हिंसक के संपर्क से स्तोता की रक्षा करते हैं. दान न करने वाले झूठे लोग अपरिपक्व जल में रहते हुए भी इस अधृष्य देव को नहीं पा सकते. (६) स्व आ दमे सुदुघा यस्य धेनुः स्वधां पीपाय सुभ्वन्नमत्ति. सो अपां नपादूर्जयन्नप्स्व१न्तर्वसुदेयाय विधते वि भाति.. (७) अपांनपात् अपने घर में निवास करते हैं. उनकी गाएं सुख से दुही जा सकती हैं. वह वर्षा का जल बढ़ाते हैं एवं उससे उत्पन्न अन्न का भक्षण करते हैं. वह जल के बीच में शक्तिशाली बनकर यजमान को धन देने के लिए प्रकाशित होते हैं. (७) यो अप्सवा शुचिना दैव्येन ऋतावाजस्र उर्विया विभाति. वया इदन्या भुवनान्यस्य प्र जायन्ते वीरुधश्च प्रजाभिः.. (८) जो अपांनपात् सत्ययुक्त, सदा एक रूप, विस्तीर्ण एवं जल के मध्य पवित्र देवतेज से सुशोभित हैं, सब भुवन उन्हीं की शाखाएं हैं एवं फलफलों से युक्त वनस्पतियां उन्हीं से उत्पन्न हुई हैं. (८) अपां नपादा ह्यस्थादुपस्थं जिह्मानामूर्ध्वो विद्युतं वसानः. तस्य ज्येष्ठं महिमानं वहन्तीर्हिरण्यवर्णाः परि यन्ति यह्वीः.. (९) अपांनपात् कुटिलगति जलों के बीच स्वयं ऊपर उठकर जलते हुए एवं तेजस्वी बादल धारण करते हुए आकाश में स्थित होते हैं. सुनहरे रंग की नदियां उनके महत्त्व को सब जगह फैलाती हुई बहती हैं. (९) हिरण्यरूपः स हिरण्यसन्दृगपां नपात्सेदु हिरण्यवर्णः. हिरण्ययात्परि योनेर्निषद्या हिरण्यदा ददत्यन्नमस्मै.. (१०) हिरण्यरूप, हिरण्यमय इंद्रियों वाले एवं हिरण्यवर्ण अपांनपात् हिरण्यमय स्थान पर बैठकर सुशोभित होते हैं. हिरण्यदाता यजमान उन्हें दान देते हैं. (१०) तदस्यानीकमुत चारु नामापीच्यं वर्धते नप्तुरपाम्. यमिन्धते युवतयः समित्था हिरण्यवर्णं घृतमन्नमस्य.. (११) ebook converter DEMO Watermarks*
अपांनपात् का किरणसमूह रूपी शरीर एवं नाम शोभन है. ये गुण मेघ में छिपकर बढ़ते हैं. युवती रूप जल स्वर्ण के समान तेजस्वी अपांनपात् को आकाश में प्रकाशित करते हैं. इनका जल ही सबका भाग्य है. (११) अस्मै बहूनामवमाय सख्ये यज्ञैर्विधेम नमसा हविर्भिः. सं सानु मार्ज्मि दिधिषामि बिल्मैर्दधाम्यन्नैः परि वन्द ऋग्भिः.. (१२) हम यज्ञों, हव्यों एवं नमस्कारों द्वारा अनेक देवों के आद्य एवं अपने सखा अपांनपात् की सेवा करें. मैं उनका उन्नत स्थान भली प्रकार सुशोभित करता हूं, अन्न एवं लकड़ियों द्वारा उन्हें धारण करता हूं एवं मंत्रों द्वारा उनकी स्तुति करता हूं. (१२) स ईं वृषाजनयत्तत्सु गर्भं स ईं शिशुर्धयतिं तं रिहन्ति. सो अपां नपादनभिम्लातवर्णोऽन्यस्येवेह तन्वा विवेश.. (१३) सेचन करने वाले अपांनपात् ने उन जलों में गर्भ उत्पन्न किया है. वही बालक बनकर उनका जल पीते हैं एवं जल उनको चाटता है. उज्ज्वल वर्ण वाले वे ही अपांनपात् उस संसार में अन्न रूपी शरीर से व्याप्त हुए हैं. (१३) अस्मिन्पदे परमे तस्थिवांसमध्वस्मभिर्विश्वहा दीदिवांसम्. आपो नप्त्रे घृतमन्नं वहन्तीः स्वयमत्कैः परि दीयन्ति यह्वीः.. (१४) उत्तम स्थान में रहने वाले, तेज द्वारा प्रतिदिन दीप्त एवं जल के नाती अर्थात् अग्नि को अन्न धारण करने वाले जलसमूह नित्य बहते हुए घेरे रहते हैं. (१४) अयांसमग्ने सुक्षितिं जनायायांसमु मघवद्भ्यः सुवृक्तिम्. विश्वं तद्भद्रं यदवन्ति देवा बृहद्वदेम विदथे सुवीराः.. (१५) हे उत्तम स्थान में रहने वाले अग्नि! हम पुत्र प्राप्ति के लिए तथा यजमान के कल्याण के लिए तुम्हारे पास स्तोत्र लेकर आए हैं. देवगण जो कल्याण करते हैं, वह हमें प्राप्त हो. हम शोभन पुत्र-पौत्र प्राप्त करके इस यज्ञ में बहुत से स्तोत्र बोलेंगे. (१५) सूक्त—३६ देवता—इंद्र आदि तुभ्यं हिन्वानो वसिष्ट गा अपोऽधुक्षन्त्सीमविभिरद्रिभिर्नरः. पिबेन्द्र स्वाहा प्रहुतं वषट्कृतं होत्रादा सोमं प्रथमो य ईशिषे.. (१) हे इंद्र! तुम्हारे उद्देश्य से प्रस्तुत यह सोम गाय के दूध, दही एवं जल से मिश्रित है. यज्ञ के नेताओं ने इसे पत्थरों एवं भेड़ के बालों से बने दशापवित्रों की सहायता से तैयार किया है. तुम सारे संसार के स्वामी हो, इसलिए स्वाहा एवं वषट् शब्दों के साथ अग्नि में डाले गए ebook converter DEMO Watermarks*
सोमरस का होता के पास से सर्वप्रथम पान करो. (१) यज्ञैः सम्मिश्लाः पृषतीभिरृष्टिभिर्यामञ्छुभ्रासो अञ्जिषु प्रिया उत. आसद्या बर्हिर्भरतस्य सूनवः पोत्रादा सोमं पिबता दिवो नरः.. (२) हे यज्ञों से संयुक्त, पृषती से युक्त रथ पर बैठे हुए, अपने आयुधों से शोभा पाते हुए, आभरणों को प्रेम करने वाले, भरत के पुत्र एवं अंतरिक्ष के नेता मरुद्गण! तुम बिछे हुए कुशों पर बैठकर पोता से सोमपान करो. (२) अमेव नः सुहवा आ हि गन्तन नि बर्हिषि सदतना रणिष्टन. अथा मन्दस्व जुजुषाणो अन्धसस्त्वष्टर्देवेभिर्जनिभिः सुमद्गणः.. (३) हे शोभन आह्वान वाले त्वष्टा! तुम हमारे साथ आओ, कुशों पर बैठो एवं आनंद करो. इसके बाद देवों एवं देवपत्नियों के साथ शोभन समूह बनाकर सोम रूप अन्न का उपयोग करते हुए तृप्त बनो. (३) आ वक्षि देवाँ इह विप्र यक्षि चोशन्होतर्नि षदा योनिषु त्रिषु. प्रति वीहि प्रस्थितं सोम्यं मधु पिबाग्नीध्रात्तव भागस्य तृप्णुहि.. (४) हे बुद्धिमान् अग्नि! इस यज्ञस्थल में देवों को बुलाकर उनके निमित्त यज्ञ करो. हे देवों को बुलाने वाले अग्नि! तुम हमारे हव्य की इच्छा करते हुए तीन स्थानों पर बैठो, उत्तर वेदी पर रखे हुए सोमरूप मधु को स्वीकार करो एवं अग्नीध्र के पास से अपना हिस्सा लेकर तृप्त बनो. (४) एष स्य ते तन्वो नृम्णवर्धनः सह ओजः प्रदिवि बाह्वोर्हितः. तुभ्यं सुतो मघवन्तुभ्यमाभृतस्त्वमस्य ब्राह्मणादा तृपत्पिब.. (५) हे धनस्वामी इंद्र! जो सोम तुम्हारे शरीर में बल बढ़ाता है, जिसके कारण प्राचीन देव के हाथों में शत्रुओं को हराने वाला बल उत्पन्न होता है, वही सोम तुम्हारे लिए निचोड़ा गया है. तुम इस ऋत्विक् ब्राह्मण के पास आकर तृप्तिपूर्वक सोम पिओ. (५) जुषेथां यज्ञं बोधतं हवस्य मे सत्तो होता निविदः पूर्व्या अनु. अच्छा राजाना नम एत्यावृतं प्रशास्त्रादा पिबतं सौम्यं मधु.. (६) हे शोभासंपन्न मित्र एवं वरुण! मेरे इस यज्ञ में आओ, इसका सेवन करो एवं मेरा आह्वान सुनो. यज्ञ में बैठा हुआ होता प्राचीन स्तुतियां बोलता है. ऋत्विजों द्वारा घिरा हुआ अन्न तुम्हारे सामने है. इस मधुर सोमरस को प्रशास्ता के समीप आकर पिओ. (६) सूक्त-३७ देवता—द्रविणोदा आदि ebook converter DEMO Watermarks*
मन्दस्व होत्रादनु जोषमन्धसोऽध्वर्यवः स पूर्णां वष्ट्यासिचम्. तस्मां एतं भरत तद्हशो ददिर्होत्रासोमं द्रविणोदः पिब ऋतुभिः.. (१) हे द्रविणोदा अर्थात् धनप्रिय अग्नि! होता द्वारा किए हुए यज्ञ में अन्न ग्रहण करके प्रसन्न एवं तृप्त बनो. हे अध्वर्युगण! वे पूर्ण आहुति चाहते हैं. इसलिए उन्हें यह सोम दो. सोम के इच्छुक वे द्रविणोदा वांछित फल देते हैं. हे द्रविणोदा! होता के यज्ञ में ऋतुओं के साथ सोमपान करो. (१) यमु पूर्वमहुवे तमिदं हुवे सेदु हव्यो ददिर्यो नाम पत्यते. अध्वर्युभिः प्रस्थितं सोम्यं मधु पोत्रात्सोमं द्रविणोदः पिब ऋतुभिः.. (२) हे द्रविणोदा! हम प्राचीन काल में जिन्हें बुलाते थे, उन्हीं को इस समय भी बुलाते हैं. वे ही बुलाने योग्य, दाता एवं सबके स्वामी हैं. अध्वर्युगण द्वारा तैयार किया गया सोमरूप मधु पोता के यज्ञ में ऋतुओं के साथ पिओ. (२) मेद्यन्तु ते वह्नयो येभिरीयसेऽरिषण्यन्वीळयस्वा वनस्पते. आयूया धृष्णो अभिगूर्या त्वं नेष्ट्रात्सोमं द्रविणोदः पिब ऋतुभिः.. (३) हे द्रविणोदा! वे घोड़े तृप्त हों, जिनके द्वारा तुम आते हो. हे वनों के स्वामी! तुम किसी की हिंसा न करते हुए दृढ़ बनो. हे शत्रुपराभवकारी! तुम नेष्टा के यज्ञ में आकर ऋतुओं के साथ सोम पिओ. (३) अपाद्धोत्रादुत पोत्रादमत्तोत नेष्ट्रादजुषत प्रयो हितम्. तुरीयं पात्रममृक्तममर्त्यं द्रविणोदाः पिबतु द्राविणोदसः.. (४) जिन द्रविणोदा ने याग के होता से सोम पिआ है, वे पोता से प्रसन्न हुए हैं एवं जिन्होंने नेष्टा के यज्ञ में दिया हुआ अन्न खाया है, वे ही द्रविणोदा हव्यदाता ऋत्विज् के मृत्यु निवारक चौथे सोमपात्र को पिएं. (४) अर्वाञ्चमद्य यय्यं नृवाहणं रथं युञ्जाथामिह वां विमोचनम्. पृङ्क्तं हवींषि मधुना हि कं गतमथा सोमं पिबतं वाजिनीवसू.. (५) हे अश्विनीकुमारो! अपने वेगशाली, तुम्हें ढोने वाले एवं इस यज्ञ में पहुंचाने वाले रथ को इस यज्ञ में भली प्रकार जोड़ो, हमारा हव्य मधुयुक्त करो एवं यहां आओ. हे अन्नस्वामियो! हमारा सोमरस पिओ. (५) जोष्यग्ने समिधं जोष्याहुतिं जोषि ब्रह्म जन्यं जोषि सुष्टुतिम्. विश्वेभिर्विश्वॉ ऋतुना वसो मह उशनद्देवाँ उशतः पायया हविः.. (६) हे अग्नि! तुम समिधाओं, आहुतियों, जनकल्याणकारी मंत्रों तथा शोभन स्तुतियों से ebook converter DEMO Watermarks*
युक्त बनो. वे वासरूप अग्नि! तुम्हारी इच्छा करते हुए संपूर्ण देवों की तुम अभिलाषा करो. तुम ऋतुओं एवं सब देवों के साथ सोम पिओ. (६) सूक्त—३८ देवता—सविता उदु ष्य देवः सविता सवाय शश्वत्तमं तदपा वह्निरस्थात्. नूनं देवेभ्यो वि हि धाति रत्नमथाभजद्धीतिहोत्रं स्वस्तौ.. (१) प्रकाशयुक्त एवं विश्व को धारण करने वाले सविता अपना प्रसवरूप कर्म करने के लिए उदय होते हैं. वे देवों को रत्न देते हैं एवं सुंदर यज्ञ करने वाले यजमान को कल्याण का भागी बनाते हैं. (१) विश्वस्य हि श्रुष्टये देव ऊर्ध्वः प्र बाहवा पृथुपाणिः सिसर्ति. आपश्चिदस्य व्रत आ निमृग्रा अयं चिद्वातो रमते परिज्मन्.. (२) लंबी भुजाओं वाले सविता देव संसार के सुख के हेतु उदित होकर हाथ फैलाते हैं. परम पवित्र जल इन्हीं के काम के हेतु बहता है एवं वायु सब जगह फैले हुए आकाश में घूमता है. (२) आशुभिश्चिद्यान्वि मुचाति नूनमरीरमदतमानं चिदेतोः. अह्यर्ष्णां चिन्न्ययाँ अविष्यामनु व्रतं सवितुर्मोक्यगात्.. (३) जाते हुए सविता शीघ्रगामी किरणों द्वारा त्याग दिए जाते हैं. उस समय वे सविता सदा चलने वाले यात्री को रोक देते हैं एवं शत्रुओं के विरुद्ध गमन करने वाले लोगों की इच्छा का नियंत्रण करते हैं. सविता का कार्य समाप्त होने पर रात आती है. (३) पुनः समव्यद्विततं वयन्ती मध्या कर्त्योर्न्यधाच्छक्म धीरः. उत्संहायास्थाद्व्यू१ तूर्दर्धसमतिः सविता देव आगात्.. (४) कपड़े बुनने वाली नारी जिस प्रकार कपड़ा लपेटती है, उसी प्रकार रात बिखरे हुए प्रकाश को समेट लेती है. कार्य करने में समर्थ एवं बुद्धिमान् लोग अपना काम बीच में ही रोक देते हैं. विरामरहित एवं समय का विभाग करने वाले सविता देव के उदित होने पर लोग शय्या छोड़ते हैं. (४) नानौकांसि दुर्यो विश्वायुर्वि तिष्ठते प्रभवः शोको अग्नेः. ज्येष्ठं माता सूनवे भागमाधादन्वस्य केतममिषितं सवित्रा.. (५) अग्निगृह अर्थात् यज्ञशाला में उत्पन्न महान् तेज यजमानों के अलग-अलग घरों तथा संपूर्ण अन्न में समा जाता है. उषा माता ने सविता द्वारा प्रेषित यज्ञ का भाग अपने पुत्र अग्नि ebook converter DEMO Watermarks*
को दिया है. वह भाग उत्तम एवं अग्नि को बढ़ाने वाला है. (५) समाववर्ति विषितो जिगीषुर्विश्वेषां कामश्चरताममाभूत्. शश्वॉँ अपो विकृतं हित्वागादनु व्रतं सवितुर्देव्यस्य.. (६) आकाश में स्थित सविता का व्रत समाप्त होने अर्थात् सूर्य छिप जाने पर जय का इच्छुक योद्धा प्रस्थान करके भी लौट आता है, सभी चर प्राणी घर की अभिलाषा करने लगते हैं एवं कार्य में नित्य लगा हुआ व्यक्ति भी काम अधूरा छोड़कर घर जाता है. (६) त्वया हितमप्यमप्सु भागं धन्वान्वा मृगयसो वि तस्थुः. वनानि विभ्यो नकिरस्य तानि व्रता देवस्य सवितुर्मिनन्ति.. (७) हे सविता! तुम्हारे द्वारा अंतरिक्ष में छिपाया हुआ जो जलभाग है, उसी को जलरहित प्रदेशों में खोज करने वाले पाते हैं. तुमने पक्षियों को वनवृक्ष निवास के लिए दिए हैं. सविता देव के इन कार्यों को कोई नष्ट नहीं करता. (७) याद्राध्यं१ वरुणो योनिमप्यमनिशितं निमिषि जर्भुराणः. विश्वो मार्ताण्डो व्रजमा पशुर्गात्स्थशो जन्मानि सविता व्याकः.. (८) सूर्य छिपने पर अत्यंत गमनशील वरुण सारे गतिशील प्राणियों को मनचाहा, सुखदायक एवं प्राप्त करने योग्य निवास देते हैं. जिस समय सविता सभी प्राणियों को अलग कर देते हैं, उस समय सभी पक्षी एवं पशु अपने-अपने स्थान को चले जाते हैं. (८) न यस्येन्द्रो वरुणो न मित्रो व्रतमर्यमा न मिनन्ति रुद्रः. नारातयस्तमिदं स्वस्ति हुवे देवं सवितारं नमोभिः.. (९) इंद्र, वरुण, मित्र, अर्यमा, रुद्र एवं शत्रु असुर जिसके कर्म को समाप्त नहीं करते, उन्हीं सविता देव को हम अपने कल्याण के लिए नमस्कारों द्वारा बुलाते हैं. (९) भगं धियं वाजयन्तः पुरन्धिं नराशंसो ग्नास्पतिर्नो अव्याः. आये वामस्य सङ्गथे रयीणां प्रिया देवस्य सवितुः स्याम.. (१०) मनुष्यों द्वारा स्तुत्य एवं देवपत्नियों के रक्षक सविता हमारी रक्षा करें. हम भजनीय, ध्यान करने योग्य एवं परम बुद्धिमान् सविता को अधिक बलवान् बनाते हैं. हम धन एवं पशुओं के पाने और एकत्र करने के लिए सविता के प्रिय बनें. (१०) अस्मभ्यं तद्दिवो अद्भ्यः पृथिव्यास्त्वया दत्तं काम्यं राध आ गात्. शं यत्स्तोतृभ्य आपये भवात्युरुशंसाय सवितर्जरित्रे.. (११) हे सविता! तुम्हारे द्वारा हमें दिया हुआ प्रसिद्ध धन स्वर्ग, आकाश और भूलोक से आवें. ebook converter DEMO Watermarks*
जो धन स्तोताओं की संतान को सुख देने वाला है, वही मुझ बहुत स्तुति करने वाले को प्रदान करो. (११) सूक्त—३९ देवता—अश्विनीकुमार ग्रावाणेव तदिदर्थं जरेथे गृध्रेव वृक्षं निधिमन्तमच्छ. ब्रह्माणेव विदथ उक्थशासा दूतेव हव्या जन्या पुरुत्रा.. (१) हे अश्विनीकुमारो! तुम फेंके हुए पत्थर के समान शत्रु को बाधा पहुंचाओ. जिस प्रकार पक्षी फल वाले वृक्ष पर जाते हैं, उसी प्रकार तुम धन वाले यजमान के पास जाओ. तुम मंत्र उच्चारण करने वाले ब्रह्मा एवं जनपद में राजा द्वारा भेजे गए दूतों के समान अनेक लोगों द्वारा बुलाने योग्य हो. (१) प्रातर्यावाणा रथ्येव वीराजेव यमा वरमा सचेथे. मेने इव तन्वा३ शुम्भमाने दम्पतीव क्रतुविदा जनेषु.. (२) हे अश्विनीकुमारो! प्रातःकाल यज्ञ के लिए जाने वाले रथ-स्वामियों के समान वीर, छागों के समान यमल, नारियों के समान शोभन-शरीर, पति-पत्नी के समान साथ रहने वाले एवं सबके यज्ञकर्मों के ज्ञाता तुम दोनों सेवक के पास आओ. (२) शृङ्गेव नः प्रथमा गन्तमर्वाक् छफाविव जर्भुराणा तरोभिः. चक्रवाकेव प्रति वस्तोरुस्रार्वाञ्चा यातं रथ्येव शक्रा.. (३) हे अश्विनीकुमारो! तुम पशुओं के सींगों के समान सभी देवों में प्रमुख हो. घोड़े के खुरों के समान वेग से चलते हुए तुम दोनों हमारे सामने आओ. हे शत्रुनाशक एवं अपने कर्म में समर्थ अश्विनीकुमारो! तुम चकवा-चकवी अथवा दो रथ स्वामियों के समान हमारे पास आओ. (३) नावेव नः पारयतं युगेव नभ्येव न उपधीव प्रधीव. श्वानेव नो अरिषण्या तनूनां खृगलेव विस्रसः पातमस्मान्.. (४) हे अश्विनीकुमारो! नाव जिस प्रकार लोगों को नदी के पार उतार देती है, उसी प्रकार तुम हमें दुःखों से पार पहुंचाओ. जुआ, पहिए की नाभि, अरे और पुठी जिस प्रकार रथ को पार करते हैं, उसी प्रकार तुम हमें पार लगाओ. तुम कुत्तों की तरह हमें शरीरनाश एवं कवच के समान बुढ़ापे से बचाओ. (४) वातेवाजुर्या नद्येव रीतिरक्षी इव चक्षुषा यातमर्वाक्. हस्ताविव तन्वे३शम्भविष्ठा पादेव नो नयतं वस्यो अच्छ.. (५) ebook converter DEMO Watermarks*
हे वायु के समान नाशरहित, नदियों के समान शीघ्रगामी एवं नेत्रों के समान दर्शक अश्विनीकुमारो! हमारे सामने आओ. तुम हाथपैरों के समान हमारे शरीर को सुख देने वाले होकर हमें उत्तम धन की ओर प्रेरित करो. (५) ओष्ठाविव मध्वास्ये वदन्ता स्तनाविव पिप्यतं जीवसे नः. नासेव नस्तन्वो रक्षितारा कर्णाविव सुश्रुता भूतमस्मे.. (६) हे अश्विनीकुमारो! तुम दोनों होंठों के समान मधुर वचन बोलो, दो स्तनों के समान हमारी जीवन रक्षा के लिए दूध पिलाओ, नासिका के दोनों छिद्रों के समान हमारे शरीर-रक्षक बनो एवं कानों के समान हमारी बात सुनो. (६) हस्तेव शक्तिमभि सन्ददी नः क्षामेव नः समजतं रजांसि. इमा गिरो अश्विना युष्मयन्तीः क्ष्णोत्रेणेव स्वधितिं सं शिशीतम्.. (७) हे अश्विनीकुमारो! हाथों के समान हमें सामर्थ्य दो एवं धरती-आकाश के समान जल प्रदान करो. हमारे द्वारा की गई स्तुतियां तुम्हारे समीप जाती हैं. सान जिस प्रकार तलवार को तेज कर देती है, उसी प्रकार तुम हमारी स्तुतियों को तीक्ष्ण बनाओ. (७) एतानि वामश्विना वर्धनानि ब्रह्म स्तोमं गृत्समदासो अक्रन्. तानि नरा जुजुषाणोप यातं बृहद्वदेम विदथे सुवीराः.. (८) हे अश्विनीकुमारो! गृत्समद ऋषि ने ये मंत्र तथा स्तोत्र तुम्हारी उन्नति के लिए रचे हैं. हे नेताओ! तुम उन्हें चाहते हुए आओ. हम शोभन पुत्र-पौत्र प्राप्त करके इस यज्ञ में बहुत सी स्तुतियां बोलेंगे. (८) सूक्त ४० देवता—सोम व पूषा सोमापूषणा जनना रयीणां जनना दिवो जनना पृथिव्याः. जातौ विश्वस्य भुवनस्य गोपौ देवा अकृण्वन्नमृतस्य नाभिम्.. (१) हे सोम एवं पूषा! तुम धन, स्वर्ग एवं धरती के जनक हो. तुम उत्पन्न होते ही संपूर्ण भुवन के रक्षक बने. देवों ने तुम्हें अमरता का केंद्रबिंदु बनाया. (१) इमौ देवौ जायमानौ जुषन्तेमौ तमांसि गूहतामजुष्टा. आभ्यामिन्द्रः पक्वमामास्वन्तः सोमापूषभ्यां जनदुस्रियासु.. (२) सब देवों ने सोम एवं पूषादेव के जन्म लेते ही उनकी सेवा की. ये दोनों असेव्य अंधकार का नाश करते हैं. इंद्र इनके साथ मिलकर गायों के थन में दूध उत्पन्न करते हैं. (२) सोमापूषणा रजसो विमानं सप्तचक्रं रथमविश्वमिन्वम्. ebook converter DEMO Watermarks*
विपूवृतं मनसा युज्यमानं तं जिन्वथो वृषणा पञ्चरश्मिम्.. (३) हे कामवर्षक सोम एवं पूषा! तुम संसार के परिच्छेदक, सात पहियों वाले, संसार द्वारा अविभाज्य, सब जगह गमनशील, इच्छा करते ही चलने वाले एवं पांच रश्मियों वाले रथ हमारी ओर हांकते हो. (३) दिव्यन्यः सदनं चक्र उच्चा पृथिव्यामन्यो अध्यन्तरिक्षे. तावस्मभ्यं पुरुवारं पुरुक्षुं रायस्पोषं वि ष्यतां नाभिमस्मे.. (४) हे सोम व पूषा! तुम में से एक ने उन्नत स्वर्गलोक को अपना निवास बनाया है, दूसरा ओषधि रूप से धरती तथा चंद्र रूप से आकाश में रहता है. तुम हमारे हिस्से का पशुरूपी धन हमें दो, जो अनेक लोगों द्वारा वरणीय एवं अधिक कीर्तिसंपन्न है. (४) विश्वान्यन्यो भुवना जजान विश्वमन्यो अभिचक्षाण एति. सोमापूषणाववतं धियं मे युवाभ्यां विश्वाः पृतना जयेम.. (५) हे सोम और पूषा! तुम में से एक ने समस्त प्राणियों को उत्पन्न किया है, दूसरा सबका निरीक्षण करता हुआ जाता है. तुम हमारे यज्ञकर्म की रक्षा करो. तुम्हारी सहायता से हम शत्रुओं की पूरी सेना को जीत लें. (५) धियं पूषा जिन्वतु विश्वमिन्वो रयिं सोमो रयिपतिर्दधातु. अवतु देव्यदितिरनर्वा बृहद्वदेम विदथे सुवीराः.. (६) विश्व को प्रसन्न करने वाले पूषा हमारे कर्मों को पूर्ण करें. धन के स्वामी सोम हमें धन दें. विरोधरहित अदिति देवी हमारी रक्षा करें. उत्तम पुत्र-पौत्र प्राप्त करके हम इस यज्ञ में बहुत सी स्तुतियां बोलेंगे. (६) सूक्त ४१ देवता—इंद्र, वायु आदि वायो ये ते सहस्रिणो रथासस्तेभिरा गहि. नियुत्वान्सोमपीतये.. (१) हे वायु! तुम्हारे पास जो हजारों रथ हैं, उनके द्वारा नियुतगणों के साथ सोमरस पीने के लिए आओ. (१) नियुत्वान्वायवा गह्ययं शुक्नो अयामि ते. गन्तासि सुन्वतो गृहम्.. (२) हे वायु! नियुतों सहित आओ. यह दीप्तिमान् सोम तुम्हारे लिए है. तुम सोमरस निचोड़ने वाले यजमान के घर जाते हो. (२) शुक्रस्याद्य गवाशिर इन्द्रवायू नियुत्वतः. आ यातं पिबतं नरा.. (३) ebook converter DEMO Watermarks*
हे नेता इंद्र और वायु! तुम आज नियुतं के साथ गव्य मिले सोम पीने के लिए आओ. (३) अयं वां मित्रावरुणा सुतः सोम ऋतावृधा. ममेदिह श्रुतं हवम्.. (४) हे यज्ञवर्द्धक मित्र एवं वरुण! तुम्हारे लिए यह सोम निचोड़ा गया है. तुम हमारी पुकार सुनो. (४) राजानावनभिद्रुहा ध्रुवे सदस्युत्तमे. सहस्रस्थूण आसाते.. (५) शत्रुरहित एवं दीप्तिमान् मित्र व वरुण! ध्रुव, ऊंचे और हजार खंभों वाले इस स्थान में बैठो. (५) ता सम्राजा घृतासुती आदित्या दानुनस्पती. सचेते अनवह्वरम्.. (६) सबके शासक, घृत रूपी अन्न का भोजन करने वाले, अदितिपुत्र व दानशील मित्र तथा वरुण यजमान की सेवा करते हैं. (६) गोमदू षु नासत्याश्वावद्यातामश्विना. वर्ती रुद्रा नृपाय्यम्.. (७) हे सत्यवादी अश्विनीकुमारो एवं रुद्रो! यज्ञ के नेता देवों के पीने योग्य सोम को गायों तथा अश्वों से युक्त करके अपने मार्ग से लाओ. (७) न यत्परो नान्तर आदधर्षद्वृषण्वसू. दुःशंसो मर्त्यो रिपुः.. (८) हे धनवर्षक अश्विनीकुमारो! हमें ऐसा धन दो, जिसे न दूरवर्ती और न समीपवर्ती शत्रु मनुष्य चुरा सके. (८) ता न आ वोळ्हमश्विना रयिं पिशङ्कसन्दृशम्. धिष्ण्या वरिवोविदम्.. (९) हे जानने योग्य अश्विनीकुमारो! तुम हमारे पास नाना रूप एवं धनलाभकारी पशु लाओ. (९) इन्द्रो अङ्ग महद्भयमभी षदप चुच्यवत्. स हि स्थिरो विचर्षणिः.. (१०) इंद्र पराभवकारी महान् भय दूर करते हैं, इसलिए वे अचंचल एवं विश्वद्रष्टा हैं. (१०) इन्द्रश्च मृळयाति नो न नः पश्चादघं नशत्. भद्रं भवाति नः पुरः.. (११) इंद्र यदि हमें सुखी रखेंगे तो पाप हमारे समीप नहीं आएगा एवं हमारे सम्मुख कल्याण उपस्थित होगा. (११) इन्द्र आशाभ्यस्परि सर्वाभ्यो अभयं करत्. जेता शत्रून्विचर्षणिः.. (१२) ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त—४२ देवता—कपिंजलरूपी इंद्र
आ वामुपस्थमद्रुहा देवाः सीदन्तु यज्ञियाः. इहाद्य सोमपीतये.. (२१) हे शत्रुरहित धरती और आकाश! यज्ञ योग्य देवता आज सोमपान के लिए तुम्हारे पास बैठें. (२१) सूक्त—४२ देवता—कपिंजलरूपी इंद्र कनिक्रदज्जनुषं प्रब्रुवाण इयर्ति वाचमरितेव नावम्. सुमङ्गलश्च शकुने भवासि मा त्वा का चिदभिभा विश्व्या विदत्.. (१) बार-बार बोलकर भविष्य की बात बताता हुआ कपिंजल वाणी को उसी प्रकार प्रेरित करता है, जिस प्रकार मल्लाह नाव को आगे बढ़ाता है. हे पक्षी! तुम अति कल्याणकारी बनो. किसी भी प्रकार पराजय सभी दिशाओं से तुम्हारे समीप न आवे. (१) मा त्वा श्येन उद्धीन्मा सुपर्णो मा त्वा विददिषुमान्वीरो अस्ता. पित्र्यामनु प्रदिशं कनिक्रदत्सुमङ्गलो भद्रवादी वदेह.. (२) हे शकुनि! बाज अथवा गरुड़ तुम्हें न मारे. धनुर्धारी एवं बाण फेंकने वाला वीर भी तुम्हें प्राप्त न करे. दक्षिण दिशा में बार-बार बोलते हुए एवं मंगलकारक बनकर हमारे लिए प्यारी बात कहो. (२) अव क्रन्द दक्षिणतो गृहाणां सुमङ्गलो भद्रवादी शकुन्ते. मा नः स्तेन ईशत माघशंसो बृहद्वदेम विदथे सुवीराः.. (३) हे कपिंजल पक्षी! तुम कल्याणसूचक एवं प्रियवादी बनकर हमारे घरों की दक्षिण दिशा में बोलो. चोर एवं पाप की बात कहने वाले लोग हम पर अधिकार न करें. हम शोभन पुत्र- पौत्र प्राप्त करके इस यज्ञ में बहुत सी स्तुतियां बोलेंगे. (३) सूक्त—४३ देवता—कपिंजलरूपी इंद्र प्रदाक्षिणिदभि गृणन्ति कारवो वयो वदन्त ऋतुथा शकुन्तयः. उभे वाचौ वदति सामगा इव गायत्रं च त्रैष्टुभं चानु राजति.. (१) कपिंजल पक्षी समय-समय पर अन्न की सूचना देते हुए स्तोता के समान प्रदक्षिणा करते हुए शब्द करें. सामगायन करने वाला जिस प्रकार गायत्री एवं त्रिष्टुप् दोनों छंदों को बोलता है, उसी प्रकार कपिंजल पक्षी भी दोनों प्रकार के वाक्य बोलकर सुनने वालों को प्रसन्न करता है. (१) उद्गातेव शकुने साम गायसि ब्रह्मपुत्र इव सवनेषु शंससि. ebook converter DEMO Watermarks*
वृषेव वाजी शिशुमतीरपीत्या सर्वतो नः शकुने भद्रमा वद विश्वतो नः शकुने पुण्यमा वद.. (२) हे पक्षी! तुम सामगान करने वाले उद्गाता की तरह गाओ एवं यज्ञ में ब्रह्मपुत्र ऋत्विक् के समान शब्द करो. गर्भाधान करने में समर्थ घोड़ा घोड़ी के पास जाकर जिस प्रकार हिनहिनाता है, तुम भी उसी प्रकार का शब्द करो. तुम हमारे लिए सभी जगह कल्याणकारी एवं पुण्यकारी शब्द बोलो. (२) आवदंस्त्वं शकुने भद्रमा वद तूष्णीमासीनः सुमतिं चिकिद्धि नः. यदुत्पतन्वदसि कर्करिर्यथा बृहद्वदेम विदथे सुवीराः.. (३) हे कपिंजल पक्षी! तुम शब्द करते समय हमारे लिए कल्याण की सूचना दो एवं मौन रहते समय हमारे प्रति सुमति की इच्छा करो. तुम उड़ते समय कर्करी बाजे के समान शब्द करते हो. हम शोभन पुत्र-पौत्र प्राप्त करके इस यज्ञ में बहुत सी स्तुतियां बोलेंगे. (३)
तृतीय मंडल सूक्त—१ देवता—अग्नि सोमस्य मा तवसं वक्ष्यग्ने वहिं चकर्थ विदथे यजध्यै. देवाँ अच्छा दीद्यद्युञ्जे अद्रिं शमाये अग्ने तन्वं जुषस्व.. (१) हे अग्नि! यज्ञ करने के निमित्त तुमने मुझे सोमरस का वाहक बनाया है, इसलिए मुझे शक्तिशाली बनाने की इच्छा करो. प्रकाशयुक्त होता हुआ मैं देवों को लक्ष्य करके सोमरस निचोड़ने के लिए पत्थर उठाता हूं एवं स्तोत्र बोलता हूं. तुम मेरे शरीर की रक्षा करो. (१) प्राञ्चं यज्ञं चकृम वर्धतां गीः समिद्भिरग्निं नमसा दुवस्यन्. दिवः शशासुर्विदथा कवीनां गृत्साय चित्तवसे गातुमीषुः.. (२) हे अग्नि! तुमने पूर्वकाल में यज्ञ किया है. हमारे स्तुति वचनों की वृद्धि हो. मेरे आत्मीय लोग समिधाओं एवं हव्य द्वारा अग्नि की सेवा करें. देवों ने स्वर्ग से आकर स्तोताओं को ज्ञान दिया है. वे स्तुति की हुई एवं प्रज्वलित अग्नि की स्तुति करना चाहते हैं. (२) मयो दधे मेधिरः पूतदक्षो दिवः सुबन्धुर्जनुषा पृथिव्याः. अविन्दन्नु दर्शतमप्स्व१न्तर्देवासो अग्निमपसि स्वसॄणाम्.. (३) मेधावी, शुद्धबलयुक्त, जन्म से ही उत्तम बंधु, स्वर्ग का सुख विधान करने वाले एवं सुंदर अग्नि को हमने बहने वाली नदियों के जल के भीतर से यज्ञकार्य के हेतु प्राप्त किया है. (३) अवध॑यन्त्सुभगं सप्त यह्वीः श्वेतं जज्ञानमरुषं महित्वा. शिशुं न जातमभ्यारुरश्वा देवासो अग्निं जनिमन्वपुष्यन्.. (४) शोभन धन वाले, उज्ज्वल एवं महत्त्व से प्रकाशित जल में स्थित अग्नि को सात नदियों ने बढ़ाया. घोड़ी जिस प्रकार तुरंत जन्मे बछड़े के पास जाती है, उसी प्रकार नदियां उत्पन्न अग्नि के समीप गईं. देवों ने अग्नि को उत्पन्न होते ही प्रकाशमान किया. (४) शुक्रेभिरङ्गै रज आततन्वान् क्रतुं पुनानः कविभिः पवित्रैः. शोचिर्वसानः पर्यायुरपां श्रियो मिमीते बृहतीरनूनाः.. (५) ebook converter DEMO Watermarks*
अग्नि उज्ज्वल तेजों के द्वारा अंतरिक्ष को व्याप्त करते हुए यजमान को स्तुति योग्य एवं पवित्र तेजों से शुद्ध करते हैं तथा दीप्ति को धारण करके यजमान को धन एवं सारी संपत्तियां देते हैं. (५) वव्राजा सीमनदतीरदब्धा दिवो यह्वीरवसाना अनग्नाः. सना अत्र युवतयः सयोनीरेकं गर्भं दधिरे सप्त वाणीः.. (६) जल का भक्षण न करते हुए एवं जल के द्वारा नष्ट होते हुए अंतरिक्ष की संतान के समान एवं वस्त्र ढके न होने पर भी जल से घिरे होने के कारण अग्नि नंगे नहीं हैं. सनातन, नित्य तरुण एवं एक स्थान से उत्पन्न सात नदियों ने अग्नि को गर्भ के समान धारण किया. (६) स्तीर्णं अस्य संहतो विश्वरूपा घृतस्य योनौ स्रवथे मधूनाम्. अस्थुरत्र धेनवः पिन्वमाना मही दस्मस्य मातरा समीची.. (७) अनेक रूप वाली एवं सब जगह फैली हुई अग्नि की किरणें जलवर्षा के पश्चात् जल के उत्पत्ति स्थान आकाश में एकत्रित रहती हैं. सबको प्रसन्न करने वाली जलरूपी गाएं इसी अग्नि में रहती हैं. विशाल धरती और आकाश सुंदर अग्नि के माता-पिता हैं. (७) बभ्राणः सूनो सहसो व्यद्यौद्दधानः शुक्रा रभसा वपूंषि. श्चोतन्ति धारा मधुनो घृतस्य वृषा यत्र वावृधे काव्येन.. (८) हे बल के पुत्र अग्नि! तुम सबके द्वारा धारण किए जाकर भास्कर एवं वेग वाली किरणें धारण करते हुए प्रकाशित होते हो. अग्नि जिस समय स्तोत्र के कारण बढ़ते हैं, उस समय मीठे जल की धाराएं गिरती हैं. (८) पितुश्चिद्गुधर्जनुषा विवेद व्यस्य धारा असृजद्वि धेनाः. गुहा चरन्तं सखिभिः शिवेभिर्दिवो यह्वीभिर्न गुहा बभूव.. (९) जन्म लेते ही अग्नि ने अपने पिता अंतरिक्ष के स्तनों में स्थित जल को जान लिया. वहां से जलधाराओं को बहाया एवं मध्यमा वाणियों को विसर्जित किया. अपने कल्याणकारी वायुरूपी बंधुओं के साथ स्थित होकर आकाश के संतानरूपी जलों के साथ गुफा में रहने वाली अग्नि को कोई प्राप्त नहीं कर सका. (९) पितुश्च गर्भं जनितुश्च बभ्रे पूर्वीरिको अधयत्पीप्यानाः. वृष्णे सपत्नी शुचये सबन्धू उभे अस्मै मनुष्ये३ नि पाहि.. (१०) अग्नि अपने पिता अंतरिक्ष का गर्भ अर्थात् जल एवं अपने जन्मदाता ब्राह्मण का गर्भ अर्थात् लोकपोषण धारण करते हैं. अकेले अग्नि अनेक रूप में वृद्धि प्राप्त ओषधियों का भक्षण करते हैं. परस्पर सौत एवं मनुष्यों का कल्याण करने वाले धरती-आकाश कामवर्षक ebook converter DEMO Watermarks*
अग्नि के बंधु हैं. हे अग्नि! तुम इन दोनों की रक्षा करो. (१०) उरौ महाँ अनिबाधे ववर्धापो अग्निं यशसः सं हि पूर्वीः. ऋतस्य योनावशयद्दमूना जामीनामग्निरपसि स्वसॄणाम्.. (११) महान् अग्नि बाधारहित एवं विशाल आकाश में बढ़ते हैं, क्योंकि अनेक प्रकार के अन्नों से युक्त जल अग्नि को भली प्रकार बढ़ाता है. जल के उत्पत्ति स्थान आकाश में स्थित अग्नि नदीरूपी बहिनों के जल में शांतचित्त से सोते हैं. (११) अक्रो न बभ्रिः समिथे महीनां दिदृक्षेयः सूनवे भाऋजीकः. उदुस्रिया जनिता यो जनानापां गर्भो नृतमो यह्वो अग्निः.. (१२) संपूर्ण लोक के जनक, जल के गर्भ के समान, मानवों के परम रक्षक, महान्, शत्रुओं पर आक्रमण करने वाले, संग्राम में अपनी विशाल सेनाओं के रक्षक, परम सुंदर एवं अपनी ज्योति से प्रकाशमान अग्नि ने यजमान के लिए जल पैदा किया है. (१२) अपां गर्भं दर्शतमोषधीनां वना जजान सुभगा विरूपम्. देवासश्चिन्मनसा सं हि जग्मुः पनिष्ठं जातं तवसं दुवस्यन्.. (१३) सौभाग्यशाली एवं सुखदाता अरणि ने दर्शनीय एवं भांति-भांति की ओषधियों के गर्भ के समान अग्नि को जन्म दिया. समस्त देव स्तुतियोग्य, उन्नत एवं तुरंत उत्पन्न अग्नि के समीप स्तुति करते हुए गए एवं उन्होंने अग्नि की सेवा की. (१३) बृहन्त इङ्ग्रानवो भाऋजीकमग्निं सचन्त विद्युतो न शुक्राः. गुहेव वृद्धं सदसि स्वे अन्तरपार ऊर्वे अमृतं दुहानाः.. (१४) गहरे सागर के मध्य अमृतरूपी जल को बिखेरते हुए महान् सूर्य की चमकती हुई बिजलियों के समान सूर्यगण अपने निवासस्थान अंतरिक्ष में बढ़ते एवं अपनी चमक से जलती हुई अग्नि का सहारा लेते हैं. अंतरिक्ष गुहा के समान है. (१४) ईळे च त्वा यजमानो हविर्भीरीळे सखित्वं सुमतिं निकामः. देवैरवो मिमीहि सं जरित्रे रक्षा च नो दम्येभिरनीकैः.. (१५) मैं यजमान हव्यों के द्वारा तुम्हारी स्तुति करता हूं एवं धर्मविषयक उत्तमबुद्धि पाने की इच्छा से तुम्हारे साथ मित्रता की याचना करता हूं. देवों के साथ मेरे पशुओं एवं मुझ स्तोता की अपने अदमनीय तेज द्वारा रक्षा करो. (१५) उपक्षेत्रारस्तव सुप्रणीतेऽग्ने विश्वानि धन्या दधानाः. सुरेतसा शवसा तुञ्जमाना अभि ष्याम पृतनायूँरदेवान्.. (१६) eBook converter DEMO Watermarks*
हे उत्तम नेता अग्नि! तुम्हारे समीप जाते हुए हम पशु आदि धनों के कारण रूप यज्ञों को करते हुए तुम्हें हव्य देते हैं एवं शोभन बल से युक्त अन्न देकर देवविरोधी शत्रुओं को पराजित करते हैं. (१६) आ देवानामभवः केतुरग्ने मन्द्रो विश्वानि काव्यानि विद्वान्. प्रति मर्ताँ अवासयो दमूना अनु देवान्रथिरो यासि साधन्.. (१७) हे रथी अग्नि! तुम यज्ञ में देवों के प्रशंसनीय केतु, सभी स्तोत्रों के जानने वाले, सभी मनुष्यों को उनके घरों में बसाने वाले एवं देवों का कार्य सिद्ध करके उनके पीछे चलने वाले हो. (१७) नि दुरोणे अमृतो मर्त्यानां राजा ससाद विदथानि साधन्. घृतप्रतीक उर्विया व्यद्यौदग्निर्विश्वानि काव्यानि विद्वान्.. (१८) दीप्तिमान् एवं नित्य अग्नि यज्ञों को पूर्ण करते हुए होताओं के घर में स्थित होते हैं. घृत के कारण बढ़ने वाले अग्नि सभी बातों को जानते एवं प्रकाशित होते हैं. (१८) आ नो गहि सख्येभिः शिवेभिर्महान्महीभिरूतिभिः सरण्यन्. अस्मे रयिं बहुलं सन्तरुत्रं सुवाचं भागं यशसं कृधी नः.. (१९) हे सब जगह जाने के इच्छुक महान् अग्नि! कल्याणकारी सख्य एवं रक्षा के विशाल साधन लेकर हमारे पास आओ एवं विस्तीर्ण, उपद्रवों से रहित, शोभन वचन युक्त, सुभग तथा यशस्वी बनाओ. (१९) एता ते अग्ने जनिमा सनानि प्र पूर्व्याय नूतनानि वोचम्. महान्ति वृष्णे सवना कृतेमा जन्मञ्जन्मन् निहितो जातवेदाः.. (२०) हे पुरातन अग्नि! हम तुम्हें लक्ष्य करके सनातन एवं नवीन स्तुतियों को पढ़ते हैं. सब प्राणियों को जानने वाले एवं मनुष्यों के बीच स्थित कामवर्षक अग्नि को लक्ष्य करके हमने ये यज्ञ किए हैं. (२०) जन्मञ्जन्मन् निहितो जातवेदा विश्वामित्रेभिरिध्यते अजस्रः. तस्य वयं सुमतौ यज्ञियस्यापि भद्रे सौमनसे स्याम.. (२१) सभी मनुष्यों के बीच स्थित तथा सभी प्राणियों को जानने वाले अग्नि को विश्वामित्र के गोत्र वाले ऋषि सदैव प्रज्वलित रखते हैं. हम उन यज्ञ योग्य अग्नि की कृपा प्राप्त करके उत्तम कल्याण पाएंगे. (२१) इमं यज्ञं सहसावन् त्वं नो देवत्रा धेहि सुक्रतो रराणः. प्र यंसि होतर्बृहतीरिषो नोऽग्ने महि द्रविणमा यजस्व.. (२२) ebook converter DEMO Watermarks*
हे शक्तिशाली एवं उत्तम कर्म वाले अग्नि! तुम सदैव रमण करते हुए हमारे यज्ञ को देवों के समीप पहुंचाओ. हे देवों के होता अग्नि! हमें अन्न एवं अधिक धन दो. (२२) इळामग्ने पुरुदंसं सनिं गोः शश्वत्तमं हवमानाय साध. स्यान्नः सूनुस्तनयो विजावाग्ने सा ते सुमतिर्भूत्वस्मे.. (२३) हे अग्नि! मुझ होता को मेरे कर्मों के अनुकूल गाय प्रदान करने वाली स्थायी भूमि दो. मेरा पुत्र संतान का विस्तार करने वाला हो. मेरे प्रति तुम्हारी उत्तम बुद्धि हो. (२३) सूक्त—२ देवता—वैश्वानर अग्नि वैश्वानराय धिषणामृतावृधे घृतं न पूतमग्नये जनामति. द्विता होतारं मनुषश्च वाघतो धिया रथं न कुलिशः समृण्वति.. (१) हम जल बढ़ाने वाले वैश्वानर को लक्ष्य करके युद्ध के समान आनंदप्रद स्तुतियां करते हैं. जैसे वसूला रथ को बनाता है, उसी प्रकार यजमान और ऋत्विज् गार्हपत्य एवं आह्वानीय दो प्रकार के देव-आह्वाता अग्नि का मैं संस्कार करता हूं. (१) स रोचयज्जन्मुषा रोदसी उभे स मात्रोरभवत्पुत्र ईड्यः. हव्यवाळग्निरजरश्चनोहितो दूळभो विशामतिथिर्विभावसुः.. (२) अग्नि ने उत्पन्न होते ही धरती और आकाश को प्रकाशित किया एवं अपने माता-पिता के प्रशंसनीय पुत्र बने. हव्य वहन करने वाले, यजमान को अन्न देने वाले, अधृष्य एवं प्रभावयुक्त अग्नि इस प्रकार पूज्य हैं जैसे मनुष्य अतिथि की पूजा करते हैं. (२) क्रत्वा दक्षस्य तरुषो विधर्मणि देवासो अग्निं जनयन्त चित्तिभिः. रुरुचानं भानुना ज्योतिषा महामत्यं न वाजं सनिष्यन्नुप ब्रुवे.. (३) ज्ञानयुक्त देवगण ने व्यसनों से छुड़ाने वाले बल द्वारा यज्ञ में अग्नि को उत्पन्न किया. मैं अन्न की अभिलाषा से भासमान ज्योति द्वारा चमकने वाले महान् अग्नि की स्तुति भारवाही अश्व के समान करता हूं. (३) आ मन्द्रस्य सनिष्यन्तो वरेण्यं वृणीमहे अह्रयं वाजमृग्मियम्. रातिं भृगूणामुशिजं कविक्रतुमग्निं राजन्तं दिव्येन शोचिषा.. (४) मैं स्तुति योग्य वैश्वानर अग्नि से संबंधित, उत्तम, लज्जा न उत्पन्न करने वाले एवं प्रशंसनीय अन्न की अभिलाषा करता हुआ भृगुवंशी ऋषियों की इच्छा पूर्ण करने वाले, सबके प्रिय, क्रांतदर्शी एवं दिव्य ज्योति से सुशोभित अग्नि की सेवा करता हूं. (४) अग्निं सुम्नाय दधिरे पुरो जना वाजश्रवसमिह वृक्तबर्हिषः. ebook converter DEMO Watermarks*
यतस्रुचः सुरुचं विश्वदेव्यं रुद्रं यज्ञानां साधदिष्टिमपसाम्.. (५) कुश बिछाने वाले एवं हाथ में सुच लिए हुए ऋत्विज् सुख पाने के लिए मनुष्यों को अन्न देने वाले, उत्तम दीप्तियुक्त, संपूर्ण देवों के हितकारक, दुःखनाशक एवं यजमानों के यज्ञ पूर्ण करने वाले अग्नि की स्तुति करते हैं. (५) पावकशोचे तव हि क्षयं परि होतर्यज्ञेषु वृक्तबर्हिषो नरः. अग्ने दुव इच्छमानास आप्यमुपासते द्रविणं धेहि तेभ्यः.. (६) हे पवित्र चमक वाले तथा देवों के होता अग्नि! यज्ञों में चारों ओर कुश बिछाए हुए एवं तुम्हारी सेवा करने के इच्छुक यजमान तुम्हारे प्राप्त करने योग्य यज्ञमंडप की सेवा करते हैं. तुम उन्हें धन दो. (६) आ रोदसी अपृणदा स्वर्महज्जातं यदेनमपसो अधारयन्. सो अध्वराय परि णीयते कविरत्यो न वाजसातये चनोहितः.. (७) अग्नि ने धरती, आकाश एवं विशाल स्वर्ग को भर दिया था. यजमानों ने अग्नि को धारण किया था. क्रांतदर्शी एवं अन्नयुक्त अग्नि घोड़े के समान अन्न पाने के लिए लाए जाते हैं. (७) नमस्यत हव्यदातिं स्वध्वरं दुवस्यत दम्यं जातवेदसम्. रथीर्ऋतस्य बृहतो विचर्षणिर्ग्निर्देवानांमभवत्पुरोहितः.. (८) नेता, महान् एवं यज्ञ को देखने वाले अग्नि देवों के सामने स्थापित हुए थे. देवों को हव्य देने वाले, शोभन यज्ञयुक्त, घरों के लिए हितकारक एवं सभी प्राणियों को जानने वाले अग्नि की सेवा करो. (८) तिस्रो यह्वस्य समिधः परिज्मनोऽग्नेरपुनन्नुशिजो अमृत्यवः. तासामेकामदधुर्मर्त्ये भुजमु लोकमु द्वे उप जामिमीयतुः.. (९) अग्नि की अभिलाषा करने वाले मरणरहित देवों ने महान् और चारों ओर जाने वाले अग्नि के ज्ञापक पार्थिव, वैद्युतिक एवं सूर्यरूप तीन शरीरों को पवित्र किया था. देवों ने सबका पालन करने वाले पार्थिव शरीर को धरती पर एवं शेष दो को आकाश में रखा. (९) विशां कविं विशपतिं मानुषीरिषः सं सीमकृण्वन्त्स्वधितिं न तेजसे. स उद्वतो निवतो याति वेविषत्स गर्भमेषु भुवनेषु दीधरत्.. (१०) धन की इच्छा करने वाली मानवी प्रजाओं ने प्रजाओं के स्वामी एवं मेधावी अग्नि का इसलिए संस्कार किया कि वे धार लगी हुई तलवार के समान तेजस्वी हो जावें. अग्नि ऊंचे तथा नीचे स्थानों को व्याप्त करते हुए जाते हैं एवं सभी लोकों में अपना गर्भ धारण करते हैं. ebook converter DEMO Watermarks*