भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 617, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 617

अंगिरागोत्रीय ऋषि अपनी गायों को देखते हुए पहले उत्पन्न पुत्र के लिए उनका दूध दुह कर प्रसन्न हुए. उनका प्रसन्नतासूचक शब्द धरती-आकाश में भर गया. उन्होंने संसार की वस्तुओं में पुत्र के समान भावना बनाई तथा गायों की रखवाली के लिए वीर पुरुष नियुक्त किए. (१०) स जातेभिर्वृत्रहा सेदु हव्यैरुदुसिया असृजदिन्द्रो अर्कैः. उरूच्यस्मै घृतवद्भरन्ती मधु स्वाद्म दुदुहे जेन्या गौः.. (११) इंद्र ने सहायक मरुतों के साथ वृत्र को मारा. उसने हवन के पात्र एवं पूजनीय मरुतों के साथ यज्ञ के निमित्त गायों को बनाया. इसीलिए घी सहित हव्य धारण करने वाली व पर्याप्त मात्रा में हव्य देने वाली उत्तम गौ ने यजमान के लिए स्वादिष्ट एवं मधुर दूध दिया. (११) पित्रे चिच्चक्रुः सदनं समस्मै महि त्विषीमत्सुकृतो वि हि ख्यन्. विष्कभ्नन्तः स्कम्भनेना जनित्री आसीना ऊर्ध्वं रभसं वि मिन्वन्.. (१२) अंगिरागोत्रीय ऋषियों ने पालक इंद्र के लिए प्रकाशपूर्ण उत्तम स्थान बनाया था. उत्तम यज्ञकर्म करने वाले उन लोगों ने इंद्र के लिए उचित स्थान भली प्रकार दिखा दिया था. यज्ञ मंडप में बैठे हुए उन लोगों ने विश्वजनक धरती एवं आकाश को अंतरिक्षरूपी खंभे से रोककर वेगशाली इंद्र को स्वर्ग में स्थित किया. (१२) मही यदि धिषणा शिश्रथे धात्सद्योवृधं विभवं१रोदस्योः. गिरो यस्मिन्ननवद्याः समीचीर्विश्वा इन्द्राय तविषीरनुत्ताः.. (१३) यदि हमारे द्वारा की हुई स्तुति इंद्र को धरती और आकाश को पृथक् करने एवं धारण करने में समर्थ करे, तभी हमारी निर्दोष स्तुतियां सार्थक हैं. इंद्र की सारी शक्तियां स्वभाव सिद्ध हैं. (१३) मह्या ते सख्यं वश्मि शक्तीरा वृत्रघ्ने नियुतो यन्ति पूर्वीः. महि स्तोत्रमव आगन्म सूरेरस्माकं सु मघवन्बोधि गोपाः.. (१४) हे इंद्र! मैं तुम्हारी महती एवं दान की कामना करता हूं. तुझ वृत्रहंता की सवारी के लिए बहुत सी घोड़ियां तुम्हारे पास आती हैं. तुझ विद्वान् को हम महान् और उत्तम हव्य पहुंचाते हैं. हे मघवन्! तुम स्वयं को हमारा रक्षक समझ लो. (१४) महि क्षेत्रं पुरु श्चन्द्रं विविद्वानादित्सखिभ्यश्चरथं समैरत्. इन्द्रो नृभिरजनद्दीद्यानः साकं सूर्यमुषसं गातुमग्निम्.. (१५) इंद्र ने भली-भांति जानते हुए हम मित्रों को विशाल खेत एवं बहुत सा सोना दिया है. इसके पश्चात् गाएं आदि भी दी हैं. दीप्तिमान् इंद्र ने नेता मरुतों से मिलकर सूर्य, उषा, धरती एवं अग्नि को उत्पन्न किया. (१५) ebook converter DEMO Watermarks*